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सरकार के विनिवेश लक्ष्य से चूकते ही बढ़ेंगी कई मुश्किलें

मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में जब कर संग्रह के मोर्चे पर सरकार बुरी तरह पिछड़ चुकी है तब विनिवेश से भी झोली में कुछ खास आने की उम्मीद नहीं है

फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे

कर संग्रह और विनिवेश लक्ष्य से चूकने के बाद सरकार राजकोषीय घाटे के वित्तीय अनुशासन को तोड़ने के लिए मजबूर होगी. इससे अर्थव्यवस्था में कई मुश्किलें बढ़ जाएंगी, जिसका खामियाजा हम आप सब भुगतेंगे. 

मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में जब कर संग्रह के मोर्चे पर सरकार बुरी तरह पिछड़ चुकी है तब विनिवेश से भी झोली में कुछ खास आने की उम्मीद नहीं है. मौजूदा वित्त वर्ष के लिए सरकार ने 1,05,000 करोड़ रुपए के विनिवेश का लक्ष्य रखा है. जनवरी के पहले हफ्ते तक सरकार विनिवेश के जरिए महज 18,095 करोड़ रुपए की जुटा पाई है. 

अब वित्त वर्ष की समाप्ति तक 35 से 40 हजार करोड़ रुपए ही इस मद में हासिल किया जाने वाला लक्ष्य मालूम होता है. यानी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के साथ साथ विनिवेश लक्ष्य से भी सरकार का चूकना लगभग तय नजर आ रहा है. 

अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार विनिवेश के बड़े लक्ष्य रख सकती है. एयर इंडिया, बीपीसीएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और कन्टेनर कॉर्प जैसी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने पर सरकार विचार लंबे समय से कर रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था में सुस्ती के इस दौर में कंपनियों की अच्छी कीमत मिलना मुश्किल है. 

एक सरकारी कंपनी से दूसरी में विनिवेश करवाने वाले विकल्प भी अब सीमित हैं. 

कर संग्रह, शुद्ध निर्यात और विनिवेश के मोर्चे पर पिछड़ने के बाद राजकोषीय घाटे का आंकड़ा एकाएक बड़ा हो सकता है. रेटिंग एजेंसी इकरा की ताजा रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि सरकार अपने कुल कर संग्रह के लक्ष्य से 3 से 3.5 करोड़ रुपए पीछे रह सकती है. 

राजकोषीय घाटा बढ़ने का सीधा मतलब है कि सरकार को ज्यादा कर्ज बाजार से लेना पड़ेगा. कर्ज उन्हीं बैंकों से लिया जाएगा जिनके कंधों पर उद्योगों को ज्यादा से ज्यादा कर्ज बांटने की जिम्मेदारी है. अगर सरकार बैंकों की बड़ी राशि अपने बॉण्ड खरीदारी में लगा देगी तो बैंकों के पास उद्योगों के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं बचेगी. 

यह बीमारी पुरानी हैं लेकिन तकलीफ बढ़ सकती है. 

सरकार राजकोषीय घाटे को काबू में रखने के लिए एफसीआइ को दी जाने वाली सब्सिडी को बजट से बाहर रख सकती है. लेकिन इस स्थिती में भी बैंकों पर एफसीआइ को कर्ज देने का दवाब होगा और स्थिति में कोई बड़ा अंतर नहीं आएगा.  

सरकार की ओर से ज्यादा कर्ज लेने और राजकोषीय घाटा बढ़ने का असर देश की क्रेडिट रेटिंग पर भी पड़ेगा. मूडीज और एस ऐंड पी जैसी एजेंसियां इन्हीं आंकड़ों पर नजर लगाए बैठे हैं. क्रेडिट रेटिंग घटना भारतीय शेयर बाजार और मुद्रा यानी रुपए के लिए अच्छी खबर नहीं होगी. 

रुपए की कमजोरी और बॉण्ड की बढ़ती यील्ड महंगाई की आग को घी देगी. दिसंबर महीने में खुदार महंगाई दर 7.35 पर पहुंच गई है. आगामी बजट में अगर सरकार अर्थव्यवस्ता को सहारा देने के लिए वित्तीय अनुशासन को तोड़ती है तो यह महंगाई के स्थिर बना देगी और हम 7 – 8 प्रतिशत की उच्च महंगाई दर वाले दिनों में वापस लौट जाएंगे.   

(शुभम शंखधर इंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर हैं)

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