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तो क्या मोदी सरकार की इस गलती से आई मंदी?

डॉ मनमोहन सिंह ने मंदी पर सरकार को जो सुझाव दिए उसके विभिन्न आयामों पर सोचना, समझना और जानना जरूरी है. उन्होंने कहा कच्चे तेल की राहत उपभोक्ताओं तक पहुंचती रहती तो शायद हम इस मंदी का सामना ही नहीं करते! क्या यह वाकई सरकार की ओर से की गई बड़ी गलती थी?

फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे

मंदी में फंसने और निकलने का रास्ता एक ही है! 

जाने माने अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंदी से जूझ रही अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कई सुझाव दिए. मौका था मोदी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर. सिंह ने कहा कि अर्थव्यवस्था गहरी मंदी में है और सही कदम उठाए जाएं तब उबरने में कम से कम तीन से चार साल लगेंगे. कृषि पर ध्यान देना, निर्यात की संभावनाएं तलाशना, रोजगार देने वाले क्षेत्रों पर ध्यान देना, नकदी संकट को दूर करना ये तमाम ऐसे सुझाव हैं जो डॉ सिंह ने अर्थव्यवस्था की तकलीफ को दूर करने के लिए सुझाएं हैं. 

क्या इनमें कुछ नया है? ये सभी बातें तो विभिन्न अर्थशास्त्रियों, सरकार के आला अधिकारियों और कई बार सरकार के आयोजनों में दिखाई जाने वाली प्रेजेंटेशन का हिस्सा होती हैं. लेकिन एक बात ऐसी जरूर है जो डॉ सिंह ने बोली और जिसके विभिन्न आयामों पर सोचना, समझना और जानना जरूरी है. उन्होंने कहा कच्चे तेल की राहत उपभोक्ताओं तक पहुंचती रहती तो शायद हम इस मंदी का सामना ही नहीं करते!

क्या यह वाकई सरकार की ओर से की गई बड़ी गलती थी? क्योंकि आज ऑटो इंडस्ट्री जीएसटी में जितने टैक्स कटौती की बात कर रही है, अगर कच्चे तेलों की कीमतों के सापेक्ष राहत पेट्रोल और डीजल के दामों में पहुंचती तो इंडस्ट्री को दोहरा फायदा होता. पहला लागत घटने से कंपनियों के मार्जिन सुधरते और दूसरा अगर पेट्रोल 50-60 रुपए लीटर बिक रहा होता तो शायद मांग पर इतनी चोट नहीं पहुंचती. 

पेट्रोल-डीजल सभी क्षेत्रों लिए लागत का बड़ा हिस्सा होता है. फिर चाहें वह टेक्सटाइल्स हो या कंस्ट्रक्शन, एफएमसीजी, जेम्स एंड ज्वैलरी आदि. दरअसल ये सभी वे क्षेत्र हैं जो सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर मुहैया कराते हैं. मेक इन इंडिया का शेर भी शायद इस ईंधन से ज्यादा तेज दौड़ता. 

अब आगे चलिए. शेयर बाजार भी कंपनियों के मार्जिन सिकुड़ने से चिंता में है. पेट्रोल डीजल की राहत यहां पहुंचती तो मार्जिन पर चोट या तो नहीं पहुंचती या कम होती. तो कुल जमा बात यह है कि अगर सरकार कच्चे तेल के सस्ते और रुपए के मजबूत होने वाले दौर में राहत देती तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती. नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्र को पहुंची चोट एक अलग ही मुद्दा है. 

दूसरा पहलू समझना भी जरूरी है. सरकार ने यह राहत न देकर जो टैक्स जुटाया वह गया कहां? किसानों को 6000 रुपए सालाना देने में या आयुष्मान जैसे बड़े प्रोजेक्ट पर. यहां दलील यह हो सकती है कि अगर सही गति से अर्थव्यवस्था दौड़ रही होती तो ग्रामीण इलाकों तक शायद यह संकट नहीं पहुंचता और मानदेय जैसी स्कीम की जरूरत नहीं पड़ती. 

आयात ज्यादा होने पर व्यापार घाटा बढ़ सकता था? यह एक और पहलू है. लेकिन अगर कच्चा तेल ज्यादा आयात होता तो देश की फैक्ट्रियां ज्यादा उत्पादन कर रही होतीं, हवाई किराए सस्ते होते तो लोग ज्यादा उड़ रहे होते और अंतत: सरकार को टैक्स के रास्ते ज्यादा राजस्व आता. 

हालांकि डॉ सिंह अगर यह बोल रहे हैं कि कॉग्रेस के घोषणा पत्र में मंदी से निकलने के ठोस रास्ते हैं. घोषणा पत्र में किसानों को 72000 रुपए सालाना देने का वादा किया था. यहां विरोधावास है अगर इतनी बड़ी राशि देनी है तो पैसा पेट्रोल डीजल पर कर लगाकर ही निकाला जा सकता था.

अंत में – क्या सरकार अब रुपए के मौजूदा स्तर, कच्चे तेल की मौजूदा कीमत के मद्देनजर पेट्रोल डीजल की कीमत में भारी कटौती करके मंदी से मुकाबला कर सकती है?

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