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महिला सुरक्षा के लिए फंड है, मगर मंशा नहीं!

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 1,656 करोड़ पिछले पांच सालों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को जारी किए लेकिन इसका तकरीबन 20 फीसद ही इस्तेमाल किया गया.

महिला सुरक्षा महिला सुरक्षा

निर्भया हादसे को हुए 16 दिसंबर को 7 साल हो जाएंगे. लेकिन तब से लेकर अब तक न जाने कितने मामले घट चुके. तेलंगाना में सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला अभी लोग भूले नहीं हैं. उन्नाव में बलात्कार पीड़िता को जलाकर मार दिया गया तो छत्तीसगढ़ में भी उन्नाव की तरह जमानत पर रिहा हुए बलात्कार के आरोपियों ने पीड़िता की चाकू गोदकर हत्या कर दी. यानी अगर आंकड़े निकाले जाएं तो रोजाना पूरे देश में ऐसी घटनाओं की भरमार रहती है. दिसंबर, 2012  में निर्भया मामले के बाद महिला सुरक्षा को लेकर सख्त दिशा निर्देश दिए गए. निर्भया फंड के जरिए महिला सुरक्षा के लिए जरूरी टेक्नोलोजी के विकास, राज्यों में इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को पूरी करने के निर्देश दिए गए. लेकिन क्या सरकारें चौकस हुईं? निर्भया फंड से महिलाएं निर्भय बन सकीं? केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि राज्य सरकारों के पास फंड की नहीं मंशा की कमी है.

निर्भया कांड क्योंकि दिल्ली में ही हुआ था, इसलिए इस फंड की पड़ताल दिल्ली से ही की जानी चाहिए. केंद्र से मिले 39090.12 रु. में से 1941.57 फंड ही राज्य सरकार खर्च कर पाई. क्यों? दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने आज एक ट्वीट कर सूचना दी, ''दिल्ली के सभी स्कूलों और कॉलेजों में अब लड़कों को लड़कियों और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार न करने की शपथ दिलाई जाएगी.

लड़कियां अपने भाइयों से शपथ लेंगी. हर क्लास में एक घंटे महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ और उसके समाधान पर खुलकर होगी चर्चा.'' लेकिन क्या अगर निर्भया फंड के इस्तेमाल के जरिए राज्य की लड़कियों को महिला सुरक्षा से जुड़े प्रशिक्षण देना जरूरी नहीं था. दिल्ली के कई इलाके बिना स्ट्रीट लाइट रात में भयावह हो जाते हैं क्या वहां लाइट लगवाना जरूरी नहीं थी?

क्योंकि तेलंगाना का मामला गरम है इसलिए इस राज्य के फंड की पड़ताल जरूरी है,10351.88 रु. में से 419.00 ही खर्च हो पाए. हालांकि यहां तो महिला आयोग का अध्यक्ष पद ही 17 महीनों से नियुक्ति की बांट जोह रहा है. उत्तर प्रदेश की हालत तो इससे भी खराब है. कुल फंड 11939.85 रु. में से 393.00 रु. ही खर्त हो पाए.कुल मिलाकर पूरे देश में महिला सुरक्षा के नाम पर नूरा-कुश्ती ही जारी है. कारण सबको पता हैं लेकिन निवारण के लिए वक्त किसी सरकार के पास नहीं है.

सभी आंकड़े लाख में हैं.

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