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मुखर होने लगा भाजपा-जद (यू) का वैचारिक मतभेद

नीतीश कुमार ने आरक्षण का मुद्दा उठाकर भाजपा की कमजोर कड़ी पर वार कर दिया है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • जद (यू) के मंत्री कन्हैया कुमार से मिले और यह चर्चा हुई कि कन्हैया जद (यू) में शामिल हो सकते हैं
  • फिर नीतीश कुमार ने आरक्षण के मुद्दे को हवा देने की कोशिश कर भाजपा पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है
  • पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम और किसान आंदोलन से हकलान भाजपा के लिए इस वक्त आरक्षण का मुद्दा दमघोंटू हो सकता है

बिहार में एक दूसरे के सहयोग से सरकार चला रहे भाजपा और जद (यू) का वैचारिक मतभेद दिनों दिन तेज होता जा रहा है. वामपंथी नेता कन्हैया कुमार के साथ जद (यू) मंत्रियों की मुलाकात का मामला ठंडा पड़ा भी नहीं था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरक्षण के मुद्दे को हवा देने की कोशिश कर भाजपा पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. नीतीश के सुझाव को लेकर भाजपा की तरफ से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया तो नहीं आई है, लेकिन दोनों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगा है.

नीतीश कुमार ने बुधवार को कहा था कि बिहार में जिस तरह से पिछड़ा और दलित कोटे से अतिपिछड़ा और महादलित जातियों को आरक्षण दिया जा रहा है, उसी तरह केंद्र में भी दिया जाना चाहिए. पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम और किसान आंदोलन से हकलान भाजपा के लिए इस वक्त आरक्षण का मुद्दा दमघोंटू हो सकता है. बिहार भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस समय आरक्षण के मुद्दे को उठाने का कोई तुक नहीं है. नीतीश यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आम लोगों की तरफ से इस तरह की कोई मांग अभी नहीं हो रही है, फिर ऐसे संवेदनशील मुद्दे को छेड़ने का कोई तुक नहीं है.

दरअसल, इस तरह के मुद्दे को उठाना उस वैचारिक मतभेद और भितरघात का नतीजा है जो दोनों गठबंधनों के बीच बिहार चुनाव से पहले से जारी है. बिहार चुनाव के दौरान, लोजपा ने जद (यू) प्रत्याशियों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारे और भाजपा ने लोजपा प्रमुख चिराग पासवान को न तो रोका न ही उससे नाता तोड़ा. जद (यू) नेताओं का मानना है कि चिराग की तरफ से जद (यू) प्रत्याशियों के खिलाफ अपना प्रत्याशी उतारना भाजपा की रणनीति थी जिससे जद (यू) को इतना भाड़ी नुकसान हुआ कि वह राज्य में भाजपा की जूनियर पार्टनर बन गई. हालांकि, भाजपा ने नीतीश कुमार को सीएम प्रोजेक्ट किया और बनाया भी लेकिन कैबिनेट में भाजपा मंत्रियों की संख्या जद (यू) के मुकाबले अधिक हो गई है. अब शाहनवाज हुसैन जैसे कद्दावर नेता भी नीतीश कैबिनेट में मंत्री हैं और ऐसे में नीतीश को जो फ्री-हैंड पिछले 15 साल से मिला हुआ था वह अब नहीं रहा.

इस स्थिति में जदू (य) ने अपनी तरफ से भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू कर दी है. जद (यू) के मंत्री जब कन्हैया कुमार से मिले और यह चर्चा हुई कि कन्हैया जद (यू) में शामिल हो सकते हैं तो इससे भाजपा की बेचैनी बढ़ी. अनौपचारिक बातचीत में भाजपा नेताओं का कहना है कि यदि कन्हैया जद (यू) का हिस्सा बनते हैं तो फिर जद (यू) के साथ सरकार चलाने के फैसले पर पुनर्विचार करना होगा. कन्हैया प्रकरण के बाद आरक्षण के मुद्दे को नीतीश कुमार की तरफ से छेड़ने की घटना को भी जद (यू) की प्रेशर पॉलिटिक्स से जोड़ कर देखा जा रहा है.

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