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संसद में सियासी दांव खेल कर चीन पर चर्चा से बची सरकार

रक्षा मंत्री के बयान के बाद जब सदस्यों ने उनसे सवाल पूछना चाहा तो स्पीकर की तरफ से नियम का हवाला देते हुए कहा गया कि बयान पर उत्तर देने की प्रथा नहीं है.

चीन पर बयान देते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (पीटीआइ) चीन पर बयान देते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (पीटीआइ)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • लोकसभा में रक्षा मंत्री के वक्तव्य के बाद संसद के मौजूदा सत्र में इस मुद्दे पर चर्चा की संभावना पर विराम लग गया है
  • मंत्री के बयान के बाद लोकसभा में सदस्य सवाल नहीं पूछ सकते हैं
  • रक्षा मंत्री राज्यसभा में भी चीन को लेकर बयान देते तो उन्हें सवाल भी लेने पड़ते

भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के लोकसभा में दिए गए वक्तव्य के बाद संसद के मौजूदा सत्र में इस मुद्दे पर चर्चा की संभावना पर विराम लग गया है. विपक्ष के लिए यह ऐसा प्रमुख मुद्दा था जिस पर सरकार के लिए उत्तर देना कठिन था. इस मसले पर खुद को बैकफुट पर महसूस कर रही सरकार ने सियासी दांव खेलते हुए इस मुद्दे को चर्चा से बाहर कर दिया.

सोमवार (14 सितंबर) को हुई बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसए) की बैठक में कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने नियम 193 के तहत इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की. सूत्रों का कहना है कि बैठक में यह आश्वासन दिया गया कि मंगलवार को ही सदन की कार्यवाही शुरू होने पर इस बारे में स्पीकर निर्णय करेंगे. सुबह यह तक किया गया कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस मुद्दे पर बयान देंगे. चर्चा पर कोई निर्णय नहीं हुआ. रक्षा मंत्री के बयान के बाद जब सदस्यों ने उनसे सवाल पूछना चाहा तो स्पीकर की तरफ से नियम का हवाला देते हुए कहा गया कि बयान पर उत्तर देने की प्रथा नहीं है. वैसे भी मंत्री के बयान के बाद लोकसभा में सदस्य सवाल नहीं पूछ सकते हैं. यदि चर्चा होती भी है तो चर्चा के बाद मंत्री के बयान आने के बाद सवाल पूछने का प्रवधान लोकसभा में नहीं है.

इसके उलट राज्यसभा में यह प्रावधान है कि मंत्री के जबाव के बाद भी पांच सदस्य सवाल पूछ सकते हैं. यहां तक कि राज्यसभा में यदि प्रधानमंत्री किसी चर्चा का उत्तर देते हैं तो उनके उत्तर के बाद भी सदस्य सवाल पूछ सकते हैं. चूंकि रक्षा मंत्री को लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी चीन को लेकर अपना बयान देने की जरूरत थी और यदि राजनाथ यहां बयान देते तो उन्हें सवाल भी लेने पड़ते. लिहाजा सरकार ने यह तय किया कि उच्च सदन में बयान देने की जगह बयान को सदन की पटल पर रखा जाएगा. ऐसा किया भी गया और इस तरह से चीन पर संसद में सवाल पूछने का मौका ही विपक्षी दलों के लिए सरकार ने खत्म कर दिया.

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