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स्मृतिशेषः भाई की बेरुखी ने बनाया गीतकार

सिने गीतकार योगेश कहते हैं, ''मैं लखनऊ के शिवपुरी मुहल्ले की अपनी नवाबी कोठी से निकलकर मुंबई की अनजान सड़कों पर अपने चचेरे भाई ब्रजेंद्र गौड़ के भरोसे आया था. वे उन दिनों फिल्मों में लेखन कर रहे थे. लेकिन उनकी बेरुखी और मेरे बचपन के दोस्त सत्यप्रकाश उर्फ सत्तू की जिद ने मेरे जीवन की पटकथा कुछ अलग ही लिख दी.''

गीतकार योगेश गौड़ गीतकार योगेश गौड़

सबका कुछ अपना अनुभव है

अनुभव से, उनसे सीखा है.

मेरा भी कोई अनुभव है

वो अनुभव लेकिन तीखा है.

जो भोगा है वह कहता हूं

वो दर्द अभी तक सहता हूं.

इस धरती पर सबसे ज्यादा

यह मानव ही जहरीला है.

मेरी यह कविता मेरी जिंदगी का आईना है. अब मैं पचहत्तर वसंत पार चुका हूं. लेकिन मुझे किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं. मैं छोटी उम्र में ही इस दुनिया से तब रू-ब-रू हुआ जब मेरे पिता की मौत हो गई थी और उन्हें इस दुनिया से रुखसत करने के लिए चंदा इकट्ठा करना पड़ा था; जबकि वे साहित्यिक मिजाज वाले रिटायर्ड इंजीनियर थे और उन्होंने बहुत सारे लोगों की रोजी-रोटी का इंतजाम किया और उन्हें नौकरी दिलाई थी. मेरे लंबे कद के बावजूद मेरे सामने गरीबी और पारिरवारिक जिम्मेदारियों की मुझसे ऊंची दीवार खड़ी थी. मैं लखनऊ के शिवपुरी मुहल्ले की अपनी नवाबी कोठी से निकलकर मुंबई की अनजान सड़कों पर अपने चचेरे भाई ब्रजेंद्र गौड़ के भरोसे आया था.

वे उन दिनों फिल्मों में लेखन कर रहे थे. लेकिन उनकी बेरुखी और मेरे बचपन के दोस्त सत्यप्रकाश उर्फ सत्तू की जिद ने मेरे जीवन की पटकथा कुछ अलग ही लिख दी. मैं आज भी कहता हूं कि जमींदार घराने का सत्तू भगवान कृष्ण की तरह मेरा सारथी न बना होता यह आज का मरियल सा बूढ़ा आदमी लखनऊ में एक रिटायर क्लर्क होता. (जींस और टीशर्ट में वे कुर्सी पर बैठे हुए थे. इतने संवाद के दौरान वे एक कप कॉफी पी चुके थे जो उन्होंने स्वयं बनाई थी फिर किचन में कप रखने के लिए वे उठे. बातचीत कुछ देर के लिए रुक गई.किचन से लौटकर उन्होंने बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू किया.)

मैं कोई साहित्यकार नहीं था. पेट पालने के लिए जो संघर्ष मैं कर रहा था, उसी दर्द को टेढ़े-मेढ़े अंदाज में कागज पर उतरा हुआ देखकर सत्तू ने परख लिया कि मैं फिल्मों में गाने लिख सकता हूं. इसके लिए उसने न सिर्फ मुझ पर दबाव बनाया बल्कि पिटाई भी की. और शायद उसकी पिटाई का ही असर था कि मैं फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बन गया और गाने लिखता चला गया. मेरा दोस्त सत्तू मेरा साथ छोड़कर इस दुनिया से चला गया लेकिन मैं अब भी उसके कहे अनुसार गाने लिख रहा हूं. (यह कहते हुए योगेश की आंखें भर आईं. उन्होंने चश्मा उतारकर आंसू पोंछे और कुछ क्षण चुप रहे)

साल 2017 की साहित्यवार्षिकी में इंडिया टुडे के संवाददाता नवीन कुमार से हुई विस्तृत बातचीत पर आधारित छपे लेख के कुछ अंश

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