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पूर्वी और दक्षिण भारत में भाजपा की सियासी चाल

सबसे पहले वर्चुअल रैली को गृह मंत्री अमित शाह से ही संबोधित कराना भी रणनीति का हिस्सा ही है. बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा की रैली को शाह ने संबोधित किया.

जे.पी. नड्डा जे.पी. नड्डा

कोरोना संक्रमण के बढ़ते रफ्तार के बीच भाजपा जब यह तय कर रही थी कि पार्टी के वरिष्ठ नेता 75 वर्चुअल रैली को संबोधित करेंगे तो यह मामला उठा की मौजूदा समय में यह क्यों? पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "अनलॉक-1 की शुरुआत, संगठन को भी लॉकडाउन से बाहर निकालने की पहल है और एक राजनीतिक दल के रूप में लॉकडाउन से उत्पन्न हुए अनुकूल और प्रतिकूल हालात को सियासी लाभ में बदलने के लिए ऐसा करना जरूरी है."

नड्डा की यह सोच अनायास नहीं है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों का पलायन वह जबरदस्त प्रतिकूल स्थिति है, जिससे चुनावी राजनीति में भाजपा को धक्का लग सकता है. खासकर उन प्रदेशों में जहां बड़ी तादाद में मजदूर पलायन कर पहुंचे हैं. इन राज्यों में बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं तो उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में अगले साल. इसलिए यदि मजदूरों के मामले को बिहार चुनाव तक संभाला नहीं गया और भाजपा को चुनावी नुक्सान हुआ तो आने वाले दिनों में अन्य राज्यों में यह मुद्दा और गंभीर रूप से भाजपा के सामने यक्ष प्रश्न बन कर खड़ा हो जाएगा.

सबसे पहले वर्चुअल रैली को गृह मंत्री अमित शाह से ही संबोधित कराना भी रणनीति का हिस्सा ही है. बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा की रैली को शाह ने संबोधित किया. बंगाल की रैली में उन्होंने प्रवासी मजदूरों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन को ममता बनर्जी ने कोरोना ट्रेन घोषित किया. शाह ने कहा कि ममता नहीं चाहती थीं कि प्रवासी मजदूर वापस आएं और उन्होंने अपने राज्य में आयुष्मान भारत योजना को भी लागू नहीं किया. जाहिर है, ऐसा करके शाह ममता बनर्जी को श्रमिक विरोधी बताने की कोशिश कर रहे थे. शाह के तीनों रैलियों का स्थान भी ऐसे तय किया गया था कि वह बंगाल के भाजपा कॉडर को जागृत कर सके. बंगाल बिहार और ओडिशा से सटा हुआ प्रदेश है. चूंकि शाह आक्रामक तरीके से प्रतिकूल मुद्दों को भाजपा के पक्ष में मोड़ने की कला में माहिर हैं इसलिए इन तीनों स्थानों पर उनके द्वारा रैलियों को संबोधित कराने की योजना बनाई गई.

भाजपा के लिए प्रतिकूल मुद्दों (प्रवासी मजदूर) के अलावा अनकूल मुद्दों को भी उभारने की कोशिश पार्टी ने की. इसकी शुरूआत दक्षिण भारत से की गई. चूंकि दक्षिण भारत के तीन राज्यों केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी में अगले साल चुनाव होने हैं, इसलिए यहां प्रवासी मजदूरों की जगह भावनात्मक मुद्दों की दरकार भाजपा को है. कॉडर भी उत्साहित रहे और मुद्दा भी बने, इसके लिए भाजपा ने रणनीतिक रूप से अपनी चाल चल दी है.

कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव के लिए, मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा की तरफ से दो कद्दावर नेताओं को प्रत्याशी बनाने का फैसला लिया जिसे पलटते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने दो आम कार्यकर्ताओं को प्रत्याशी बनाने की घोषणा की है. इसके जरिए पार्टी ने कॉडरों को यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा से वैचारिक रूप से जुड़े जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए ही राज्यसभा या लोकसभा के दरवाजे खुले हैं. चूंकि केरल, कर्नाटक का पड़ोसी राज्य है इसलिए वहां के भाजपा कार्यकर्ताओं को यह संदेश मिला कि आम कार्यकर्ता की पूछ भाजपा के मौजूदा नेतृत्व के बीच है.

केरल में भाजपा ने संवेदनशील मामले को उठाते हुए केरल सरकार पर यह कहते हुए हमला किया है कि अनलॉक के तहत मंदिरों को खोलने का फैसला राज्य सरकार ने हिंदू संगठनों को पूछे बिना लिया है, जबकि मस्जिद और चर्च खोलने के लिए इन समुदाय के प्रतिनिधियों को बैठक में बुलाकर विचार किया गया. भाजपा के केरल प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन कहते हैं, “मंदिर संरक्षा समिति सहित विभिन्न हिंदू संगठनों से राज्य सरकार ने विचार-विमर्श भी नहीं किया. यह सरकार हिंदू विरोधी है.” विदित हो कि पिछले कुछ समय से सबरीमला सहित विभिन्न मुद्दों के जरिए भाजपा ने राज्य में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की है.

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