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लॉकडाउन ने बढ़ाई दूरी तो डेटिंग ऐप बने वरदान, खोजे वर्चुअल डेटिंग के दिलचस्प तरीके

लॉकडाउन की मजबूरी भी युवाओं को अपने प्रेमी के साथ होने के एहसास और अपने नए साथी की तलाश करने से नहीं रोक नहीं पा रही. इस तलाश और एहसास में युवाओं के मददगार बने हैं डेटिंग ऐप.

फोटो साभार-इंडिया टुडे फोटो साभार-इंडिया टुडे

सामाजिक दूरी की मजबूरी की वजह से लोग पिछले करीब दो महीने से भी ज्यादा समय से लॉकडाउन में हैं. अति आवश्यक सेवाओं के लिए भी बिना प्रशासन की अनुमति के निकलना संभव नहीं. ऐसे में अपने साथी या प्रेमी से मुलाकात या फिर तलाश का तो सवाल ही नहीं उठता. आखिर सरकार ने इन्हें अति आवश्यक सेवाओं की सूची में तो डाला नहीं जो प्रशासन की अनुमति लेकर किसी मॉल, बाजार, कॉफी हाउस या मंदिर के इर्द-गिर्द मुलाकात कर ली जाए. लेकिन डेटिंग एप इस बीच युवाओं के लिए सबसे करीबी दोस्त बनकर सामने आए हैं. मजेदार बात यह है कि बम्बल, टिंडर, सीक्यूपिड, क्वेक-क्वेक जैसे सभी एप्स को एप स्टोर या गूगल ब्राउजर से मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है. युवाओं को रिझाने के लिए निजी बातों के साथ कैंडल लाइट डिनर से लेकर वर्चुअल शॉपिंग तक ख्याल यह डेटिंग ऐप रख रहे हैं.

दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाली रुचि (बदला हुआ नाम) बेबाक अंदाज में कहती हैं, '' देखिए मैं ग्रेजुएशन आखिरी साल की छात्रा हूं. मेरा एक ब्वाय फ्रेंड पिछले तीन साल से है. हफ्ते में कम से कम दो बार तो हम साथ बैठकर कॉफी पी ही लेते थे. डिनर-लंच भी चलता रहता था. मॉल-सिनेमा यह सब तो पिछले तीन से हमारी डेटिंग की जगह बन गए थे. लेकिन लॉकडाउन से भी पहले जब से कोरोना संकट शुरू हुआ मैं तो घर में कैद होकर रह गई हूं. मैंने सोचा क्यों ना कोई डेटिंग एप ट्राई करूं. तो मैंने ऐप स्टोर में जाकर बम्बल (Bumble)ऐप ट्राइ किया. पहले मैंने सोचा अपने ब्वाय फ्रेंड को भी इसमें जोड़ूं. लेकिन फिर सोचा आखिर किसी और के साथ डेटिंग करने में हर्ज ही क्या है. अप्रैल के आखिरी सप्ताह में इस ऐप को डाउनलोड करने के बाद से तो लॉकडाउन की बोरियत जैसे छूमंतर हो गई.

बम्बल ऐप में स्ट्रेटजी, वाइस प्रेसिडेंट प्रीति जोशी कहती हैं, '' अप्रैल के आखिरी सप्ताह में हमारे ऐप द्वारा पहले के मुकाबले 19 फीसद संदेश ज्यादा भेजे गए. इतना ही नहीं वीडियो कॉल और फोन काल का औसत समय प्रति व्यक्ति18 मिनट से ज्यादा रहा. प्रीति कहती हैं, सामान्यतयः यह समय 10-12 मिनट के आसपास रहता है. इंडिया में टिंडर डेटिंग एप के जनरल मैनेजर तरु कपूर कहते हैं. लॉकडाउन से पहले के मुकाबले तीसरे लॉकडाउन की घोषणा तक एप से जुड़े जेनरेशन-z (1995-2010 के बीच जन्में युवा) के बीच होने वाले संवाद के आंकड़ों में 10 फीसद से ज्यादा का उछाल आया. सामान्य दिनों के मुकाबले बातचीत करने के आंकड़ों मे आया यह उछाल 39 फीसद दर्ज किया गया.

क्वेक-क्वेक (Quack Quack)डेटिंग ऐप के फाउंडर और सीईओ रवि मित्तल कहते हैं, ''दरअसल, लॉकडाउन से पहले ही डेटिंग ऐप को और मजेदार बनाने की तरफ काम शुरू हो गया था. लेकिन जो नए फीचर जोड़े गए थे उनका इस्तेमाल यूजर्स ने लॉकडाउन के बीच अचानक बढ़ा दिया है. अभी हमने आंकड़ों का सटीक विश्लेषण तो नहीं किया. लेकिन पहले के मुकाबले तकरीबन 30-35 फीसद इन फीचर्स का इस्तेमाल बढ़ा है. दरअसलय यह नए फीचर्स हैं, ''आमने सामने की डेट की तरह ही एप में वर्चुअल डेट की व्यवस्था का होना. कैंडल की हल्की रोशनी के बीच, बैकग्राउंड में बजता म्यूजिक और सलीके से परोसा गया खाना, जो आपका मूड बना दे. अब आपको लगेगा कि आखिर ऐप के जरिए खाना कैसे शेयर किया जा सकता है!..यही तो कमाल है. डेट करने वाले दोनों व्यक्ति खाना अपने-अपने घर में बनाते हैं, बाकी माहौल हम देते हैं..दोनों को बिल्कुल ऐसा एहसास होता है कि वे एक दूसरे के सामने बैठकर पुरानी डेटिंग की तरह रोमांस में डूबे हुए स्वादिष्ट जायके का लुत्फ उठा रहे हैं.'' दरअसल, इस तरह फीचर्स दूसरे डेटिंग ऐप में भी जोड़े गए हैं. बम्बलर में यह फीचर काफी पहले से इस्तेमाल हो रहे हैं.

पार्टी फीचर डेटिंग एप में सबसे ज्यादा दिलचस्प साबित हो रहा है. इस फीचर के जरिए पसंददीदा गानों या फिल्मों की सूची बनाकर तैयार की जाती है. फिर डेट करने वाले दोनों व्यक्ति इसे साथ-साथ सुन सकते हैं. दोनों व्यक्ति अपने घर में पसंद के अनुसार ड्रेसअप होकर 'मनोरंजन' का पूरा आनंद उठाते हैं. ऑनलाइन शॉपिंग में साथ-साथ होने का एहसास भी डेटिंग ऐप दे रहे हैं.

दिल्ली स्थित ब्रेन बिहेवियर रिसर्च फाउंडेशन ऑफ इंडिया की चेयरमैन डॉ. मीना मिश्रा कहती हैं, '' दरअसल, लॉकडाउन ने केवल बुजुर्ग या फिर मिडल एज के लोगों को ही अकेलापन नहीं दिया है बल्कि युवाओं को भी उनकी मौजमस्ती वाली दुनिया से दूर कर दिया है. लॉकडाउन के बीच अकेलेपन से लड़ने के कई उपाय लगातार सुझाए जा रहे हैं. घर-परिवार वालों और दोस्तों से ऑनलाइन कनेक्ट रहना, वीडियो कॉल करना. लेकिन युवाओं की दुनिया हर जेनरेशन में अलग होती है. उन्हें हमउम्र साथी चाहिए.

बातचीत और सच कहें तो फ्लर्ट के लिए भी साथी चाहिए होता है. लेकिन फ्लर्ट का मतलब सेक्स से हमेशा जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.ऐसे में डेटिंग ऐप उन्हें निजता और घरवालों के साथ लगातार रहने की मजबूरी से थोड़ा राहत तो दे ही रहे हैं. हालांकि दूसरी तरफ डॉ. मिश्रा यह भी कहती हैं कि अभिभावकों को थोड़ा चौकन्ना भी रहना चाहिए. थोड़ी देर के लिए तो यह ऐप अकेलेपन को दूर सकते हैं. लेकिन कई बार इनके अपने जोखिम भी हैं, समय समय पर ऐसी खबरें आती ही रहती हैं. लोग इसका दुरुपयोग भी करते हैं. इसलिए कम से कम अभिभावकों को अपने बच्चों को इनके बारे में अगाह जरूर कर देना चाहिए.

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