scorecardresearch
 

खेलते बच्चे के हाथ में मिला 50 लाख साल पुराना अवशेष

सहारनपुर. हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा पर यूपी के शिवालिक वन क्षेत्र में हाथी की प्रथम पीढ़ी के जबड़े का एक जीवाश्म मिला है. वह भी जंगल में एक वन गुर्जर के डेरे पर खेल रही बच्ची के हाथ में, जिसकी कार्बन डेटिंग से खुलासा हुआ है कि यह 50 लाख से एक करोड़ साल पुराना और डायनासोर युग के एक दम बाद का है. इसे मैमथ या स्टेगोडॉन भी कहा जाता था.

फोटोः एम रियाज हाशमी फोटोः एम रियाज हाशमी

यूपी के सहारनपुर में शिवालिक वन क्षेत्र में मिले हाथी के जबड़े की कार्बन डेटिंग से खुलासा

सहारनपुर. हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा पर यूपी के शिवालिक वन क्षेत्र में हाथी की प्रथम पीढ़ी के जबड़े का एक जीवाश्म मिला है. वह भी जंगल में एक वन गुर्जर के डेरे पर खेल रही बच्ची के हाथ में, जिसकी कार्बन डेटिंग से खुलासा हुआ है कि यह 50 लाख से एक करोड़ साल पुराना और डायनासोर युग के एक दम बाद का है. इसे मैमथ या स्टेगोडॉन भी कहा जाता था. हिमालय पर्वतमालाओं की इस श्रृंखला के पुराणों में उल्लेख पर विज्ञान की भी मुहर लग गई है.

मुख्य वन संरक्षक शिवालिक रेंज वीके जैन के मुताबिक, “डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड) इंडिया द्वारा वन्य जीवों का कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण किया जा रहा है. इसी दौरान पिछले हफ्ते सहारनपुर-चकराता मार्ग पर बादशाही बाग के ढाडा जलस्रोत के नजदीक डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के टीम लीडर पी बोपन्ना ने जंगल में बसे वन गुर्जरों के एक परिवार की खेलती हुई बच्ची के हाथ में यह जबड़े का टुकड़ा देखा था. पूछने पर उस बच्ची ने बताया कि यह उसे पास में ही पड़ा मिला. जहां से कुछ अन्य टुकड़े मिले.”

यहीं से इस इतिहास की परतें खुलने की शुरूआत हुई. इन दिनों सहारनपुर के कमिश्नर संजय अग्रवाल हैं, जो खुद वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के शौकीन हैं. अग्रवाल बताते हैं, “जब मुझे बोपन्ना ने बताया कि हाथी के जबड़े का यह जीवाश्म बहुत एतिहासिक है और इससे कोई बड़ा रहस्योद्घाटन हो सकता है तो मैंने इसे देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को भेजा.”

वाडिया इंस्टीट्यूट के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एसी नंदिता और वरिष्ठ वैज्ञानिक आरके सहगल ने इसकी कार्बन डेटिंग से इसके 50 लाख से एक करोड़ साल पुराना होने का दावा किया है. नंदिता कहती हैं, “हमारे लिए यह बेहद जिज्ञासा से भरा अनुसंधान था, क्योंकि हमने इससे पहले इस आकार का जीवाश्म नहीं देखा था.”

बकौल सहगल, “यह जबड़ा विशालकाय स्टेगोडॉन प्रजाति के हाथी का है, जो वर्तमान हाथी के प्रथम पूर्वज रहे. इनके बाहरी दांतों की लंबाई 12 से 18 फुट तक होती थी. साइबेरिया में इन्हें मैमथ नाम से जाना जाता था.” वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक आपदा या संघर्ष के दौरान मौत के बाद यह पानी में बहकर इस जलस्रोत में आकर अटक गया होगा. उत्तर भारत में पाए जाने वाला हाथी का अब तक का यह सबसे पुराना जीवाश्म है, जिसे शीघ्र ही राष्ट्रीय वन्य जीव संग्रहालय को सौंप दिया जाएगा.

वन्य जीवों का नया अभयारण्य है शिवालिक

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के कैमरा ट्रैप के ताजा अध्ययन में शिवालिक वन प्रभाग दुर्लभ वन्य जीवों के नए अभ्यारण्य के रूप में चिह्नित हुआ है. कमिश्नर संजय अग्रवाल के मुताबिक उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क से सटा यह इलाका वन्य जीवों को खूब रास आ रहा है. पहले 20 कैमरों में 20 से अधिक तेंदुए ट्रैप हुए और फिर 33 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में 156 पिलरों पर लगाए 312 कैमरों में 40 से अधिक तेंदुए, हाथी, सांभर, बार्किंग हिरण, चीतल, शाकाहारी मछलियां और मछली पकड़ने वाली बिल्लियों की तीन प्रजातियां मार्टंस, कीविट और येलो थ्रेटेड पाई गई हैं. वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर डॉ. विवेक बैनर्जी बताते हैं, “मोहंड और बड़कलां रेंज में 250 से अधिक पक्षियों और 56 से अधिक तितलियों की प्रजातियां भी मिली हैं.” कमिश्नर का कहना है, “जल्द इस वन क्षेत्र को टाइगर-एलीफेंट रिजर्व के तौर पर विकसित करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा.”

निकट ही सिद्धपीठ शाकंभरी देवी मंदिर

मां दुर्गा के एक रूप मां शाकंभरी देवी की प्राचीन सिद्धपीठ इसी वन्यक्षेत्र में है. पुराणों में इस क्षेत्र में देवी, देवताओं और ऋषि, मुनियों की तपस्या के उल्लेख मिलते हैं. नवरात्रों में लगने वाले मेले में यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं, लेकिन वन क्षेत्र होने के कारण यहां का नियोजित विकास नहीं हो पाया है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें