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मदर्स डेः क्या आज की मां खुद को बच्चों के लिए कुर्बान करेगी?

50 से लेकर 90 के दशक तक माताएँ जिन्होंने एक कुर्बान जीवन जीकर सब कुछ सिर्फ अपने बच्चों के लिए किया या नई सदी की माताएँ जो अब ख़ुद के लिए भी सपने देखती हैं. भारतीय परंपरा में माताओं को यही सिखाया जाता है कि बच्चों को हमेशा ख़ुद से पहले रखना चाहिए. असल में यह सिखाया जाता है कि ख़ुद को भुलाकर बच्चों के लिए जीना चाहिए. पर क्या मैं, या मेरी तरह इस सदी की सैकड़ों अन्य माताएँ एक कुर्बान माँ बन पाएंगी?

प्रतिनिधि तस्वीर प्रतिनिधि तस्वीर

वह एक सुंदर शाम थी. भोपाल का बड़ा तालाब, बारिश के दिनों में जब अपनी सुंदरता से पर्यटकों को मोह रहा होता है तब वह शाम आई जब मैंने पहली बार कुछ क्षणों के लिए अपने भीतर मातृत्व के सुख को भोगने की प्रबल इच्छा महसूस की. वह क्षणिक थी. जैसे आई वैसे ही यथार्थ को छूते ही गायब हो गई. मैं तब शादीशुदा नहीं थी, अतः वह ख़याल शादी के बाद के लिए टाल दिया गया.

पर जब शादी हुई तो वह ख़याल दूर भागने लगा. वो कहते हैं ना जब तक ख़्वाब होता है लुभाता है, और जब सच बन जाए तो उसके साथ जुड़े और भी कई कठिनाइयों भरे सच दिखने लगते हैं. मेरे साथ भी यही हुआ. शादी के बाद जब हर ओर से माँ बनने पर जोर दिया जाने लगा तो मैं सोचने लगी कि क्या मैं वाक़ई माँ बनने चाहती हूँ?

यह सवाल अकेला नहीं आया, इसके साथ कई और भी सवाल आए, मसलन क्या मैं एक नई ज़िन्दगी के पूर्ण सत्कार के लिए तैयार हूँ? क्या मैं निजी सुख और निजी ज़िम्मेदारियों को एक तरफ रखकर उस नन्ही जान पर बिना खीजे, बिना गुस्सा हुए, बिना परेशान हुए हर समय तैयार रहूँगी? क्या मेरे पति इस ज़िम्मेदारी के लिए तैयार हैं?

इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए जब कुछ अनुभवी माँओं से बात की तो उत्तर सुनकर संतुष्टि नहीं हुई.

अधिकांश का उत्तर था कि वे तो बस अचानक यूं ही एक दिन माँ बन गईं. इतना क्यों, अगर, मगर नहीं सोचा था. कुछ ने कहा परिवार का दवाब था, कुछ ने कहा उम्र हो रही थी, तो कुछ ने कहा पति-पत्नी, सास-बहू के आपसी संबंधों को सुधारने के लिए बच्चा कर लिया. क्या वाक़ई माँ बनना बस युहीं हो जाता है? या यूं ही हो जाना चाहिए?

हिंदुस्तान में आज भी स्त्री के लिए माँ बनना वैसा ही है जैसे जीने के लिए साँस लेना. कोई भी स्त्री माँ 'न बनना' न ख़ुद चुनती है न चुन सकती है. अब बदलते ज़माने में आत्मनिर्भर स्त्री शादी न करना चुनने की हिम्मत जुटाने लगी है, मगर वह अकेली स्त्री भी माँ बनने की ख़्वाहिश रखती है. प्रियंका चौपड़ा ने तो यहाँ तक कह दिया था कि उन्हें एक पुरुष की आवश्यकता सिर्फ अपने बच्चे पैदा करने के लिए है, मगर क्या स्त्री कभी भी इस बात पर मंथन करती है कि माँ क्यों बनना? कब बनना?

हम भारतीयों में अधिकांश महिलाएँ एक नैतिक जिम्मेदारी की तरह यह कार्य करती हैं. हमारी माताएँ भी कभी खुलकर हमसे अपने उन नौ माहों के अनुभव नहीं बाँटती. एक लकीर खिंची होती है, जिसके दायरे में रहकर जब बेटियाँ माँ बनने की खुशखबरी सुनाती हैं तो बड़ी-बुजुर्ग बच्चे का ख़याल रखने के, कैसे क्या करना है आदि के कई नुस्ख़े बताती हैं. परंतु उस दौरान वे किस मानसिक उतार-चढ़ाव से गुज़रीं इस पर कभी खुलकर चर्चा नहीं होती. हो भी कैसे? यह विषय ही ऐसा बना दिया है जिसमें औरत की संपूर्णता, और एक प्राकृतिक ज़िम्मेदारी का बोझ उस पर रहता है. कोई भी औरत जाने कैसे गर्भ धारण करते ही माँ बन जाएगी, हर उस बात को समझ लेगी यह मान लिया जाता है.

दुनिया के लिए भले वह बच्चा तब अस्तित्व में आता हो जब वह जन्म लेता है. पर एक माँ के लिए वह उसी दिन जन्म ले चुका होता है जब वह उसके गर्भ में आता है. हर बच्चे की उम्र उसकी माँ के भौतिक उम्र से नौ माह अधिक होती है क्योंकि उसने बिताए होते हैं वे नौ मा उसके साथ, उसे अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाकर. सोते-जागते, उठते बैठते वह हर समय उस बच्चे को जी रही होती है.

ये नौ माह देखने में जितने सुंदर दिखते हैं असल में अधिकांश स्त्रियों के लिए उतने ही कठिन होते हैं. पर वे इन्हें जी जाती हैं, क्योंकि इसे विधि का विधान बना दिया गया है. उफ्फ किए बिना वे इसे एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी और आदर्श का प्रमाणीकरण मानकर निभाती जाती हैं. वे किसी से नहीं कहतीं उन दिनों की बातें. हर दिन कैसा होता है? कितने अनुभव? कितनी बातें? आप कल्पना कीजिए आपके भीतर किसी के अस्तित्व को नौ माह तक….

मैंने भी ऐसी ही एक कल्पना के साथ यह सफर शुरू किया और जानने की कोशिश की… पहली बार अपनी माँ के करीब बैठ पूछा कि वे नौ माह कैसे थे जो सिर्फ उसे पता हैं… जो किसी तस्वीर में कैद नहीं हो पाए और जिनमें सबसे ज़्यादा संस्कार एक बच्चे को मिलते हैं. माँ को कुछ याद रहा कुछ नहीं. हममें से कितने होंगे जिन्होंने कभी उन सुहाने दिनों को जानने की ख़्वाहिश, उन दिनों की तकलीफों को माँ से जानना चाहा होगा?

हम सभी ने अपनी माँ को माँ बने हुए देखा... माँ बनते हुए नहीं. बच्चे के जन्म के बाद से लेकर उसके परिपक्व हो जाने और उसके भी बच्चे हो जाने तक की यात्रा आजीवन चलती है. घर-परिवार, माहौल, समाज सभी इसमें सहयोगी होते हैं. मगर वे नौ माह जब बच्चा माँ के भीतर उसी का अंग बनकर पलता है, वे दोनों एक ही शरीर की तरह जीते हैं, कैसे होते हैं वे नौ माह? ख़ुशख़बरी मिलने के पहले दिन से लेकर बच्चे के जन्म तक के नौ माह एक बेहद अनोखी और एहसासों के अलग-अलग रंगों से सराबोर यात्रा रहती है.

पहले माह में जब थकान, उनींदे रहना, ब्लडप्रेशर कम-ज़्यादा होना, दूसरे माह में जब उल्टियां होना, सूंघने की क्षमता में इज़ाफ़ा होने से कई सारी वस्तुओं की सुगंध दुर्गंध लगने लगना, उबकाई आना, कभी गर्मी तो कभी सर्दी, जीभ की लोलुपता बढ़ना, ब्लेडर पर बढ़ते प्रेशर से बार-बार बाथरूम के बढ़ते चक्कर, थकान और न जाने कितने ही तरह के शारीरिक बदलावों से गुज़रता दौर होता है वह.

एक शरीर जो हर समय मेहनत कर एक और शरीर एक और जीवन अपने भीतर तैयार कर रहा होता है. अहा! सोचकर ही कितना रोमांचक लगता है ना. कितना सुंदर लगता है. बस यही सुंदरता का अहसास, अपने बच्चे से पनपती मोहब्बत, उसे छू लेने और देख पाने की ख़्वाहिश ही तो होती है जो बन रही माँ को हर दुःख, हर तकलीफ़ सहने की शक्ति देती है. और एक दिन पीड़ा की पराकाष्ठा पर पहुँचकर वह माँ उस नन्ही जान को इस दुनिया में लाती है.

हम जिस युग में जी रहे हैं, यहाँ गर्भ धारण से पहले एवं जन्म देने में बाद कुछ सवाल माताओं को ख़ुद से करने चाहिए. पहले के सवालों का तो ऊपर ज़िक्र किया है पर बाद के कौन से सवाल? बाद में तो बस बच्चे के साथ जागने वाली रातें, उसकी भीगती और गंदी होती लंगोटियाँ, उसके समझ से परे लगने वाले रुदन और उसकी भूख से जो चक्र शुरू होता है वह आजीवन बढ़ती और बदलती ज़िम्मेदारियों के साथ चलता जाता है. बस, यहीं होती है ज़रूरत ख़ुद से उन सवालों को करने की… मैं कैसी माँ बनूँगी? या मैं कैसी माँ बनना चाहती हूँ?

यह कैसी सुनने में थोड़ा अजीब लगता है ना? पर इसका हल बहुत सरल सा है… 50 से लेकर 90 के दशक तक माताएँ जिन्होंने एक कुर्बान जीवन जीकर सब कुछ सिर्फ अपने बच्चों के लिए किया या नई सदी की माताएँ जो अब ख़ुद के लिए भी सपने देखती हैं. भारतीय परंपरा में माताओं को यही सिखाया जाता है कि बच्चों को हमेशा ख़ुद से पहले रखना चाहिए.

असल में यह सिखाया जाता है कि ख़ुद को भुलाकर बच्चों के लिए जीना चाहिए. पर क्या मैं, या मेरी तरह इस सदी की सैकड़ों अन्य माताएँ एक कुर्बान माँ बन पाएंगी? कितना अच्छा हो कि हम अपने पढ़े-लिखे होने का, नए अनुभवों का इस्तेमाल करते हुए एक सामंजस्य स्थापित करें. हम अपने बच्चों के लिए जीते हुए अपने लिए भी जिएं. संस्कार और सभ्यता सिखाते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं, खासकर पुत्रों को. उनकी महत्ता समझते हुए उन्हें हमारी महत्ता और सपने समझाएं.

इस मदर्स डे पर बस यही वादा करें ख़ुद से कि नई सदी में एक नया रूप माँ का उकेरना है जो अपने लिए भी जीती है… और अपने बच्चे के लिए भी. जिसे पता है कि उसे बच्चा कब और क्यों चाहिए. जो बच्चे को एक सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं वरनअपनी एक निजी चाहत के रूप में इस दुनिया में लाए और पूर्ण रूप से तैयार होने के बाद ही यह जिम्मेदारी उठाए.

(अंकिता जैन वैदिक वाटिका की निदेशक और सीडैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग में एक्स रिसर्च एसोसिएट और साहित्यकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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