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दुष्कर्म के वीडियो का बाजार समाज की अराजक स्थिति बताता है

अब बलात्कार सिर्फ़ क्षणिक सुख के लिए नहीं बल्कि पैसे कमाने के लिए भी किया जाने लगा है. गैंगरेप के वीडियो की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है. 

फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे फोटो सौजन्यः इंडिया टुडे

22 नवम्बर 2019 बरेली में पांच लोगों ने किया नाबालिग़ लड़की के साथ गैंग-रेप. वीडियो बनाकर किया वायरल.

3 नवंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में छः लोगों ने महिला के साथ किया गैंगरेप. पुलिस ने महिला की कम्प्लेन तब लिखी जब गैंगरेप का वीडियो हुआ था वायरल.

23 सितम्बर 2019 को बिहार के नालंदा से एक वीडियो वायरल होता है तब जाकर प्रशासन को पता चलता है कि एक 13 साल की लड़की के साथ गैंगरेप हुआ है. लड़की वीडियो में लगातार बोल रही होती है कि बहन समझ कर छोड़ दो मगर बारी-बारी से वहां मौजूद सभी लड़के उसका बलात्कार करते हैं.

इसका मतलब है अब बलात्कार सिर्फ़ क्षणिक सुख के लिए नहीं बल्कि पैसे कमाने के लिए भी किया जाने लगा है. गैंगरेप के वीडियो की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है. अपना नाम नहीं बताते हुए बिहार के एक मोबाईल दुकानदार ने बताया कि, पॉर्न स्क्रिप्टेड और रिपीटेड होता है. इक्सायट्मेंट के लिए कस्टमर गैंगरेप के वीडियो डाउनलोड करते हैं.”

ये तो महज़ बानगी भर है. न जाने ऐसी कितनी ही वारदातें जो वक़्त के पन्नों पर दर्ज नहीं हो पाई होंगी. कितनी ही ऐसी पीड़िता होंगी जिनकी शिकायत पुलिस ने दर्ज भी नहीं किया होगा. वह आज भी घुट रही होंगी. वह जब भी किसी और लड़की के साथ हुए गैंगरेप और रेप के वायरल हुए वीडियो के बारे में सुनती होंगी, उनकी रूह कांप उठती होगी. उन्हें वह सब एक बार फिर से याद आता होगा जो उन पर गुज़र चुका है.

आज से कुछ साल पहले जब ये कैमरे वाले मोबाइल फ़ोन नहीं हुआ करते थे, तब बलात्कार की घटनाओं के ऐसे चटखारे लेते वीडियो शेयर होने की घटनाएं न के बराबर सामने आती थीं. ऐसा नहीं है कि तब बलात्कार नहीं होते थे. तब भी होते थे लेकिन अपराधी के पास न तो फ़ोन होता था और न सस्ता इंटरनेट, जिस पर वह पहले आराम से पॉर्न देखे और फिर अपनी कुंठा को शांत करने के लिए बलात्कार करके वीडियो बनाए.

जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी हमारे ज़िंदगी में शामिल होने लगी और कंपनियों ने इंटरनेट की पहुंच सब तक मुहैया करवा दी, सामाजिक अराजकता का नमूना सामने आने लगा है. अब फ़ोन और इंटर्नेट दोनों है लेकिन बौद्धिक रूप से इंसान इतना संयमित नहीं है कि उस टेक्नोलॉजी का सही से अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के काम में ला सके. 

आज की तारीख़ में बलात्कार और गैंगरेप की बढ़ती हुई घटनाओं के पीछे अगर सबसे बड़ा कोई एक फ़ैक्टर है तो इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध पॉर्न. लोग बिना सोचे-समझे वॉट्सऐप और दूसरे सोशल साइट्स पर मस्ती में क्लिप्स शेयर करते हैं. एक वर्ग जिसे समझ है कि इसे डिलीट कर दें वो तो इससे प्रभावित नहीं होता लेकिन वहीं भीड़ का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो इन पॉर्न क्लिप्स को देखकर होशो-हवास खो बैठता है. और उसे कई समूहों में शेयर करता है. फिर दिमाग़ में ख़ुद को वह सब कुछ करता हुआ सोचता है जो वीडियो में हो रहा. फिर ये लड़के प्लानिंग शुरू करते हैं. महीनों तक अपने शिकार पर नज़र बना कर रखते हैं और जैसे ही किसी दिन लड़की अकेली दिखती है ये टूट पड़ते हैं.

लेकिन सिर्फ़ बलात्कार करना इनका अब इकलौता मक़सद नहीं होता. अपने साथियों में ख़ुद को मर्द साबित करना. ये दिखाना की मैंने कितनी बहादुरी का काम किया है ऐसा बोलकर टॉक्सिक मेंटैलिटी को पोषित करना और दूसरे लड़के को ग़लत करने के लिए उकसाना इनका मक़सद होता है.

साथ ही साथ अब गैंग-रेप के ये वीडिओज़ बिकने भी लगे हैं. 30 सेकंड के एक गैंगरेप की वीडिओ की क़ीमत सौ से दो सौ रुपए होती है. उत्तर प्रदेश और बिहार में यह धंधा तेज़ी से बढ़ रहा है. कई बार बलात्कार करने का उद्देश्य पैसा कमाना होता है. जो बलात्कार कर रहे होते उनके दिमाग़ में पीड़िता को ब्लैकमेल करके उनसे पैसे वसूली करना और उस क्लिप को बेचकर पैसे कमाने की योजना भी चल रही होती है. वो ये बिलकुल भी नहीं सोचते कि वायरल होने के बाद उस लड़की की ज़िंदगी क्या होगी. और ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि प्रशासन को इसकी ख़बर नहीं हो. ये लोकल पुलिस और राजनेताओं के नाक के नीचे आसानी से हो रहा होता.

कल भी एक पॉर्न साइट पर हैदराबाद में गैंग-रेप कि शिकार हुई डॉक्टर प्रियंका रेड्डी का नाम ट्रेंड कर रहा था. अब आप इसी बात से अंदाज़ा लगाइए कि समाज किस क़दर गर्त में गिरता जा रहा है. हम लाख कैंडल मार्च निकाल लें, सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंडिंग करवा लें लेकिन उससे कुछ नहीं होने वाला. जब तक समाज के आख़िरी पंक्ति में खड़े लोगों को शिक्षित और सेंसेटाईज़ नहीं किया जाएगा तब तक कुछ नहीं बदलने वाला.

जब भी निर्भया और प्रियंका रेड्डी जैसी घटनाएं घटती हैं, हम थोड़ा विरोध करके चुप हो जाते हैं. हम लड़कियों को ताकीद देने लगते हैं बिना समस्या की गहराई में गए. सेक्स को लेकर जब तक हम ऐसे कुंठित रहेंगे, उस पर चर्चा और बच्चों खासकर लड़कों से बात नहीं करेंगे कोई बदलाव नहीं आने वाला. और ये बदलाव एक रात में नहीं आने वाला. हम सबको अपने-अपने स्तर पर काम करने की ज़रूरत है. 

(अनु रॉय मुंबई में रहती हैं और महिला और बच्चों के लिए काम करती हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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