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सियासत नहीं कश्मीरी पंडितों के जख्मों को चाहिए मदद का मरहम

कितने कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर घाटी छोड़ी, कितने कश्मीरी पंडित मार दिए गए? हैरत की बात है कि इसका जवाब भारत के गृह-मंत्रालय के पास नहीं है. पत्रकार हैं अशोक उपाध्याय ने आरटीआइ (RTI) के जरिए यह सारे सवाल उठाए थे, जिनका जवाब गृहमंत्रालय नहीं दे पाया.

जम्मू में प्रदर्शन करते कश्मीरी पंडित जम्मू में प्रदर्शन करते कश्मीरी पंडित

कश्मीर का मुद्दा दशकों पुराना है. कश्मीर की व्यथा-कथा का जिक्र जब भी आता है तो इसमें सबसे ज्यादा कश्मीरी मुस्लिमों, सेना के किस्से सुनाए जाते हैं.कश्मीरी पंडितों का जिक्र यदाकदा ही होता है. पर पिछले कुछ सालों में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई हिंसा का हवाला कई बार दिया गया. अनुच्छेद 370 के ज्यादातर हिस्सों के हटाने का सरकार का ऐलान हो या फिर हिंसा के दौर से गुजर रही लहूलुहान घाटी. कश्मीरी पंडितों को इस दौरान कम से कम याद जरूर किया गया.

वर्तमान सरकार ने भी कश्मीरी पंडितों को वापस घाटी में बसाने का वादा किया. लेकिन हकीकत में कश्मीरी पंडितों की दशा जानने के लिए क्या कोई कदम उठाए गए? आखिर अपना बसा बसाया घर छोड़कर आए कश्मीरी किन हालात में हैं. कश्मीर छोड़ आने के बाद उनके साथ क्या-क्या हुआ? सब कुछ.

सबसे बुनियादी सवाल, ''कितने कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर घाटी छोड़ी, कितने कश्मीरी पंडित मार दिए गए?'' हैरत की बात है कि इसका जवाब भारत के गृह-मंत्रालय के पास नहीं है. पत्रकार अशोक उपाध्याय ने आरटीआइ (RTI) के जरिए यह सारे सवाल उठाए थे, जिनका जवाब गृहमंत्रालय नहीं दे पाया. आज तक कोई जांच कमेटी नहीं बनी जो ये जांच कर सके कि आखिर कितनी मौतें हुईं. जो जिंदा बच गए उनका क्या हाल है? कुछ कश्मीरी पंडित जो अभी भी घाटी में हैं उनकी जिंदगी कैसी है.

हकीकत ये है कि सरकार चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस की दोनों ने ही वोट बैंक के तौर पर कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया है. विस्थापित कश्मीरियों के हालात बदल जाएं इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए. मोदी जी ने 2015 में इन कश्मीरियों को उनके घर वापसी का सपना दिखाया था. साथ ही साथ अलग से कॉलोनी बनाई जाएगी ये वादा भी किया गया था. अब 2020 है और न तो कश्मीरी पंडितों को घर वापसी नसीब हुई है और नहीं वो कॉलोनी तैयार हुई हैं. दिल्ली में टाउनशिप बने थे इनके रहने के लिए उनका भी हाल बुरा है. उनमें रह रहें कश्मीरी पंडित अपने ज़िंदगी के बस दिन काट रहें हैं. जीना उन्होंने छोड़ दिया है. साथ ही साथ उन्होंने ये भरोसा भी करना छोड़ दिया है कि एक दिन वो वापिस कश्मीर जाएंगे.

एक कश्मीरी पंडित कहते हैं, “बेटा जी कश्मीर वापस जाने का मन किसे नहीं करेगा. हमारा घर था वो. हमारी जमीनें थीं वहां. मरने के बाद हम वहीं की मिट्टी में मिल चिनार बन कर उगना चाहते हैं. लेकिन एक बात बताइए हम 1990 में कश्मीर छोड़ आए. अब तीस साल गुजर चुके हैं. हमारे बच्चे यहीं पैदा हुए. अब पढ़-लिखकर देश के अलग-अलग जगहों पर नौकरियों में लगे हैं. सरकार कहती हैं कि हमारे लिए अलग से कॉलोनी बनवाकर घर-वापसी करवाएगी. एक बात बताइए कि क्या सिर्फ घर बना कर दे देने से जिंदगी चलती रहेगी? जिंदगी को चलाने के लिए नौकरी तो चाहिए न. अब यहां से सब छोड़कर कश्मीर तभी जाएंगे न जब वहां भी आमदनी का कोई जरिया हो. वहां का हाल क्या है ये किसी से छिपा तो नहीं हुआ है. और यहां हम किस हाल में जी रहें हैं यह भी किसी से नहीं छिपा. अपनी जमीन छूट जाए इससे ज्यादा बदकिस्मती क्या होगी.”

ये सिर्फ एक कश्मीरी पंडित का दुःख नहीं लगभग उन चार लाख कश्मीरी पंडितों का दुःख है जो दिसंबर 1990 में जान बचा कर देश के अलग-अलग जगहों में जा बसें. हां तब इनके पास उम्मीद थी कि एक दिन ये लौटेंगे अपने घर को. लेकिन अब ये उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही है. विश्वास टूटता सा दिख रहा.

शायद पहली बार किसी निर्देशक ने कश्मीरी पंडितों की व्यथा परदे पर उतारने का मन बनाया. विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘शिकारा’ का ट्रेलर उन सभी घावों को हरा कर देता है जो कश्मीरी पंडितों को तकरीबन चार दशक पहले मिले थे. फिल्म के दो मिनट के ट्रेलर की शुरुआत होती है जहां एक प्रेमी जोड़ा अपने महफूज ठिकाने में बैठ आने वाले दिनों के सपने बुन रहा. तभी खिड़की से लड़की को किसी का घर जलता हुआ दिखता है और फिर तबाही का वो मंजर सामने आता है, जिसमें लगभग चार कश्मीरी पंडितों को घर छोड़कर जाते दिखाया गया है. बाद के दृश्यों में शरणार्थी कैंपों में उनके साथ क्या गुजरती इसकी दर्दनाक तस्वीर दिखाई गई है. यह फिल्म नहीं कश्मीरी पंडितों के साथ हुए हादसों की सच्ची तस्वीर है.

उम्मीद है कि इस फिल्म को देखने के बाद शायद सरकार की आंखें खुलें. वो भाषणों के अलावा कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ करने की भी सोचे. हालांकि अब देर तो बहुत हो चुकी है फिर भी हिंसा के दौरान. इस जांच के जरिए मर चुके कश्मीरी पंडितों के आंकड़े इकट्ठे किए जाएं. इन आंकड़ों का इस्तेमाल कर मृतकों के परिवार वालों को जरूरी मदद पहुंचाई जानी चाहिए. सिर्फ अनुच्छेद 370 हटा देने से कुछ नहीं होने वाला. जमीनी स्तर पर काम करना जरूरी है. जख्म तब जाकर कहीं घावों पर मरहम लगेगा. केवल सियासी फायदे के लिए कश्मीरी पंडितों के साथ हुई हिंसा का हवाला देकर जख्म कुरेदने की जगह सरकार को मदद का मरहम लगाना चाहिए.

अनु रॉय महिला आधिकारोें और कश्मीर मामलों पर लगातार लिखती हैं.

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