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कुर्सी का दंगा और फिर राजनीति

जब जिले की सीमाएं सील हैं तो वहां अखिल भारतीय हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पांडे चंदन के घर कैसे पहुंच गईं?

कासगंज हिंसा कासगंज हिंसा

शुक्रवार का दिन, 26 जनवरी 2018 को यूपी के छोटे से कस्बे कासगंज में कथित तौर पर तिरंगे को लेकर दंगा हुआ जिसमें एक जान चली गई, करोड़ों का नुकसान हुआ और जो सामाजिक भरोसा टूटा उसकी कोई कीमत ही नहीं लगाई जा सकती. इस सवाल का जवाब तो शायद ही मिले कि ये दंगा एक साजिश थी क्योंकि अभी तक मुजफ्फरनगर दंगे की साजिश का सच सामने नहीं आ सका है.

जाहिर है बाद की जांचों पर राजनीति हावी हो जाती है और आरोपियों को छोड़ने का क्रम शुरू हो जाता है. यूपी में अखिलेश यादव की सपा सरकार आतंकवादयों तक से केस हटाने की पहल कर चुकी थी. अब मौजूदा भाजपा सरकार मुजफ्फरनगर दंगे के आरोपियों से केस हटाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है. पुलिस का नाकारापन दोनों ही मामलों में बराबर की भूमिका में दिखाई देता है.

मुजफ्फरनगर दंगे में भी छेड़छाड़ के आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया और बाद में वहां एके-47 जैसे हथियार भी बरामद हुए थे. कासगंज दंगे में भी हत्या के मुख्य आरोपी के घर से बंदूक, विदेशी पिस्टल बरामद हुई और वह भी चार दिनों में गिरफ्तार नहीं किया जा सका है. पुलिस प्रशासन का नाकारापन घटनाक्रम से और स्पष्ट हो जाता है.

गणतंत्र दिवस की बाइक रैली निकालने के लिए कुर्सियां हटाने की जिद, हाथ में तिरंगे के साथ भगवा झंडे और मुंह से निकलते हिंसा के शब्द. यहां सबसे पहले शब्दों की हिंसा हुई और इसके बाद आग नफरत की लगी. अपशब्द बोले गए. सोशल मीडिया में सक्रिय लोगों ने कासगंज की आग में क्विंटलों घी डाल दिया है. ज्यादातर ट्वीट और पोस्ट दंगे को पाकिस्तानपरस्त और राष्ट्रवादियों के बीच की जंग बता रहे हैं और कुछ टीवी चैनल भी इसी राह पर चल रहे हैं.

26 जनवरी को आमतौर पर ज्यादा सुरक्षा रहती है और शुक्रवार को तो खासतौर पर पुलिस की अच्छी तैनाती यूपी के मुस्लिम धार्मिक स्थलों के आसपास होती है. एलआईयू सक्रिय होती है, होटलों और लाजों की तलाशी होती है लेकिन कासगंज में कुछ नहीं हुआ.

सुबूत ये है कि 28 जनवरी को लाज से पिस्टल और बम बरामद होते हैं. इतना ही नहीं 26 जनवरी को सुबह 10 बजे टकराव होता है और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. 11 बजे फिर तनातनी होती है और 12 बजे चंदन नामक युवक की हत्या हो जाती है. पेट्रोल बम भी चलते हैं.

आखिर गणतंत्र दिवस की तैयारी प्रशासन ने कैसे की थी कि आगजनी और हिंसा हो गई. चंदन गुप्ता की हत्या तक का घटनाक्रम तैश में हुआ भले ही लगे लेकिन इसके बाद हुई लूटपाट और आगजनी और राजनीति साजिश का हिस्सा जरूर लगती है.

जब जिले की सीमाएं सील हैं तो वहां अखिल भारतीय हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा शकुन पांडे चंदन के घर कैसे पहुंच गईं और टीवी पर भाषण देने लगीं. सबसे खतरनाक बात ये है कि भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के नेता लगातार दंगे को तिरंगे की अस्मिता से जोड़कर मुसलमानों को इसका विरोधी करार दे रहे हैं.

जबकि घटनास्थल की तमाम रिपोर्टें साफ कह रही हैं कि वीर अब्दुल हमीद तिराहे पर मुस्लिम समुदाय ने अपना गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम आयोजित किया था. ये पिछले साल भी हुआ था और एबीवीपी की बाइक रैली भी पिछले साल निकली थी लेकिन इस बार सड़क पर कुर्सियां पड़ी थीं.

इनको हटाने को लेकर हुई बहस में गोली चल गई. जाहिर है ये साफ तौर पर आपराधिक घटना थी लेकिन बाद में इस पर तनाव बढ़ा, दंगा फैला और अब राजनीति हो रही है.

सोशल मीडिया से लेकर विजुअल मीडिया तक उपस्थित भाजपा नेता तिरंगे की शान से जुड़े सवालों की बौछार कर रहे हैं. ये एक समुदाय को बेवजह कठघरे में खड़े करने जैसा है, क्योंकि अपराधी से किसी समुदाय की पहचान नहीं होती. अगर ऐसा होता तो देश में किसी भी धर्म के लोग सिर उठाकर चलने लायक नहीं रहते क्योंकि जघन्य वारदात करने वाले लगभग सभी धर्मों में है.

कासगंज का माहौल लगभग सामान्य होता जा रहा है लेकिन इसका राजनीतिक इस्तेमाल लगातार बढ़ता दिख रहा है. ये और बढ़ेगा और शायद 2019 तक इसका राजनीतिक इस्तेमाल होता रहे, साजिश ये है.

(मनीष दीक्षित इंडिया टुडे में असिस्टेंट एडिटर हैं.)

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