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कोरोना संकट के दौर में परिवहन के लिए साइकिल मुफीद साधन है

कोरोना काल में साइकिल की सवारी सस्ती और सुलभ होने के साथ ही स्वास्थ्य के लिहाज से भी मुफीद होगी. पर सरकारों ने नगर नियोजन में साइकिलों के बारे में बहुत कम सोचा है. चमक-दमक के पीछे भागने वाला भारतीय मध्य वर्ग वैसे भी साइकिलों पर चलना हेठी समझता है.

फोटोः इंडिया टुडे फोटोः इंडिया टुडे

कोरोना काल में साइकिल बहुत सारी समस्याओं का समाधान है. एक मित्र ट्विटर पर साइकिल को बढ़ावा देने के लिए सरकार को टैग करते हुए ट्वीट किया तो काफी लोगों ने समर्थन किया. ये सही है कि साइकिल वक्त की ज़रूरत है.

शहरी एजेंसियों को चाहिए कि तत्काल साइकिल लेन चिह्नित करें और साइकिलिंग को बढ़ावा दें.

कम से कम 15-20 किमी तक लोग आराम से ड्यूटी पर जा सकते हैं. इस कोरोना महामारी काल में और अन्यथा भी साइकिल अर्थव्यवस्था से लेकर प्रकृति से तालमेल बिठाकर चलने के लिए भी ज़रूरी है.

हमारे वरिष्ठ अनिल दुबे ने ट्विटर पर लिखा कि जर्मनी की सरकार वहां के दस शहरों को साइकिल लेन से जोड़ने काम कर रही है, भारत में शहर के अंदर भी हो जाए तो बहुत है. जर्मनी और यूरोप के अन्य देशों में भी लोग साइकिल का खूब उपयोग करते हैं, जबकि जर्मनी कार के निर्माण में सिरमौर है.

मेरे एक वरिष्ठ सह मित्र प्रोफेसर जब जर्मनी गए तो उन्होंने लोगों से पूछा कि वे लोग कार का प्रयोग क्यों नहीं करते. तो उनका कहना था कि कारें जगह बहुत लेती हैं और साइकिल चलाने से स्वास्थ्य भी ठीक रहता है!

दरअसल, हमारी सोच ही अभिजात हो चली है. हम सड़कों का निर्माण कार या चौपहिया वाहनों के लिए करते हैं, हमारे नक्शे में साइकिल सवार नहीं है. देश के नए-नए बस रहे शहरों, सेक्टरों या उप-नगरों तक में साइकिल लेन का इंतजाम नहीं है. कहीं है भी तो लोग उसका प्रयोग नहीं करते, क्योंकि साइकिल हमारी सोच में नहीं है या लोगों को लगता है कि साइकिल पर चलना कम हैसियत का मामला है.

हमारा पूरा शासनतंत्र संभ्रात-वर्ग की सेवा के लिए बनाया गया है. उसकी सोच में आम आदमी नहीं है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल ये है कि हवाई सेवा में बाधा होने पर हंगामा मच जाता है जबकि रेल या बस सेवा में बाधा आती रहती है, लेकिन सिस्टम के कान पर जूँ नहीं रेंगती.

दिल्ली जैसे शहरों में तो साइकिल चलाना मानो मृत्यु को न्योता देने के बराबर है. हां, अगर नगर प्रशासन चाहे तो साइकिल लेन बनाकर इस समस्या को सुलझाया जा सकता है. जहां संभव हो सड़कों पर पक्का रेखांकन और साइकिल लेन नियत किया जाए. क्योंकि वैसे भी हम बसों में या मेट्रो में इस महामारी के वक्त सोसल डिस्टेंसिंग का कितना पालन कर पाएंगे, भगवान ही जानता है. और वैसे भी महामारी काल बीतने के बाद भी साइकिल हमारा प्राणवायु बन सकती है. वह ईंधन बचा सकती है और कीमती विदेशी मुद्रा भी. लोगों के स्वास्थ्य में जो सुधार आएगा, वह अतिरिक्त होगा.

हां, हमें सिर्फ अपनी सामंती मानसिकता का त्याग करना होगा कि साइकिल पर निचले तबके के लोग चढ़ते हैं. देखा जाए तो व्यापक स्तर पर साइकिल की सवारी से समतामूलक भावना के निर्माण में भी मदद मिलेगी. फिलहाल, तो स्थिति ये है कि जो जितनी लंबी कार वाला है, वो उतना ब़ड़ा आदमी है.

भारत जैसे देशों में जहां हाल तक घरों में बेटों को चाय और रोटी बनानी नहीं आती थी, वहां ये समस्या कई स्तर पर है. कई लोग साइकिल के विचार से सहमत नहीं होंगे, वैसे भी यह कानूनन वाध्यकारी नहीं है. लेकिन सबसे बड़ी बात ये कि इस विचार को प्रसारित करने के लिए जो समाजिक और प्रशासनिक मनोदशा चाहिए, उसका घोर अभाव है.

अभी भी कई राज्यों के मुख्यमंत्री या कई बार सांसद भी कभी-कभार अपनी आम आदमी की छवि दर्शाने के लिए साइकिल पर चलते हुए फोटो खिंचवा लेते हैं. हमलोग जब बचपन में थे तो बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री की ऐसी तस्वीरें कभीकभार अखबार में देख लेते थे. लेकिन वैसे राज्यों में भी अलग से साइकिल लेन को बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं किया गया.

हालांकि, लड़कियों की शिक्षा और स्त्री अभिव्यक्तिकरण को बढ़ावा देने में साइकिल का क्या महत्व है, इसे बिहार से बेहतर शायद ही कोई राज्य जानता होगा, जब बिहार सरकार की पहल पर स्कूल जानेवाली लड़कियों को साइकिल दी गई. साइकिल की सुविधा, उसके आकर्षण और उससे उपजे आत्मविश्वास ने एक ऐसा युगांतकारी काम कर दिया, जो अन्यथा करोड़ों-अरबों की योजनाएं दशकों में नहीं कर पाई थी.

जो लोग गांव में पले-बढ़े हैं उन्हें मालूम है कि साइकिल पर आठ-दस किलोमीटर आना-जाना कितना आम है, कभी किसी हाट-बाजार के काम के लिए तो कभी प्रखंड मुख्यालय पर जाने के लिए.

मीडिया संस्थान में काम करनेवाले मेरे एक मित्र के मित्र ने कुछ साल पहले साइकिल से ऑफिस आना-जाना शुरू किया जो उनके घर से दस किलोमीटर नोएडा फिल्म सिटी में था. लेकिन कुछ ही दिन बाद किसी कार ने उन्हें धक्का दे दिया, उसके बाद उनका नशा काफूर हो गया.

असल में, समस्या ये है कि कोई इच्छा भी करे तो यहाँ सिस्टम मौजूद नहीं है. यहाँ की सड़कें कार या चौपहिया वाहन वालों के लिए है. ट्विटर पर चर्चा के दौरान किसी ने सवाल उठाया कि दिल्ली जैसे शहर में इस चिलचिलाती धूप में कोई साइकिल से दस-पंद्रह किलोमीटर कैसे जा सकता है? सवाल उचित है, लेकिन एक तो आपतकाल में ये कोई बड़ा मसला नहीं है. दूसरा, एक बार शुरुआत हो तो उसका भी हल निकल सकता है.

हम इस पर विचार कर सकते हैं साइकिल लेन को कैसे सुविधाजनक बनाया जाए, नए सेक्टरों या शहरों में उसके दोनों तरफ छायादार पेड़ लगाए जा सकते हैं और वैसे भी ठंड के मौसम में तो साइकिल चलाई ही जा सकती है. एक समस्या विशाल महानगरों का निर्माण भी है जहां ऑफिस और घर की दूरी 30-30, 40-40 किलोमीटर तक हो गई है.

बड़े महानगर उच्च वर्ग, नौकरशाही और पूँजीपतियों के लिए तो मुफीद हैं, जिनके लिए व्यवस्था का संचालन, बड़ी संख्या में मानव श्रम और एक ही जगह बड़ा बाजार उनके लिए अनुकूल होते हैं, लेकिन हकीकत में यह एक जनविरोधी व्यवस्था है. विकेंद्रितव्यवस्था, छोटे शहरों का विकास, गांव व कस्बों के विकास पर जोर ही इस समस्या का निदान है.

किसी गांव के शिक्षक के लिए एक कम भीड़भाड़ वाली सड़क पर साइकिल चलाते हुए 5 किलोमीटर जाना आसान है, लेकिन कल्पना कीजिए कि वैसा वो दिल्ली के किसी केंद्रीय स्थल पर स्थित स्कूल जाने के लिए ऐसा करे? अव्वल तो वह ऐसी केंद्रीय जगह पर, स्कूल के आसपास अपनी उस हैसियत में मकान नहीं हासिल कर पाएगा और अगर किसी तरह कर भी लिया तो उसकी साइकिल को कोई चौपहिया वाहन धक्का देकर निकल जाएगा. समस्या मानसिकता की है और व्यवस्था की भी है.

इस लेख लिखने से पहले मैं सुदर्शन की कहानी ‘साइकिल की सवारी’ पढ़ रहा हूँ जो हमारे बिहार बोर्ड के पाठ्यक्रम में शायद कक्षा 6 या 7 में थी. एक वो जमाना था कि साइकिल पर चढ़ना गौरव की बात थी.

हमें साइकिल को फिर से वो गौरव देना होगा. तभी हम बचेंगे और पर्यावरण भी बचेगा.

(सुशांत झा पेंगुइन-हिंद पॉकेट बुक्स में कमिशनिंग एडिटर हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं)

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