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बोझिल पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बाल साहित्य से अधिक सीखते हैं बच्चे

किसी तरह से उपलब्ध हो जाने पर अगर बच्चे बाल साहित्य की किताबें पढ़ते भी हैं तो उन्हें यह कहकर टोक दिया जाता है कि पहले कोर्स पर ध्यान दो. क्या बाल साहित्य कोर्स पूरा करने की राह में बाधक है? ऐसी कई सारी नकारात्मक बातें पहले से ही बाल साहित्य को लेकर प्रचलन में हैं. किरण तिवारी का यह लेख ऐसे ही कई सवालों के जवाब इस व्यवस्था में ढूंढ रहा है. 

चंद्र किरण तिवारी चंद्र किरण तिवारी

बेबाक/ चंद्र किरण तिवारी

पिछले चालीस-पचास वर्षों के दौरान भारत में शिक्षा को रोजगार से जोड़कर देखने का प्रचलन बढ़ा है. बल्कि शिक्षा का ढांचा भी इसी प्रकार से तैयार किया गया कि आगे चलकर वह शिक्षित व्यक्ति को किसी सिस्टम में फिट कर सके. आम जनमानस यह सोचकर अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहता है कि आगे जो जितनी अच्छी और ज्यादा पढ़ाई करेगा वो उतनी ही अच्छी नौकरी या व्यवसाय करेगा. 

शासन या समाज अब तक निश्चित नहीं हो पाया है कि शिक्षित व्यक्ति एक अच्छा नागरिक या अच्छा इंसान हो सकता है जो अपने लिये नौकरी या किसी भी प्रकार के रोजगार की संभावना बना सकता है. जिसके लिये सिर्फ पाठ्यपुस्तक की बाध्यता नहीं होनी चाहिए. 

लेकिन पूरा शिक्षा तंत्र परीक्षा की धुरी पर टिका हुआ है. 

जो परीक्षा में ज्यादा अंक लायेगा वही सफलता की सीढ़ियों पर आगे बढ़ता जायेगा, और ये पूरी शिक्षा व्यवस्था पाठ्यपुस्तकों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. दुर्भाग्य से जिसका पूरा ढांचा लगभग एक शासक तंत्र तैयार करता है. जिसमें चुनिंदा लोगों के अलावा लगभग किसी की सहभागिता नहीं होती है (कभी सुझाव के तौर पर शिक्षा नीति से खानापूर्ति कर दी जाती है).|

जब सामग्री तैयार हो जाती है तब उसे पाठ्यपुस्तक के नाम पर समाज पर थोप दिया जाता है. इन्हें स्कूलो में आराम से अपना लिया जाता है क्योंकि एक बनी-बनाई व्यवस्था को बिना परिश्रम किये बस बच्चों के ऊपर एक तरह से आरोपित करना होता है. ऐसी स्थिति में बाल साहित्य की संभावना ही कहां रह जाती है? पूरे साल स्कूल सिलेबस को पूरा करने और दोहराने के ऊपर केंद्रित रहते हैं. 

भारत में अब तक शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याएं हल नहीं हो पाई हैं. ऐसे में हर माता-पिता सोचते हैं कि बच्चों को ऐसी शिक्षा की तरफ उन्मुख करें जो न्यूनतम रोजगार सुनिश्चित कर सके. 

जाहिर है कि पाठ्यपुस्तकें पढ़कर ही ज्यादा नंबर ला पायेंगे, अच्छे विश्वविद्यालय में पढ़ने के बाद अच्छी नौकरी हासिल करना जीवन का एकमात्र उद्देश्य है. ऐसे समाज में साहित्य, खेलकूद या कलाएं माता-पिता को विचलन ही लगती हैं. और इस प्रकार परिवार भी बाल साहित्य के प्रति उदासीन हो जाते हैं. 

लेखक और विचारक उदयन वाजपेयी अपने लेख में कहते हैं कि "पाठ्यपुस्तक अपने-आप में एक संरचना है. और उसके अंदर क्या है, वह तो विवाद का विषय बनता है, कई बार बल्कि बनता ही रहता है. लेकिन उसके अंदर आप नहीं जाएं तब भी वह स्वयं ही एक ढांचे के रूप में भी चिंता का विषय है." शायद इस ढाँचे को इतनी जल्दी तोड़ा भी नहीं जा सकता.                        

क्या बाल साहित्य पढ़ना कोर्स पूरा करने की राह में बाधक है? 

अक्सर साहित्य या किन्हीं कलाओं को लेकर समाज में एक भ्रम व्याप्त रहता है कि पढ़़ने से या कलाओं के संपर्क में रहने से जरूरी कामों का नुकसान होगा या ये सब एक फिजूल के शौक हैं. जबकि दुनिया में हुए कई शोधों में यह बात निकलकर आई है कि साहित्य या कलाएं किसी के जीवन में विस्तार लाती हैं. 

सोचने-समझने से लेकर चीजों को समझने के विभिन्न दृष्टिकोण देती हैं. इसी प्रकार बाल साहित्य पढ़ने वाले बच्चों के भीतर सकारात्मक विकास होता है. जो उनके पाठ्यक्रम के साथ-साथ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डालता है. 

प्रोफेसर शैलजा मेनन का एक लेख है, "बाल साहित्य के जरिए प्रारम्भिक भाषा एवम्‌ साक्षरता को सींचना". इसमें वह बताती हैं कि कक्षाओं में भाषा एवं साक्षरता शिक्षा को और मजबूती देने के लिये बाल साहित्य का इस्तेमाल कई प्रकार से किया जाता है. इसी लेख में वे बताती हैं कि "श्रेष्ठ साहित्य बच्चों को अपनी जिंदगियों से जुड़ी कहानियों, विचारों और मुद्दों से अवगत कराता है और उन्हें ऐसी जिंदगियों और ऐसी दुनियाओं से वाकिफ भी कराता है जो अभी तक उनके लिये अनदेखी हैं या उनकी कल्पनाओं से भी परे हैं. 

किसी विषय या पाठ को समझने में सहायक बाल साहित्य

बाल साहित्य पढ़ने वाले बच्चों के भीतर उच्चस्तरीय चिंतन की क्षमता का विकास होता है. साहित्य के जरिए वे कई प्रकार की विषयगत जानकारियों को भी पढ़ते हैं. उदाहरण के लिए, प्रारंभिक कक्षा में विद्यार्थियों को विज्ञान या सामाजिक विज्ञान विषय नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन कई कहानियों, कविताओं इत्यादि के माध्यम से बच्चे इन विषयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्रियों से कुछ हद तक अवगत हो जाते हैं. जो आगे की कक्षाओं में उनके पूर्वज्ञान से जुड़ते हुए किसी मुद्दे को समझने में सहायक होता है. 

तार्किकता का विकास

किताबें पढ़ते हुए बच्चे कई तरह की घटनाओं से गुजरते हुए, परिस्थितियों के अनुसार उन्हें कुछ सवालों के जवाब मिलते हैं तो कभी वे खुद उलझे हुए अपने लिए जवाब तलाशते हैं. बहुत सारे घटनाक्रमों और मोड़ों से गुजरते हुए अपना विवेक स्वयं इस्तेमाल करना सीख जाते हैं. यहीं से बच्चों के भीतर तार्किक शक्तियों का विकास होना आरम्भ हो जाता है. 

इस तरह का विकास उनके पाठ्यक्रमों में भी उनकी मदद करता है. 

प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ना-लिखना सीखने की चुनौतियों को कम करने में सहायक बाल साहित्य- आज भी प्राइमरी कक्षाओं को पास करने के बाद भी अधिकतर बच्चे पढ़ने-लिखने की चुनौतियो से जूझ रहे हैं. जिसका मुख्य कारण है बच्चों के लिये किताबों की अनुपलब्धता. बच्चे पाठ्यपुस्तकों तक ही सिमटे रह जाते हैं जहाँ वे सीमित सामग्रियों को ही बार-बार पढ़ते दोहराते और उबते रहते हैं. 

शुरुआती दौर में तो बच्चों को मात्र एक पतली किताब देकर उन्हे स्वर, व्यंजन और मात्राएं सिखाई जाती हैं. जो एक बहुत ही लम्बी और उबाऊ प्रक्रिया है. यदि इसकी जगह बच्चों को प्रिंट रीच वातावरण दिया जाये, उनके साथ विभिन्न तरह की कहानी कविताओं को साझा किया जाये, ढेर सारी चित्रों वाली किताबें दी जाएँ तो बच्चों के लिये पढ़ना- लिखना -सीखना रोचक और सहज हो जायेगा. यह प्रक्रिया शिक्षकों के लिये भी मद्द्गार होगी.  

बच्चों एवं शिक्षकों के बीच बेहतर तालमेल

बाल साहित्य बच्चों और शिक्षकों के बीच एक अच्छा संबन्ध भी बनाता है. यदि साहित्य कक्षा में प्रवेश कर जाए तो बच्चों और शिक्षकों को कई मुद्दों पर समृद्ध और सार्थक चर्चा करने का अवसर मिलता है. जो ज्यादातर बच्चों की रुचि और शिक्षकों को पढ़ाने वाले पाठ्यक्रम से जुड़ा हुआ हो सकता है. ऐसी स्वस्थ बातचीत कक्षा के लिये लोकतान्त्रिक वातावरण का निर्माण करती है. जिसका प्रभाव पूरे स्कूल पर पड़ता है.

1939 में महात्मा गाँधी ने कहा था, "अगर पाठ्यपुस्तक को ही तथ्य मान लिया जाये और उसी पर शिक्षा व्यवस्था टिक जाए तो शिक्षा और शिक्षक की वाणी की कीमत ही क्या रहेगी." गांधी जी का यह तथ्य पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य गतिविधियों को भी इस शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की बात करता है. जिसमें बेशक बाल साहित्य को जरूर शामिल किया जा सकता है जो पाठ्यसामग्री को पूरा करने में कभी बाधक नही हो सकती.

संदर्भ -

पुस्तक संस्कृति की जरूरत : कॄष्ण कुमार 

शिक्षा और बाल साहित्य : कॄष्ण कुमार

बाल साहित्य के जरिये प्रारम्भिक भाषा एवम्‌ साक्षरता को सींचना : शैलजा मेनन का 

(चन्द्र  किरण  तिवारी, उपक्रम संस्था की सह-संस्थापक हैं. जो  उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में सरकारी एवं गैर-सरकारी विद्यालयों में पुस्तकालय एवं 'बच्चों के सीखने की क्षमता' पर काम कर रहीं हैं)

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