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मोदी सरकार के 2 साल: जानिए क्यों मुश्किल है PM की आगे की डगर?

अर्थव्यवस्था, इन्फ्रास्ट्रक्चर और विदेश नीति के मोर्चे पर नरेंद्र मोदी  सरकार ने अच्छा काम किया है लेकिन राजनैतिक और सियासी मैदान में उसे मुंह की खानी पड़ी है और उसका प्रदर्शन उम्मीदों के अनुकूल नहीं रहा है.

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यह प्रसिद्ध उक्ति है कि जिसे ज्यादा मिला होता है, उससे ज्यादा पाने की भी उम्मीद की जाती है. दो साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बाइबिल की इस उक्ति का मतलब समझ में आ रहा होगा, जब उन्हें अपनी सरकार के कामकाज की समीक्षा करने के लिए रोजाना वक्त देना पड़ रहा है और अगले तीन साल के कार्यक्रमों और योजनाओं की रणनीति पर दिमाग खपाना पड़ रहा है.

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अपने मंत्रिमंडल की हालिया बैठक में मोदी अपनी सरकार के कई फैसलों और नीतियों के लागू होने में हो रही देरी को लेकर बुरी तरह खीझ गए. उन्होंने कहा कि जब किसी कानून को संसदीय मंजूरी के लिए तैयार किया जा रहा हो, उसी दौरान संबद्ध मंत्रालय को उसके लिए ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिससे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने और जनता के लाभान्वित होने के बीच समय का ज्यादा फर्क न रह जाए. उन्होंने अपनी सरकार द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति (एससी/एसटी) को ज्यादा संरक्षण देने संबंधी पेश किए गए संशोधन का हवाला दिया, जिसे 1 जनवरी को ही राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई थी, लेकिन इसे 26 जनवरी को अधिसूचित किया गया. 
देश की नौकरशाही और न्यायपालिका से जिसका भी साबका पड़ा होगा, वह समझ सकता है कि सिर्फ तीन हफ्ते में किसी काम को निपटा पाना कितनी बड़ी बात होगी. स्वभाव से अधीर मोदी के लिए हालांकि यह बड़ी बात नहीं है, जिन्हें हमेशा जल्दी मची रहती है और जो मानते हैं कि किसी भी योजना पर काम उसे घोषित करने के अगले ही दिन शुरू हो जाना चाहिए. आगामी 26 मई उनके दो साल के कार्यकाल की समाप्ति का मौका होगा. दुनिया में इससे ज्यादा कठिन काम नहीं हो सकता—दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक अरब से ज्यादा लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना. मोदी को इस बात का पूरा एहसास है कि उन्हें एक निर्णायक जनादेश मिला है, जो 1984 में राजीव गांधी के बाद किसी दूसरे प्रधानमंत्री को नहीं मिला था. वे इस देश का कायाकल्प करने की दिशा में छोटे-छोटे लाखों कदम उठाने को दृढ़ प्रतिज्ञ दिखाई देते हैं.

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कुछ नया करने की चाहत बरकरार
उन्हें कुर्सी पर बैठे 700 से ज्यादा दिन हो रहे हैं, लेकिन काम के मामले में उनमें अब तक रत्ती भर थकान नहीं दिखती, भले ही उनके कई सहयोगी पस्त हो चुके हों. रात के भोजन के बाद तक चलने वाली कैबिनेट की थकाने वाली बैठकों के बाद भी वे अपने नौजवान सहयोगियों की अपेक्षा ज्यादा चुस्त दिखते हैं. उनकी सरकार में उनसे ज्यादा यात्राएं देश और विदेश में किसी ने नहीं की हैं. अब भी कुछ हटकर नया करने की उनकी चाहत बरकरार है. पिछली बार की गिनती तक उन्होंने स्वच्छ भारत से लेकर बेटी बचाओ और कुशल भारत से स्टार्ट अप तक कुल 30 नई पहलों का बहुप्रचारित ऐलान किया है. कार्यक्रमों और योजनाओं की गिनती के लिहाज से वे इंदिरा गांधी के प्रसिद्ध 20 सूत्रीय कार्यक्रम और राजीव गांधी के छह प्रौद्योगिकी अभियानों को पीछे छोड़ चुके हैं. 

सरकार को सीईओ की तरह चलाते हैं पीएम मोदी
मोदी के हाथ में इस सरकार की कमान है और वे पूरे उत्साह से आगे बढ़े जा रहे हैं. वे सरकार को एक बड़े कारोबारी घराने के सीईओ की तरह चलाते हैं, एजेंडा तय करते हैं, जवाबदेही की मांग करते हैं और लालफीताशाही के बीच से अपने रास्ते निकालते हैं. उनके कई मंत्री पहली बार अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, लिहाजा इस सीमित प्रतिभाबल के दबाव में उन्होंने नौकरशाहों का आश्रय लिया है और उनका पीएमओ फैसले लेने और नतीजों की निगरानी करने में सबसे ताकतवर बनकर उभरा है. ऐसा चुस्त नियंत्रण केंद्रीकरण के आरोपों को आसानी से राह देता है, लेकिन इसने यह आश्वस्त किया है कि उनकी सरकार में अब तक कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आ सका है. जानकार मानते हैं कि शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार यूपीए सरकार के मुकाबले काफी कम हुआ है. 

मंत्र‍ियों को किया नतीजे दिखाने पर मजबूर
अपने दूसरे साल में उन्होंने अपने मंत्रियों को नतीजे दिखाने को मजबूर किया. पहले साल में उन्होंने इस मामले में कुछ संकोच बरता था, लेकिन उससे उनका आत्मविश्वास मजबूत हुआ था. मोदी को इस बात का बराबर एहसास है कि एक ऐसे देश का प्रबंधन कितना जटिल काम हो सकता है, जहां आप निर्देश तो दे सकते हैं लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसे निचले स्तर पर मान लिया जाएगा और उसका नतीजा दिखने लगेगा. वे बड़े पैमाने पर कायाकल्प करने की अपनी क्षमता को लेकर अब पहले से कहीं ज्यादा व्यावहारिक हो चुके हैं. अपने व्यापक जनादेश पर अकेले भरोसा करने की बजाए वे शायद समझ चुके हैं कि उन्हें अब जड़ से लेकर शाखों तक हर स्तर पर व्यापक सुधार करने की जरूरत होगी. 

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विंस्टन चर्चिल की तरह मोदी भी मानते हैं कि समभाव गदहों का गुण होता है. अपने पहले वर्ष में उन्होंने पिछली सरकार के कार्यक्रमों जैसे मनरेगा और आधार की आलोचना की थी लेकिन दूसरा साल आते-आते उन्होंने दोनों को खुलकर गले लगा लिया है और दावा किया है कि उनकी सरकार ने डिलिवरी को और ज्यादा सक्षम बनाया है. वे अपरंपरागत कामों को करने में भी नहीं सकुचाए हैं. उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह अगर दो साल तक इस बात पर बहस करते रहे कि पाकिस्तान का दौरा किया जाए या नहीं, तो मोदी ने उनसे उलट लाहौर में अचानक उतर कर नवाज शरीफ  का उनके जन्मदिवस पर अभिवादन किया और पिछले साल क्रिसमस पर उनकी पौत्री की शादी में भी चले गए. देश में भले इसकी आलोचना हुई हो, लेकिन इससे दुनिया में भारत की अडिय़ल छवि को नरम बनाने में काफी फायदा पहुंचा. 

पीएम ने अपने कामों से लिया सबक
मोदी के दूसरे साल में यह साफ है कि उन्होंने अपने काम से सबक लिया है और अपनी सीमाओं के भीतर कहीं ज्यादा रचनात्मक हुए हैं. हालिया बजट में गरीबों और किसानों के प्रति स्पष्ट समर्थन देखने को मिला, जिसने विपक्ष की इस आलोचना को खारिज कर दिया कि यह 'सूट-बूट की सरकार' है. उन्होंने आजादी के बाद अब तक की सबसे बड़ी किसान बीमा योजना का उदघाटन किया, जिससे फसल के नुक्सान होने पर किसानों को सुरक्षा मिल सकेगी और सिंचाई योजनाओं का प्रसार हो सकेगा, साथ ही वित्तीय संतुलन भी कायम रखा जा सकेगा. कृषि क्षेत्र के लिए यह कदम बड़ी राहत के रूप में सामने आया है क्योंकि उनकी सरकार को भले ही पेट्रोलियम तेल की कम कीमतों के कारण थोड़ी आसानी हुई हो, लेकिन मोदी को दो साल तक लगातार खराब मॉनसून की विरासत भी मिली थी जिससे उन्हें निपटना था. यह 30 साल में पहली बार पड़ा दोहरा सूखा है, जिसने अधिकांश ग्रामीण भारत को दरिद्र बना दिया है. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था लगभग ठप्प हो गई है. 

आर्थ‍िक मोर्चे पर भी सफल
आर्थिक मोर्चे पर गणना के तरीकों के बारे में कोई शिकायत कर सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि सालाना जीडीपी की वृद्धि दर 7.5 फीसदी पर बनी हुई है जबकि वैश्विक वृद्धि दर इससे काफी नीचे है. यूपीए सरकार के आखिरी वर्षों की तुलना में मोदी सरकार ने विदेश में भारत की छवि को सुधारने और निवेशकों में आत्मविश्वास की बहाली के लिए काफी मेहनत की है. यह भी गौरतलब है कि दो साल पहले जब उन्होंने कमान संभाली थी तो कॉर्पोरेट क्षेत्र का बहीखाता भारी दबाव में था, बैंकिंग क्षेत्र डूबते कर्जों (एनपीए) के बोझ तले दबा था और वैश्विक वित्तीय संकट के कारण निर्यात लगभग रसातल में पहुंच चुका था. 

मोदी की गणना के मुताबिक, मार्गरेट थैचर शैली वाले विशाल सुधारों को लागू करने का शायद यह सही मौका नहीं था, जिसका उन्होंने वादा किया था. इसकी बजाए उन्होंने धीरे-धीरे आर्थिक सुधार की नीति को अपनाया. उनके फैसलों में व्यावहारिकता का पुट ज्यादा दिखता है. कोई सशक्त आर्थिक दूरदृष्टि और नीतियां उसमें निहित नहीं हैं. वे कुशल अनुपालन के कायल हैं, जो चीजों को सहज बनाने और कारोबार में तेजी लाने की प्रक्रियाओं पर केंद्रित है. यह भी गौर किया जा सकता है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के कठोर मौद्रिक नियंत्रण पर आपत्ति होने के बावजूद मोदी ने इसे वैसा ही रहने दिया और यह आश्वस्त किया कि बुनियादी आर्थिक प्रबंधन ठोस बना रहे, मुद्रास्फीति नीचे बनी रहे, रुपया स्थिर रहे और चालू खाता व वित्तीय घाटे का लक्ष्य पूरा होता रहे. 

उन्होंने यह भी आश्वस्त किया है कि कारोबारों को सहज बनाने और किसानों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर की फंडिंग पर्याप्त से ज्यादा मात्रा में बनी रहे. चाहे वह रेलवे हो, राजमार्ग, बंदरगाह, पावर प्लांट या पेट्रोलियम. इन तमाम क्षेत्रों को फंड की पर्याप्त खुराक मिली है और मोदी निजी तौर पर इनकी प्रगति पर निगाह रखे हुए हैं. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आर्थिक और बुनियादी संरचना के क्षेत्रों से जुड़े उनके मंत्रियों अरुण जेटली, नितिन गडकरी, सुरेश प्रभु, धर्मेंद्र प्रधान और पीयूष गोयल को इंडिया टुडे की टीम ने कामकाज के मामले में उच्च रेटिंग दी है. आने वाले वर्षों में अभी कुल मिलाकर बहुत कुछ किया जाना शेष है, लेकिन अर्थव्यवस्था के कुशल प्रबंधन के लिए मोदी ज्यादा अंकों के हकदार हैं. 

विदेश नीति के मामले में मोदी का अनुभव काफी कम था, लेकिन उन्होंने चौंकाने वाला काम किया है और नतीजे दिखाए हैं. घरेलू विकास को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने विदेश नीति का कुशलतापूर्वक दोहन किया है. विदेश सचिव एस. जयशंकर मोदी की लगातार हो रही विदेश यात्राओं की तुलना जापान के मशहूर नेता तोमोमी इवाकुरा के साथ करते हैं, जो अपने राज के शुरुआती दो सालों में उद्योगों, संस्थानों और सर्वश्रेष्ठ कार्यपद्धतियों के अध्ययन के लिए विदेश जाया करते थे और जिन्होंने 19वीं सदी में मेइजी की बहाली के बाद जापान के आधुनिकीकरण में उस ज्ञान का इस्तेमाल किया. मोदी दुनिया भर के देशों में अनथक यात्राएं करके न सिर्फ देश की छवि को नई बुलंदी दे रहे हैं बल्कि बड़ी मेहनत से एक आकर्षक निवेश स्थल के रूप में भारत को बेचने का काम भी कर रहे हैं. उन्होंने 2014-15 में 12 देशों की यात्रा की जिससे 20 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का आश्वासन उनके हाथ लगा. जयशंकर मोदी की विदेश नीति पर एकाग्रता की तुलना जवाहरलाल नेहरू से करते हैं, जिन्होंने भारत की आर्थिक बुनियाद रखने में दूसरे देशों से सक्रिय मदद ली थी. 

इस मुहिम में पड़ोसियों को सर्वोपरि रखने का नजरिया भले ही पाकिस्तान में जाकर अटक गया हो, लेकिन बांग्लादेश के साथ ऐतिहासिक भूमि हस्तांतरण सीमा समझौता करके उन्होंने संबंध को मजबूत किया है, भूटान और म्यांमार के साथ रिश्ते सुधारे हैं तथा अफगानिस्तान और मालदीव में रिश्तों की खोई हुई जमीन फिर से हासिल की है. पाकिस्तान के मामले में भले ही उन्हें कई बार यू-टर्न लेने के लिए कोसा गया हो, लेकिन वे इस्लामाबाद के साथ अच्छे रिश्ते कायम करने को वचनबद्ध रहे हैं, बशर्ते वह अपने घरेलू आतंक के कारखानों पर लगाम कसे. समस्या यह है कि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  की अब पाकिस्तानी फौज के सामने उतनी चल नहीं रही है और फौजी हुक्मरान भारत के साथ अच्छे रिश्ते कभी नहीं चाहते हैं. ऊर्जा संपन्न पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में मोदी ने काफी कामयाबी हासिल की है. वहां अतीत में भारत का रसूख कम ही रहा है. बड़ी ताकतों के बीच चीन के साथ कई उतार-चढ़ावों के बाद एक संतुलन की स्थिति साध ली गई है, रूस के साथ आर्थिक गठजोड़ सशक्त हुआ है और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ तो मोदी ने जबरदस्त दोस्ताना कायम कर लिया है. 

इसका एक प्रतिकूल पक्ष यह है कि तमाम पूर्व प्रधानमंत्रियों ने अपने कार्यकाल के आरंभिक दो वर्षों में ही बड़े आर्थिक सुधारों या नीतिगत बदलावों की घोषणा कर डाली थी, चाहे वह पी.वी. नरसिंह राव की उदारीकरण की नीति रही हो, अटल बिहारी वाजपेयी का पोकरण-2 परमाणु परीक्षण या फिर मनमोहन सिंह द्वारा किया गया अमेरिका-भारत परमाणु सौदा. मोदी ने यह नुस्खा न अपनाकर शुरुआती रफ्तार के साथ बेशक एक समझौता किया है. 

अर्थव्यवस्था, इन्फ्रास्ट्रक्चर और विदेश नीति के मामले में मोदी सरकार का प्रदर्शन जहां अव्वल है, वहीं उसका कुल प्रदर्शन दो अहम मोर्चों के कारण कमजोर पड़ता दिखता हैः सामाजिक और राजनैतिक. मोदी की राजनैतिक प्रवृत्तियां बहुत सूक्ष्म हैं. इन्हीं के चलते वे अकेले अपने दम पर 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी को जबरदस्त जनादेश तक ले आए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद ऐसा कई मौकों पर लगा है कि वे जान-बूझकर शुतुरमुर्ग बन गए हैं. उन्होंने कई विभाजनकारी मसलों पर लंबी चुप्पी साध ली. कांग्रेस मुक्त भारत के अपने लक्ष्य की सनक में बीजेपी ने संसद को तकरीबन निष्क्रिय कर डाला है और  बाकी विपक्ष को भी अपने साथ लेकर चलने में उनकी कोई रुचि नहीं दिखती. परिणामस्वरूप भूमि अध्रिहण समेत जीएसटी जैसे अहम विधेयक धूल चाट रहे हैं. यही नहीं, गैर-बीजेपी राज्यों में उनकी पार्टी की सक्रियता भी लगातार माहौल में गर्मी घोल रही है. इस दौरान मोदी सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार पर हमला करने में लगे हुए हैं. उनकी निजी लोकप्रियता चाहे अब भी कायम हो और वजन के मामले में वे बीजेपी के किसी भी दूसरे नेता पर भारी हों, लेकिन बिहार और दिल्ली में हुई चुनावी हार ने उनकी अपराजेयता के गुब्बारे में छेद करके ऐसी हवा निकाली है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दबाव के आगे वे ज्यादा निरीह हो गए हैं. 

राज्यों के चुनाव में नतीजे देने के मामले में उनके घटते सामथ्र्य ने संघ के भीतर बैठे कुछ अतिवादी तत्वों को मौका दिया है कि वे मोदी के विकास के एजेंडे से ध्यान भटका सकें. हो सकता है कि वे ऐसे संघी तत्वों के बारे में चर्चिल की तरह सोचते हों, जो कहते थे कि ''रास्ते में पडऩे वाले हर भौंकते कुत्ते पर पत्थर मारने की सोचोगे तो अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंच पाओगे,'' लेकिन कुछ मौके बेशक आए थे, जब उन्हें ऐसे तत्वों पर निर्णायक रूप से लगाम कसनी चाहिए थी ताकि बाकी के लिए वह नजीर बन सके. इसकी बजाए उन्होंने संघ और बीजेपी को देशभक्ति और गोमांस प्रतिबंध जैसे विभाजनकारी मसलों को लेकर आसानी से इस उम्मीद में उड़ जाने दिया कि इससे वोटों का ध्रुवीकरण हो सकेगा. लालकृष्ण आडवाणी नब्बे के दशक में ही ऐसी खुराफातों की सीमा को पहचान चुके थे. मोदी ने अगर जल्दी ही इस सबसे सबक नहीं लिया तो एक भारत, श्रेष्ठ भारत का उनका लक्ष्य खोखला जुमला बनकर रह जाएगा. 

इंडिया टुडे समूचे कामकाज के लिए मोदी को रजत पदक देता है, लेकिन स्वर्ण पदक पाने के लिए उन्हें उन क्षेत्रों को सशक्त करना होगा, जहां उन्हें झटके लगे हैं और उन दिक्कतों को हल करना होगा, जो उनकी राह रोक रही हैं. स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था, विकास और सामाजिक कल्याण उनकी प्राथमिकताएं होनी चाहिए. जाटों से लेकर पाटीदारों तक बढ़ता असंतोष, रोहित वेमुला की खुदकुशी से लेकर कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी तक फैले समूचे घटनाक्रम से पैदा हुई दरार इस बात का संकेत है कि सामाजिक विकास के अभाव और बढ़ती बेरोजगारी के कारण लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है. मोदी ने जिन योजनाओं और कार्यक्रमों की पहल की है, उनके तेजी से क्रियान्वयन पर उन्हें ध्यान देने की जरूरत है. इतने विशाल देश की उद्यमशीलता की क्षमता का दोहन करने के लिए शुरू की गई स्टार्ट अप इंडिया जैसी योजनाओं को अगर कामयाब होना है तो उन्हें समय से हर तरह के संस्थागत समर्थन की दरकार होगी. 

लक्ष्यों और कार्यक्रमों को घोषित करने के साथ मोदी को यह भी स्पष्ट तौर पर तय करना होगा कि उनकी सरकार उन्हें हासिल करने की क्या उम्मीदें रखती है. उन्हें यह भी तय करना चाहिए कि आखिर जमीनी स्तर पर ये कैसे उतरेंगे और लोगों को उनसे वास्तविक राहत कब तक मिल सकेगी. उन्हें ज्यादा समावेशी नजरिए से काम करना होगा, जहां गरीब और बाजार को एक दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं, परस्पर सहयोगी के रूप में देखा जाए. एक ऐसा आर्थिक उदारवाद, जो विकास और गरीबों की एक साथ सेवा कर सकता हो, भारत को उसी की दरकार है. यह दिखाता है कि देश अब रेवडिय़ां बांटने की कांग्रेसी नीति से आगे बढ़कर स्वावलंबी हो रहा है, जहां लोगों को रोजगार मिलेंगे और एक औसत नागरिक के भीतर आत्मसम्मान का भाव पैदा होगा. कुछ अहम मंत्रालयों का नेतृत्व ढीले-ढाले हाथों में है और मोदी को उन्हें कह देना चाहिए कि या तो वे अपनी चाल दुरुस्त कर लें या फिर उन्हें हटा ही दिया जाए. 

मोदी का काम इसलिए आसान हो जाता है क्योंकि यह देश अब भी मानकर चल रहा है कि उनके पास देश के गंभीर सवालों के जवाब मौजूद हैं. इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है. तीसरे साल में मोदी का प्रदर्शन जैसा रहेगा, वही उनके दूसरे कार्यकाल की नींव तैयार करेगा.

अच्छा
वैश्विक नेताओं से मुलाकात करके दुनिया में भारत की सकारात्मक छवि बहाल की; भ्रष्टाचार पर कड़ी लगाम और सरकार में पारदर्शिता; इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा जोर

बुरा
देशभक्ति और गोमांस प्रतिबंध जैसे समाज को बांटने वाले मसलों पर खुलकर और फौरन बोलने से परहेज; संसद में विपक्ष से तालमेल और विधायी खाई को पाटने में अक्षम; दिल्ली और बिहार में चुनावी हार का सामना

डिलिवरी
नतीजे दिखाने और जवाबदेही के मुरीद, नतीजों को मापने की स्पष्ट दृष्टि और व्यावहारिक नजरिया

टीमवर्क
अत्यधिक केंद्रीकरण के चलते पीएमओ सबसे ताकतवर बन चुका है, लेकिन अब नतीजे दिखाने के लिए मंत्रियों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है

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