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असल सदाशिव को हम जान ही नहीं पाए

सिनेमा और रंगमंच के इस असाधारण कलाकार ने ज्यादा पाने का मोह छोड़ चुना अपने मन का रास्ता.

Sadashiv Amrapurkar   और भी... http://aajtak.intoday.in/story/tribute-to-sadashiv-amrapurkar-1-787103.html Sadashiv Amrapurkar और भी... http://aajtak.intoday.in/story/tribute-to-sadashiv-amrapurkar-1-787103.html

यह तब की बात है, जब मैं बॉम्बे टॉकीज में अपनी शॉर्ट फिल्म की कहानी लिख रहा था. सत्यजित राय की मूल कहानी पटेल बाबू, फिल्म स्टार  में न तो उसके गुरु का चरित्र था और न ही ऐसा कोई दृश्य. कहानी में पुरंदर पुरानी स्मृतियों में जाता है. सिनेमा में बिना फ्लैशबैक कोई पुरानी स्मृतियों में कैसे जाएगा? तब मैंने उस किरदार की कल्पना कीः पुरंदर का गुरु, जो अचानक कहीं से आता है और उससे बात करता है.

मुझे आज भी याद है वह दिन, जब मैं पहली बार सदाशिव अमरापुरकर से मिलने उनके घर गया था अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लेकर. उनका किरदार मेरी कल्पना में था. लेकिन परदे पर वह कैसा होगा, इसका कोई ठोस आइडिया दिमाग में नहीं था. तब तक फिल्मी दुनिया में उनकी आवाजाही बहुत कम हो चुकी थी. लेकिन मराठी थिएटर, किताबों, साहित्य, कविताओं से उनका रिश्ता बहुत मजबूत था. बाकी समय सामाजिक कामों के सुपुर्द था. मैंने उन्हें फिल्म की कहानी सुनाई. उनकी आंखों में आ रहे भाव, चमक और उदासी से यह जाहिर था, लेकिन अब इस कहानी से भी उनका एक नाता जुड़ गया था. वे हां या ना कहते, उससे पहले ही मैंने उनके सामने एक पेशकश रख दी. मैंने कहा कि मैं एक पूरा दिन आपके साथ गुजारना चाहता हूं. फिल्मों और मराठी थिएटर, साहित्य के बारे में बात करते हुए.

उसके बाद वे नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ हमारे ऑफिस आए. वह एक ऐतिहासिक क्षण था, जब बॉलीवुड के दो खलनायक गैंग्स ऑफ वासेपुर का फैजल और अर्द्घसत्य का रामा शेट्टी हमारे ऑफिस में एक साथ बैठे थे. नवाज और सदाशिव अपने चरित्र के बारे में बातें करते रहे. अंत में जब वह दृश्य लिखा गया तो दरअसल वह उन्हीं की कही बातें थीं. खुद सदाशिव ने अपना किरदार लिखा. उन्हीं के संवाद थे. सिनेमा के परदे पर वह उनका निभाया आखिरी किरदार है, जो अब इतिहास हो चुका है.

एक बार अन्नू कपूर ने किसी अवॉर्ड फंक्शन में कहा था कि मैं ऊपर वाले से यही दुआ करता हूं कि जब अगली बार मुझे दुनिया में भेजना तो टैलेंटेड नहीं, खूबसूरत बनाकर भेजना. और खुदा न खास्ता अगर भारत में भेजा तो चमड़ी का रंग सफेद बनाकर भेजना. अगला जन्म तो किसी ने नहीं देखा, लेकिन सदाशिव अमरापुरकर के पास इस जन्म में उनमें से एक भी चीज नहीं थी. बॉलीवुड की चमकदार गलियों में एक ऐसा आदमी आ गया, जो काला था, नाटा था, दिखने में खूबसूरत नहीं था और फिल्मी पृष्ठभूमि से भी ताल्लुक नहीं रखता. ऐसे में जाहिर है, उनके लिए इस दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था. तमाम ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरकर वे यहां तक पहुंचे थे. उन रास्तों के निशान उनकी आंखों में दिखाई देते थे.

इस मायानगरी में ऐसे असंख्य लोग हैं, जिनका सफर उतार-चढ़ावों से भरा रहा है. लेकिन एक बात थी, जो सिर्फ अमरापुरकर में थी. उनकी आंखों में संघर्ष तो था लेकिन कोई कड़वाहट नहीं थी. उनकी स्थिति उस संत की तरह थी, जो एक ऊंचाई पर है और तटस्थ होकर निरासक्त भाव से दुनिया को देख रहा है. सुखों को भी और दुखों को भी. वह हर परिस्थिति में समभाव है. धोखे, कुटिलताओं और दुरभिसंधियों से भरी दुनिया को उसने उदार हृदय से माफ कर दिया है. उसके दिल में कोई शिकायत नहीं.

दुनिया ऐसी ही है. वरना क्या वजह थी कि किरदार की आत्मा में उतरकर झांक लेने वाले मराठी रंगमंच के इस असाधारण कलाकार को बॉलीवुड एक खलनायक और बलात्कारी से इतर किसी और भूमिका में देख ही नहीं पाया. कितने लोग यह जानते हैं कि वे बहुत गहरे साहित्य प्रेमी थे? क्या वजह है कि एक समाज एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को उसका हक सिर्फ इसलिए नहीं देता क्योंकि वह सौंदर्य के प्रचलित पैमानों पर खरा नहीं उतरता?

लेकिन ऐसी ही एक दुनिया में सदाशिव अमरापुरकर को अपनी राह मालूम थी. बहुत सारा पैसा, सुख-आराम, समंदर के किनारे बड़ी-सी खिड़की वाले बंगले और जिंदगी की तमाम रंगीनियों की चाह उन्होंने बहुत आसानी से छोड़ दी और कभी उसका पछतावा भी नहीं किया. वे जानते थे कि उन्हें क्या चाहिए. वे हर समय हंसते रहते और पुराने किस्से सुनाते. मुझे आज भी याद है, उन्होंने किस तरह खुद चेहरे पर कोई भी भाव लाए बगैर वह एक किस्सा सुनाया था. एक बार वे किसी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, जिसमें विलेन घोड़े पर आता है. वे ही विलेन थे. घोड़े को अचानक जाने क्या हुआ कि वह दौड़ते हुए सेट से आगे निकल गया और बहुत दूर तक चलता गया. वे घोड़े पर सवार थे. बहुत दूर जाकर जब घोड़ा रुका तो वे किसी तरह गिरते-पड़ते सेट पर वापस आए.

अगले दिन से विलेन का किरदार बदल गया. अब वह घोड़े की जगह जीप पर आने लगा. बॉम्बे टॉकीज फिल्म में उनका डायलॉग ‘‘एई’’ शब्द से शुरू होता है. इसे बोलने से पहले उन्होंने हंसकर कहा था, ‘‘मैं अपने रेप सीन की याद में ये शब्द बोल रहा हूं.’’ सभी फिल्मों में रेप के दृश्य से पहले वे जोर से ‘‘एई’’ बोला करते थे.
यह कहना थोड़ा नाटकीय होगा कि उनके जाने से बॉलीवुड की गहरी क्षति हुई है क्योंकि उसने तो उनके रहते ही उनकी कला की कोई कद्र नहीं की थी. लेकिन दुख इस बात का है कि यह दुनिया तो उस खालिस, गहरे, पारदर्शी कलाकार सदाशिव को उनके असली रूप में जान ही नहीं पाई. वह इंसान, जिसने दुनियावी सुखों का रास्ता छोड़ अपने दिल की राह चुनी थी.

दिबाकर बनर्जी फिल्म निर्देशक हैं
(मनीषा पांडेय के साथ बातचीत पर आधारित)

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