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सिंहस्थ कुंभ में अखाड़े की पेशवाई से 'तीसरी ताकत' का नया आगाज

महाधार्मिक आयोजन सिंहस्थ में किन्नर अखाड़े की पेशवाई नई पहचान और सामाजिक स्वीकार्यता का ऐतिहासिक मौका. किन्नरों की बदलती दुनिया की अनोखी दास्तान.

यह नजारा अब से पहले नहीं दिख सकता था, कुंभ जैसे महाधार्मिक आयोजन में तो इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. सो, मध्य प्रदेश में महाकाल की नगरी उज्जैन में 21 अप्रैल की वह चिलचिलाती धूप वाली दोपहरी इस मायने में ऐतिहासिक थी कि सर्वथा उपेक्षित, दब-छिपकर अनाम जिंदगी बिताने वालों का झंडा ऐसे धार्मिक आयोजन में गर्व से ऊंचा लहरा रहा था.

संन्यासियों के पवित्र 13 अखाड़ों के बरअक्स एक नया अखाड़ा उनके अस्तित्व की एक नई इबारत लिख रहा था. सिंहस्थ में उसकी पेशवाई कुछ ज्यादा ही धूमधाम से निकल रही थी. पेशवाई की राह तो दशहरा मैदान से होकर सिंहस्थ कैंप तय की गई थी. लेकिन नए अस्तित्व की इस नई पेशवाई ने इस मामले में भी इतिहास रच दिया. पहली बार कोई पेशवाई मुस्लिम-बहुल तोपखाना मुहल्ले से निकली. चारों ओर जबरदस्त भीड़ थी. नया अखाड़ा बनाने वाली इसकी मुखिया के लिए एसी बग्घी तैयार थी. जनसैलाब को देखा तो वे खुद को रोक न सकीं और बग्घी छोड़ ऊंट पर सवार हो गईं. लोग उनके हाथ छूने को बेताब थे, और वे बार-बार कह रही थीं, ''मैं कोई देवी नहीं...'' लेकिन लोग अपने बच्चों को आशीर्वाद के लिए उनकी गोद में डाल रहे थे. लोग उन्हें पैसे दे रहे थे और अखाड़े के सदस्य पैसा लौटा रहे थे. और कह रहे थे कि ये पैसे घर में रखो, बरकत होगी.

दरअसल, सबसे अलग-थलग नजर आने वाली यह पेशवाई किन्नर अखाड़े की थी और ऊंट पर बैठी अखाड़े की प्रमुख लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी थीं. अरसे से किन्नरों के अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्षरत लक्ष्मी कहती हैं, ''हमारी लड़ाई वजूद की है...और इस पेशवाई ने हमारे वजूद को एक नया आयाम दे दिया है.''

कुछ साल पहले तक तो वजूद की इस जंग की भी कल्पना नहीं की जा सकती थी. इधर कुछ समय से समाज और सरकार के हलकों में कुछ सोच बदली तो इनकी एकजुटता भी रंग लाने लगी. अखाड़ा तो बेशक अब उनके अस्तित्व की समाज में पहचान का नया आयाम है. इसका उद्देश्य लक्ष्मी कुछ इस तरह बताती हैं, ''हमें देश भर के किन्नरों को जोडऩा है. उनके जीवनयापन का बंदोबस्त करना है और वृद्धाश्रम जैसी सुविधाएं भी मुहैया करानी हैं.'' 13 धार्मिक अखाड़े दबी-छिपी जुबान में किन्नर अखाड़े का विरोध कर रहे हैं. लेकिन लक्ष्मी चुनौती देती हैं, ''हम शास्त्रार्थ के लिए तैयार हैं. कोई चाहे तो आ जाए. हमारा अखाड़ा हर धर्म के लिए खुला है. विरोध करने वालों के हम छक्के छुड़ा देंगे.''

किन्नर अखाड़े से पहले किन्नर बैंड, किन्नर कैब और किन्नर उद्यमी भी अपनी पहचान कायम कर चुके हैं. यह किन्नर समुदाय की नए दौर के साथ कदमताल है. यह समुदाय खुशी के मौकों पर नेग, मजबूरन जिस्मफरोशी और भिक्षावृत्ति से आगे बढ़ रहा है. लक्ष्मी कहती हैं, ''हम खोया हुआ वजूद पाने के लिए मेहनत कर रहे हैं. सरकार का साथ मिल रहा है और समाज का भी.'' लक्ष्मी त्रिपाठी पहली किन्नर हैं जिन्होंने 2008 में एशिया-प्रशांत क्षेत्र का संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व किया था. अस्तित्व नाम से उनका एक एनजीओ है, जो सेक्सुअल माइनॉरिटीज के लिए काम करता है.

किन्नर अखाड़े की तैयारी है कि वह हर कुंभ में शिविर लगाएगा. कहा जा रहा है कि 22 राज्यों से 10,000 किन्नर इस अखाड़े से जुड़ चुके हैं. अखाड़े से प्रमुख रूप से जुड़ीं और मध्य प्रदेश में सागर की मेयर रह चुकीं कमला बुआ कहती हैं, ''हम अपने अखाड़े के जरिए यह बताना चाहती हैं कि हमें उपेक्षित नहीं समझना चाहिए.''

शायद इस तरह के प्रयासों से उपेक्षा का यह दंश अब कम होने लगा है. इसकी एक मिसाल पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में नजर आई. कोलकाता में किन्नर समाज के लोग पोलिंग बूथ पर लोगों की मदद करते नजर आए.

आसान नहीं है जिंदगी की राह
 अब चेन्नै की ए. रेवती को ही लें. वे किशोरावस्था में ही घर से निकल गईं. भीख मांगी और सेक्स वर्कर तक रहीं. लेकिन 1999 में वे सेक्सुअल माइनॉरिटीज के लिए काम करने वाली संस्था संगमा से जुड़ीं और किन्नरों के लिए काम करने लगीं. उनसे अतीत के बारे में पूछने पर उनका दर्द एकदम से छलक पड़ता है. वे कहती हैं, ''एनजीओ से जुडऩे से पहले जिंदा रहने के लिए कुछ तो करना ही था.'' लेकिन वह गुजरे जमाने की बात है. अब वे एक प्रसिद्ध लेखिका और एक्टिविस्ट हैं.

उनकी दो किताबें- ऑर लाइव्ज ऑर वड्र्स, टेलिंग अरावनी लाइफस्टोरीज और द ट्रुथ एबाउट मी पब्लिश हो चुकी हैं. ये किताबें कई जगह पाठ्यक्रम में भी हैं जबकि तीसरी किताब द स्टोरी ऑफ ट्रांस वीमन ऐंड हर सन्स जुबान पद्ब्रिलशर्स से जल्द ही प्रकाशित होने वाली है. इसमें वे ऐसे लोगों की बात करेंगी जिनका शरीर तो औरत का है लेकिन मन पुरुषों वाला. रेवती बताती हैं, ''पुरुष किन्नरों की बात तो हर कोई करता है, लेकिन स्त्रियों के शरीर में कैद पुरुष मन उपेक्षा के शिकार हैं. उनके लिए किन्नर समुदाय में भी कोई व्यवस्था नहीं है.'' वे किन्नरों के उत्थान के लिए काम कर रही हैं, और जल्द ही लंदन में लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने जा रही हैं.

 चेन्नै की कल्कि सुब्रह्मण्यम का सफर भी कोई आसान नहीं रहा. आज वे एक उद्यमी हैं और किन्नर एक्टिविस्ट भी. लड़के की तरह पैदा हुईं, लेकिन उनमें लड़की बनने की चाहत थी. हाइस्कूल में माता-पिता ने लड़कों के स्कूल में डाल दिया तो उनका जीवन और मुश्किल हो गया. हर कोई उन्हें तंग करता. वे स्कूल से गैर-हाजिर रहने लगीं. तभी उनकी मुलाकात एक किन्नर से हुई. इस तरह वे किन्नर समुदाय से जुड़ गईं.

उन्होंने डबल एमए किया और एक मल्टीनेशनल कंपनी में मीडिया स्पेशलिस्ट बन गईं. बाद में उन्होंने लिंग परिवर्तन (जेंडर रिएसाइनमेंट) सर्जरी करवा ली. अपनी पहचान से जुड़े एक दहला देने वाले हादसे को याद करते हुए वे बताती हैं, ''मैं 13 साल की थी. मेरे एक किन्नर दोस्त को सात आदमी जबरदस्ती ऑटोरिक्शा में डालकर ले गए और उसका रेप कर दिया.'' आज उनका ब्रांड कल्कि है जिसके तहत वे वाद्य यंत्र और विंड चाइम्स बनाती हैं. सहोदरी नाम की उनकी एक संस्था भी है. वे 2011 में नर्तकी फिल्म में काम कर चुकी हैं और कविताएं भी लिखती हैं. उनसे उनके संघर्ष के बारे में पूछिए तो कहती हैं, ''लिंग संबंधी पहचान के संकट की वजह से मेरी जिंदगी आसान नहीं रही. मेरे सहपाठी मुझे चिढ़ाते और मेरे शरीर को लेकर भी तंज कसते. कॉलेज में मुझे बहुत ही खराब ढंग की रैगिंग से गुजरना पड़ा. इन खराब अनुभवों ने मुझे और मजबूत बना दिया है.''

उनका मानना है कि 15 साल पहले तक किन्नरों को बुरी नजर से देखा जाता था और अस्पृश्य माना जाता था. लोग उनसे डरते थे, अब यह नजरिया बदल रहा है. वे कहती हैं, ''यह बदलाव अभी शहरों तक ही सीमित है. इसे गांवों तक लाना होगा. इसके साथ ही मां-बाप की किन्नर बच्चों के लिए स्वीकार्यता ही उनका जीवन बदल सकती है. उन्हें घर से बाहर फेंकने की बजाए उन्हें शिक्षित करके पांव पर खड़ा करना चाहिए.'' उनकी तैयारी किन्नरों के लिए वृद्धाश्रम खोलने की है. इसके अलावा वे फिल्में भी बनाएंगी और एक मीडिया प्रोडक्शन कंपनी का हेड बनने का भी उन्हें ऑफर है.

संगीत से लेकर सड़कों तक
किन्नरों को समाज का साथ मिल रहा है, और स्वीकार्यता भी. यशराज फिल्म की वाइ फिल्मस के हेड आशीष पटेल को भारत का पहला किन्नर बैंड बनाने का ख्याल आया तो उन्होंने शमीर टंडन के साथ मिलकर इस बैंड को बनाने का फैसला किया. शमीर बताते हैं, ''अब किन्नर समुदाय को लेकर काम होने लगा है. हमने इस बैंड को बनाने के लिए रेलवे स्टेशन और अन्य जगहों से खोजबीन शुरू की.'' फिर छह किन्नर आशा जगताप, भविका पाटिल, चांदनी सुवर्णकार, फिदा खान, कोमल जगताप और रवीना जगताप को चुना गया और जनवरी 2016 में सिक्स-पैक बैंड बना. इस बैंड के 'हम हैं हैप्पी' गाने को 18 लाख से ज्यादा यूट्यूब हिट्स मिल चुके हैं.

 आशीष कहते हैं, ''संगीत की कोई भाषा, चेहरा या धर्म नहीं होता.'' उधर, मुंबई की ही सड़कों पर विंग्स ट्रैवल्स ने हमसफर ट्रस्ट के साथ मिलकर किन्नर और एलजीबीटी समुदाय के ड्राइवरों वाली सेवा शुरू की है. इसके लिए पांच ड्राइवरों की ट्रेनिंग चल रही है जबकि एक ड्राइवर गाड़ी चला भी रही है. विंग्स ट्रैवल्स के अरुण खरत कहते हैं, ''हमारा उद्देश्य ऐसे 500 ड्राइवर तैयार करना हैं, और हम चाहेंगे कि कुछ समय बाद वे नौकरी से आगे बढ़कर चालक मालक स्कीन के तहत आएं.''

राजनीति, कानून और किन्नर समुदाय
शबनम मौसी पहली किन्नर हैं जिन्हें जनता ने चुनकर विधानसभा में भेजा. वे 1998 में मध्य प्रदेश के शहडोल-अनूपपुर जिले के सुहागपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीती थीं और 2003 तक इस पद पर रहीं. पहली किन्नर मेयर बनीं कमला जान की कहानी काफी दिलचस्प है. वे 2000 में चुनाव जीतकर कटनी की महापौर बनीं. लेकिन यह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थी. जबलपुर हाइकोर्ट ने 2003 में उनके चुनाव को रद्द कर दिया. ऐसा ही कुछ उनकी हमनाम कमला बुआ के साथ भी हुआ. वे 2009 में सागर से चुनाव जीती थीं और महापौर बनीं. यह सीट एससी श्रेणी की महिलाओं के लिए आरक्षित थी. इस वजह से कोर्ट में चुनौती दी गई और कमला बुआ को 2012 में इस पद से हाथ धोना पड़ा.

इस तरह किन्नर समाज के लिए सबसे बड़ा सवाल पहचान का था. लेकिन पहचान का यह संकट 2014 में उस समय खत्म हो गया जब अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेंडर को पहचान दे दी. इस तरह अब किसी भी किन्नर से उसका हक नहीं छीना जा सकता. तभी तो जनवरी 2015 में मधु किन्नर को छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के मतदाताओं ने अपना मेयर चुना तो उनके सिर पर किसी कानून की तलवार नहीं लटक रही थी. उनके पास अपनी एक अलग पहचान थी. रायगढ़ में पली-बढ़ीं और उसकी एक-एक गलियों से वाकिफ मधु आज पूरे जज्बे के साथ अपने शहर के लिए काम कर रही हैं.

उधर, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने राइट्स ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स बिल, 2016 के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया है. बिल के ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने के लिए कानून मंत्रालय के पास भेजा गया है. इस कानून के मुताबिक, अगर किसी किन्नर को जबरन गांव या घर से निकाला जाता है, जबरदस्ती कपड़े उतरवाए जाते हैं या उनकी नग्न परेड कराई जाती है, या भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है या फिर बंधुआ मजदूरी कराई जाती है तो यह दंडनीय अपराध होगा, जिसके लिए दो साल की कैद हो सकती है और जुर्माना भी.

इसके अलावा, चुनाव आयोग ने किन्नरों को छूट दे दी है कि वे माता-पिता की जगह गुरु का नाम लिख सकते हैं. उन्हें उम्र और पते के प्रमाण में भी छूट दी गई है. इस वजह से वोटर आइडी कार्ड बनवाना आसान हो गया है. सेक्स चेंज ऑपरेशन अब उनके लिए आसान हो चुका है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, उनकी संख्या 4,87,203 बताई गई है. हालांकि एनजीओ और अन्य स्वयंसेवी संगठन इन आंकड़ों को और भी ज्यादा बताते हैं.

मुकाम अभी और भी हैं...
किन्नर नए मुकाम छू रहे हैं, और कई तरह की सकारात्मक पहल सामने आ रही हैं, जो उम्मीद जगाती हैं. अभी और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है. नाज फाउंडेशन की संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता अंजली गोपालन कहती हैं, ''बदलाव आना अच्छा है. लेकिन हर स्तर पर भेदभाव मिटाना होगा. आज भी किन्नरों को नौकरी नहीं मिलती. स्कूल में परेशानी आती है. लोग अजीब नजर से देखते हैं. बिना शिक्षा कुछ संभव नहीं है.'' वे कानून बनाने के साथ ही इसके सख्ती से अमल पर भी जोर देती हैं. रेवती भी समाज के बदलने की बात कहती हैं, ''नजरिया बदलना होगा. कोई भी किन्नरों को कमरा नहीं देता. स्लम में कमरा मिलता भी है तो दोगुनी कीमत पर. बस में लोग तमाशा मानते हैं. फ्री सेक्स के लिए तंग करते हैं...'' लक्ष्मी, कल्कि और रेवती जैसे लोग इन्हीं बदलाव के लिए प्रयासरत हैं.

ट्रांसजेंडर विषय पर बनी फिल्म द डैनिश गर्ल (2015) में आयनर वेगेनर अपनी पत्नी से कहता है, ''रोज सुबह मैं खुद से वादा करता हूं कि मैं पूरा दिन पुरुष बनकर गुजारूंगा. पर मैं लिली की तरह सोचता हूं. उसकी तरह ख्वाब देखता हूं. वह हमेशा यहीं रहती है...यह शरीर मेरा नहीं है. मुझे इसे छोडऩा ही होगा.'' आयनर के अंदर छिपी इसी लिली को पहचानना होगा, और थर्ड जेंडर को बदलाव का हिस्सा बनाना होगा. इसका आगाज सिंहस्थ कुंभ में किन्नर अखाड़े से हो चुका है, जहां लोगों की कतार हर वक्त नजर आती है और बदलाव की धमक सुना देती है.—साथ में महेश शर्मा और शुरैह नियाज़ी

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