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दो स्त्रियों की जिंदगी का कर्ज है मुझ पर: राजेंद्र यादव

तिरासी साल की उम्र में हिंदी की शरशय्या पर लेटे लेखक राजेंद्र यादव मुड़-मुड़कर देख रहे हैं और शायद पहली बार कुछ ऐसी बातें स्वीकार कर रहे हैं, जो इसके पहले ठीक इन्हीं शब्दों में उन्होंने कभी नहीं कीं.

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राजेंद्र यादव
राजेंद्र यादव

नफरत का गुमां गुजरे है, मैं रश्क से गुजरा/क्योंकर कहूं लो नाम ना उसका मिरेआगे. यही तो खासियत है उनकी. उनसे वे भी मुहब्बत करते हैं, जिन्हें उनसे नफरत है और वे भी चिढ़ते हैं, जो मुहब्बत में निहाल हुए जाते हैं. हिंदी साहित्य के महानायक राजेंद्र यादव जिंदगी की 83 बहारें देख चुके हैं और 83 खिजाएं भी. वे 65 साल से लिख रहे हैं. हंस का संपादन करते हुए 25 बरस गुजर गए.

अभी कुछ दिनों पहले वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह से लेकर लेखिका कृष्णा सोबती समेत हिंदी के तमाम लेखकों ने उनके घर एकत्रित होकर उनका लोक सम्मान किया तो कितनी पुरानी यादें और सपने फिर से सतह पर तैरने लगे. यूं तो खुद अपने बारे में उन्होंने खूब लिखा है और उससे ज्यादा उनके दोस्तों-दुश्मनों ने. लेकिन कुछ और अनकहा जान लेने की ललक बातचीत का सबब बनी. उम्र के इस पड़ाव पर वे कुछ ऐसा कहें, जो पहले कभी नहीं कहा. सिगरेट का एक पैकेट बातचीत की शर्त थी. हालांकि डॉक्टरों ने उन्हें सिगरेट न पीने की सख्त हिदायत दी है, लेकिन उनकी जीवटता के आगे किसी डॉक्टरी ताकीद की भला क्या हैसियत. लोक सम्मान के दिन भी लाख मना करने के बावजूद उन्होंने सबके सामने सिगरेट सुलगाई. अब दोस्त और घरवाले पीने नहीं देते तो चुपके से पीते हैं और राख टॉयलेट में बहा देते हैं.

कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ उन्होंने नई कहानी आंदोलन की शुरुआत की. उपन्यास और कहानियां लिखीं. उनके मशहूर उपन्यास सारा आकाश पर बाद में बासु चटर्जी ने फिल्म भी बनाई. अब राजेंद्र जी बूढ़े और कमजोर हो रहे हैं, लेकिन मन जैसे अब भी जवान है. भले शरीर साथ नहीं देता, लेकिन कल्पनाएं साथ टिकती भी नहीं हैं. उड़-उड़कर जाने किन-किन ठौर-ठिकानों पर बैठती हैं. उनकी बातों का सिरा नहीं मिलता. प्रेम के सबसे कोमल एहसास का जिक्र करते हुए अचानक कहने लगते हैं, ''दो जिंदगियों का कर्ज है मुझ पर, जिन्हें मैंने बर्बाद कर दिया.'' कौन? ''मन्नू और मीता.''

मीता कौन है, कोई नहीं जानता, लेकिन उनकी 81 वर्षीया पत्नी और जानी-मानी हिंदी लेखिका मन्नू भंडारी यह स्वीकारोक्ति सुनकर कहती हैं, ''अब एहसास हुआ भी तो क्या? मेरी तो एक ही जिंदगी थी, जो दुख और अकेलेपन में बीत गई. 25 साल पहले बेटी रचना के जन्म के बाद से राजेंद्र के साथ मेरा कोई शारीरिक संबंध नहीं रहा. मेरा जीवन तो मेंटली, इमोशनली, सेक्चुअली बैंकरप्ट ही रहा. गनीमत है कि अब आखिरी दिनों में उन्हें इस बात का एहसास हो रहा है.''

25 साल से कोई संबंध नहीं? यह जानना किसी सदमे की तरह था. क्या राजेंद्र जी को इस पीड़ा का एहसास है? वे कहते हैं, ''हां, मैं समझता हूं उस तकलीफ को, लेकिन मैं कर क्या सकता था? तब मीता मेरी जिंदगी में थी. जीवन में कभी एक साथ दो स्त्रियों के साथ मेरे शारीरिक संबंध नहीं रहे. मीता के रहते मैं मन्नू के साथ ऐसे संबंधों के बारे में सोच भी नहीं सकता था.''

क्या आप हिंदी के कैसानोवा हैं? वे मुस्करा देते हैं. ''यही सब कहकर तो तुम लोग मुझे भडक़ाते रहते हो.'' वे ठीक इन्हीं शब्दों में कहते नहीं कि लेखकीय रचनात्मकता की बुनियादी जरूरत है 'स्त्री', लेकिन कुछ इसी अंदाज में हेमिंग्वे को कोट करते हैं. ''हेमिंग्वे ने लिखा है कि मेरे जीवन में आने वाली हर नई स्त्री ने मुझे नया उपन्यास दिया.'' हेमिंग्वे ही क्यों, अगर सिर्फ लेखन पर यकीन करें तो नोबोकोव और मार्खेज समेत कई लेखकों के बूढ़े पुरुष चरित्र खूबसूरत, जवान लड़की की फिराक में रहते हैं.

क्या इन सबको नैतिकता की एक ही झाडू से बुहार दिया जाए? घटिया, यौन कुंठित, मर्दवादी? लेकिन फिर इस सवाल का जवाब कौन देगा कि ऐसा क्या है कि उन बूढ़े चरित्रों से नफरत नहीं होती. प्रेम और घृणा का अजीब खेल है यह. जिस बेबाकी और आजादी से राजेंद्र अपने प्रेम की बातें स्वीकार करते हैं, इस सेक्चुअल फ्रीडम पर बहुत-सी महिलाएं उन्हें उतनी ही आसानी से कैरेक्टर सर्टिफिकेट दे देती हैं, जिसे मर्द लाख गुना ज्यादा आसानी से औरतों को दिया करते हैं. पर यह सर्टिफिकेट घटिया और सामंती है. इसे देने वाला मर्द हो या औरत.

लेकिन इस काबिलेतारीफ बेबाकी में भी एक पेच और मर्दवादी अंतर्विरोध है. यह पूछने पर कि यदि आपके जैसा जीवन मन्नू ने जिया होता, वैसे ही विवाहेत्तर संबंध बनाए होते तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होती? वे कहते हैं, ''मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पाता. मन्नू को माफ नहीं कर पाता.'' असल अंतर्विरोध यही है. एक ओर वे कहते हैं, ''मेरा पूरा जीवन ही नियमों और बंधनों से मुक्ति का संघर्ष है. नियम तोड़ना ही मेरा नियम था.'' वहीं दूसरी ओर मन्नू नियम तोड़ें तो उन्हें तकलीफ है. आखिर वही सवाल कि इस मर्दवादी नियम को वे क्यों नहीं तोड़ पाए?

लेकिन कमाल की चीज है उनका डेमोक्रेटिक रवैया. इस जवाब पर आप 83 साल के उस बुजुर्ग पर भड़क सकते हैं, उन्हें भला-बुरा और सामंती कह सकते हैं पर वे मुस्कुराकर कहेंगे, ''सच बात है, लेकिन यह भी तो सोचो कि यह 20 साल पुरानी बात है. आज मैं ऐसा नहीं सोचता.'' लेकिन इस जवाब पर भी आप उनकी लानत-मलामत कर सकते हैं और वे मजे से सुनेंगे. ''वेलडन, अपने लिए आजादी तो जवानी में ही चुन ली, औरत की आजादी का एहसास बुढ़ापे में हो रहा है.''

लेकिन औरत की आजादी का एहसास मर्द क्यों करे? औरत सेक्चुएली डिप्राइव्ड है या नहीं, यह तो वह खुद सोचेगी और फैसले लेगी.

राजेंद्र जी पर डंडे चलाने के हजारों मौके नमूदार होते रहते हैं. स्त्रियों ने आजादी से लिखा तो विभूतिनारायण राय ने उन्हें 'छिनाल' की उपाधि दे दी. राजेंद्र जी से उम्मीद की गई कि वे उनकी बखिया उधेड़ेंगे, लेकिन वे तो कहने लगे, ''उन्होंने गलत कहा, लेकिन क्या इसके लिए उसे फांसी पर लटकाओगी? इन टिप्पणियों की इतनी परवाह क्यों? छिनाल कहते हैं तो कहने दो. तुम बोलो कि हां, हूं छिनाल, क्या कर लोगे.'' इस पर फिर उन्हें कैरेक्टर सर्टिफिकेट जारी हुए. लेकिन उनका पक्ष साफ है, ''छिनाल हो, के जवाब में औरतें यह सफाई क्यों देती फिरें कि 'नहीं, हम अच्छी हिंदुस्तानी औरतें हैं.' न, हम अच्छी नहीं हैं. न थीं, न होंगी. तुम जो चाहे कहो, लेकिन हमारे बौद्धिक विकास, हमारी आजादी की उड़ान को रोक नहीं सकते.'' मगर इस विवाद को लेकर राजेंद्र और मैत्रेयी के बीच जो अबोला शुरू हुआ तो हिंदी के तमाम मर्दाना स्वर मैत्रेयी के खिलाफ आग उगलने लगे. वे कहती हैं कि कई पुरुष लेखकों ने मुझ पर आरोप लगाया, ''राजेंद्र जी ने उन्हें लेखिका बनाया, और आज पहचान बन गई तो उन्हें धोखा देकर चलती बनीं.''

मैत्रेयी आहत हैं क्योंकि यह टिप्पणी भयानक है. आपको नहीं लगता कि दरअसल 20 औरतों के साथ सोना उतना सामंती और मर्दवादी नहीं है, जितना कि किसी औरत पर उसे लेखिका बनाने का एहसान लादना? सवाल राजेंद्र जी के सामने था और जवाब था, ''ये बहुत पुरुषवादी कमेंट है. कहानी छापकर एहसान नहीं किया. ये कहना कि 'मैंने बना दिया', बहुत पितृसत्तात्मक टिप्पणी है. मेरी और मैत्रेयी की दोस्ती जब तक थी, बहुत आत्मीय और निःस्वार्थ थी.''

जिंदगी के कठघरे में खड़े राजेंद्र खुद भी हर मुकदमे में खुद को क्लीन चिट देने को तैयार नहीं हैं. वे कहते हैं, ''मैं अपने साथ कितने अपराध-बोध और कितनी जिंदगियों का बोझ लेकर जाऊंगा. सोचता हूं तो दिल कांप जाता है कि जो बिटिया आज बीमारी में रात-दिन मेरी देखभाल कर रही है, बचपन में मैंने उसकी तरफ देखा तक नहीं. कभी एक घंटे बैठकर उससे बात तक नहीं की.'' लेकिन रचना इस बारे में अब नहीं सोचतीं. वक्त के थपेड़ों ने सारे गम भुला दिए, घाव मिटा दिए. वे खुश हैं यह सोचकर कि ''पापा ने जैसी भी जिंदगी चाही, जी. वे पॉपुलर हैं, लोग उन्हें जानते हैं. मुझे कोई शिकायत नहीं.''

राजेंद्र के अंदर कितने और राजेंद्र बसते हैं? घर छोड़ा, पत्नी-बेटी सबका साथ छूट गया, लेकिन साहित्य का दामन वे आज भी कसकर थामे हैं. हालांकि वे कहते हैं कि आज भी एकांत भोग रहा हूं. यह पूछने पर कि मन्नू से अलग होने के बाद मीता का हाथ क्यों नहीं थाम लिया, नियमों को तोड़ने वाले राजेंद्र सामाजिक नियमों की दुहाई देने लगते हैं. ''मैं बिना शादी के उसके साथ नहीं रह सकता था. समाज में दिक्कतों का सामना करना पड़ता.'' मन्नू बिफर जाती हैं. ''समाज की उन्होंने परवाह कब की, जो आज कर रहे हैं. एक शादी करके दूसरा रिश्ता रख सकते थे, लेकिन बिना शादी के साथ रहने से गुरेज है.'' अब मन्नू को भी कोई शिकायत नहीं है. राजेंद्र का मौन कहता है कि पिला दे ओक से साकी, जो हमसे नफरत है/ पियाला गर नहीं देता, न दे, शराब तो दे. और मन्नू का हाल यह है कि न पूछा जाए है उससे, न बोला जाए है हमसे. उनसे राजेंद्र की बेवफाइयों और बेदिली के बारे में सवाल करें तो कहती हैं कि मेरी किताब एक कहानी यह भी पढ़ लो, जबकि उनका मौन कहता है कि इश्क मुझ्को नहीं, वहशत ही सही. मन्नू के हर दर्द की कहानी इस बिंदु पर आकर खत्म होती है, ''मैं राजेंद्र से प्रेम करती थी. उनमें बहुत-सी बुराइयां हैं तो अच्छाइयां भी हैं. यही सम्मोहन है उनके व्यक्तित्व का.''

राजेंद्र पिछले 25 साल से हिंदी की सबसे पॉपुलर साहित्यिक पत्रिका हंस का सफलतापूर्वक संपादन कर रहे हैं. इस पत्रिका के मार्फत उन्होंने सबसे पहले स्त्री, दलित और मुसलमानों से जुड़े मुद्दों को उठाया. नए रचनाकारों को प्लेटफॉर्म दिया और इस प्लेटफॉर्म ने एक दर्जन से ज्यादा नए अच्छे लेखक पैदा किए. संभवतः वह हिंदी के इकलौते ऐसे व्यक्ति हैं, जो बहुत खुलकर कहते हैं कि स्त्री को देह के बंधन से आजाद होना चाहिए. इस सेक्चुएल फ्रीडम से कोई एतराज नहीं, लेकिन इसके आगे क्या? वह क्या है, जो सेक्चुअल फ्रीडम से भी ज्यादा जरूरी है. राजेंद्र कहते हैं, ''स्त्री आत्मनिर्भर हो, साहित्य की सत्ता में सेंधमारी करे. ताकत और पोजीशन हासिल करे.'' यह पूछने पर कि क्या 25 साल बाद ऊपर से बैठकर आप हंस की सबसे ऊंची कुर्सी पर एक स्त्री को देखना चाहेंगे, वे कहते हैं, ''हां, मैं चाहता हूं, ऐसा ही हो.''

इस समय हिंदी के गलियारों में एक सवाल सबसे ज्यादा कुलबुला रहा है कि उनके बाद हंस और अक्षर प्रकाशन का उत्तराधिकारी कौन होगा? राजेंद्र जी कहते हैं, ''वह, जो जिम्मेदारी उठाने के काबिल होगा. वैसे मैंने यह जिम्मेदारी चार लोगों को देने का फैसला किया है, बेटी रचना, संजय सहाय, वीना उनियाल और संगम पांडेय. ये सभी मिलकर हंस की जिम्मेदारी संभालेंगे.''

राजेंद्र हिंदी के खलनायक से लेकर सबसे बड़े यारबाश, हरफनमौला और जिंदादिल दोस्त हैं. उनके साथ रहने वाले लड़के किशन और उसके परिवार के लिए वे पिता से बढ़कर हैं. उनकी सहकर्मी वीना उनियाल को वे कभी बॉस लगे ही नहीं. दोस्त उनसे प्यार करते हैं. लड़कियां आज भी इस बूढ़े कैसानोवा पर जान छिड़कती हैं. अजीब पहेली है कि उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पर दम निकले. राजेंद्र मुड़-मुड़कर देखते हैं और कहते हैं, ''मैंने अपनी जिंदगी लिटरेचर के नाम कर दी.'' चाहते थे कि एक लेखक के रूप में उनकी पहचान बड़ी होती, लेकिन उन्हें दुख है इस बात का कि हंस के संपादक के रूप में उनकी पहचान लेखकीय पहचान से ज्यादा बड़ी हो गई. कुछ कहानियां अब भी अधूरी हैं. उम्मीद है, पूरी होंगी एक दिन. ऐसी हजारों अधूरी ख्वाहिशों पर दम निकलता है हर रोज.

राजेंद्र पर जिंदगी का मुकदमा जारी है. आरोपों-प्रत्यारोपों की लंबी फेहरिस्त है. खुशी के सबसे सघन क्षण हैं और दुख की सबसे लंबी रातें. कुछ ऐसे अपराध-बोध, कुछ ऐसा दर्द वे अपने साथ लेकर जाएंगे, जिससे निजात पाने का नुस्खा संसार की किसी किताब में नहीं था. शराब, दोस्त, स्त्री, प्रेम, कोई उस मर्ज की दवा न बन सका. एक ही जिंदगी थी. जीकर खत्म कर दी. हर मोड़ पर फिसले, हर गली में भटके. गलतियों का अंबार लगा दिया. लेकिन जिंदगी में रिवर्स का कोई बटन नहीं होता. जो बीत गई, सो बात गई. लेकिन दिल से कहां जाती हैं बातें. याद बनकर बैठी रहती हैं. उम्र की इस दहलीज पर राजेंद्र के दिल में यादों का जो घमासान मचा है, उनके सिरहाने बैठा कोई दोस्त शायद ही हाथ बढ़ाकर उसे छू पाता है. वे कहते हैं, ''कुछ दर्द हमें अकेले ही झेलने होते हैं. जिंदगी का एकांत बांटने कोई नहीं आता.''

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