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राज्यों ने बांट लिए वन, वनराज को पता न चला

बबर शेरों के लिए मध्य प्रदेश के कुनों-पालपुर अभयारण्य में दूसरा ठिकाना बनाने की योजना का गुजरात ने किया विरोध.

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बबर शेरों के लिए दूसरा आशियाना बनाने के प्रस्ताव ने गुजरात और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारों को एक-दूसरे के खिलाफ  खड़ा कर दिया है. अभी गुजरात का गिर अभयारण्य बबर शेरों का एकमात्र ठिकाना है. गुजरात नहीं चाहता कि मध्य प्रदेश में ग्वालियर के पास कुनो-पालपुर अभयारण्य में गिर से कुछ शेर भेजकर नई सिंहभूमि बनाई जाए. भारतीय वन्यजीवन संस्थान (डब्लूआइआइ) की सलाह पर 1990 के दशक में केंद्र सरकार ने शेरों के लिए नया आशियाना बनाने का फैसला किया था.

वन्य जीवन के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन (एनजीओ)बायोडाइवर्सिटी कंजर्वेशन ट्रस्ट की याचिका पर यह मामला 1 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पेश हुआ. सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार ने गुजरात के उन आरोपों को बेबुनियाद बताया जिनमें कहा गया था कि मध्य प्रदेश के वन अधिकारी शेरों की देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं.

मध्य प्रदेश के इलाके में शिकार होता रहता है और वहां इतनी जगह भी नहीं है कि शेर शिकार कर सकें. इस बहस को उस वक्त और हवा मिल गई जब मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने अपनी वेबसाइट पर यह जानकारी पोस्ट की कि ''कुनो को उन विलुप्तप्राय बबर शेरों के लिए वैकल्पिक ठिकाने के रूप में चुन लिया गया है जो अभी तक गुजरात के गिर राष्ट्रीय अभयारण्य में ही पाए जाते हैं.''

गुजरात सरकार का दावा है कि उसने शेरों के संरक्षण के लिए पर्याप्त उपाय किए हैं और उनके लिए दूसरा ठिकाना तलाशना गैर जरूरी है. गिर में शेरों की संख्या बढ़कर 411 तक पहुंच चुकी है और राज्‍य सरकार अपनी ग्रेटर गिर अवधारणा के तहत अभयारण्य के घास के मैदान में 400 वर्ग किलोमीटर और वन क्षेत्र में 1,400 वर्ग किलोमीटर तक की बढ़ोतरी करने में कामयाब हुई है.

गुजरात के वन अधिकारियों का यह भी कहना है कि गिर में सक्रिय शिकारी मध्य प्रदेश के कटनी से आते हैं, जो कुनो-पालपुर से बहुत दूर नहीं है. इसका मतलब यह है कि प्रस्तावित दूसरा ठौर शेरों के लिए सुरक्षित नहीं है. गुजरात में वनों के प्रधान मुख्य संरक्षक प्रदीप खन्ना कहते हैं, ''निश्चित रूप से शेरों को गुजरात से बाहर ले जाने की कोई जरूरत नहीं है. यह विलुप्तप्राय प्रजाति कहीं और के मुकाबले यहां ज्‍यादा सुरक्षित है.''

लेकिन उनके उलट मध्य प्रदेश के वन मंत्री सरताज सिंह कहते हैं, ''यह कहना गलत होगा कि बबर शेर कुनो-पालपुर में सुरक्षित नहीं रहेंगे. मध्य प्रदेश ने राज्‍य में बाघों की मौजूदगी वाले अन्य राष्ट्रीय उद्यानों का बेहतरीन प्रबंधन किया है. गुजरात को यह बात समझनी चाहिए कि इस प्रजाति के अच्छे भविष्य के लिए ही दूसरा आशियाना बनाना जरूरी है.''

गुजरात के एक अन्य वन अधिकारी याद दिलाते हैं कि शेरों को कुनो-पालपुर भेजने की भारतीय वन्यजीवन संस्थान की सिफारिश एक राजनीतिक निर्णय थी क्योंकि तब इस संस्था में मध्य प्रदेश के अधिकारियों का ही दबदबा था. उन्होंने कहा कि दूसरे ठिकाने का विचार सतही है क्योंकि कुनो-पालपुर का क्षेत्रफल सिर्फ 344 वर्ग किलोमीटर है और सिफारिश सिर्फ छह शेरों के स्थानांतरण की थी.

हालांकि, ए.जे.टी. जॉन सिंह जैसे प्रख्यात वन्य जीवन विशेषज्ञों का मानना है कि बबर शेरों के लिए गिर के अलावा कोई दूसरा ठिकाना तलाशना जरूरी है. वे कहते हैं, ''शेरों को बचाने के लिए गुजरात सरकार के प्रयासों की कोई अनदेखी नहीं कर सकता, लेकिन प्रकृति की अनहोनी की कोई सीमा नहीं है.

1994 में तंजानिया के सेरेंगेटी नेशनल पार्क में पाए जाने वाले 4,000 शेरों का एक चौथाई हिस्सा कुत्ते से फैली एक महामारी की वजह से खत्म हो गया था. सेरेंगेटी तो 30,000 वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ है जो कि गिर के मुकाबले कई गुना है. दूसरा ठिकाना तलाशने में ही समझ्दारी है.''

मध्य प्रदेश सरकार ने कुनो-पालपुर अभयारण्य में 700 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र और जोड़ा है ताकि वहां ज्‍यादा से ज्‍यादा शेरों को रखा जा सके. लेकिन यह गुजरात में चुनाव का वर्ष है और गुजराती 'गौरव' दांव पर लगा हुआ है, ऐसे में शेरों को अपने नए आशियाने के लिए और इंतजार करना पड़ सकता है.

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