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ध्यान रहे, पेट से ही शुरू होती हैं तमाम बीमारियां

अनियमित लाइफस्टाइल, तनाव, फास्ट फूड, धूम्रपान और शराब का अत्यधिक सेवन, ये सारी चीजें आंतों को बुरी तरह प्रभावित करती हैं, जिससे पाचन संबंधी गंभीर रोग पनपते हैं.

Gastroesophageal Gastroesophageal

हरीश अवस्थी (बदला हुआ नाम) एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत युवा, उत्साही सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. बिना ब्रेक लिए देर रात तक काम करना, अमूमन नाश्ता न करना, फास्ट फूड जमकर खाना, लंच के दौरान सॉफ्ट ड्रिंक की बड़ी-सी बोतल गटकना और काम का तनाव भगाने के लिए नियमित अंतराल पर सिगरेट फूंकना एक तरह से उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है.

अभी हाल तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता दिख रहा था. फिर एक दिन उन्हें सीने में जलन होने लगी. लंच के बाद पेट जैसे फूलने लगा, और उनके बार-बार टॉयलेट के चक्कर लगने लगे. यह सब देखकर मुझे यूनानी चिकित्सक हिपोक्रेट्स का यह जुमला याद आने लगा: ‘सारी बीमारियां पेट से ही शुरू होती हैं.’

हिपोक्रेट्स ने भले ही यह बात दो हजार साल से भी ज्यादा पहले कही हो, लेकिन हमें अब जाकर यह समझ में आना शुरू हुआ है कि वे कितनी पते की बात कह रहे थे. एक स्वस्थ वयस्क इन्सान की सिर्फ आंत में ही करीब 100 खरब बैक्टीरिया पाए जाते हैं. ये अलग-अलग किस्म के होते हैं और उनके हितों के बीच टकराव पैदा होने से बीमारियां उपजती हैं.

पिछले दो दशकों में हुई रिसर्च से पता चला है कि पूरी तरह स्वस्थ रहने के लिए आंतों का स्वस्थ रहना कितना जरूरी है. आंतों की सेहत पर लाइफस्टाइल का जबरदस्त असर होता है. ज्यादा कैलोरी वाले जंक फूड और शराब का अधिक सेवन, इसके अलावा रेशेदार भोजन और हरी सब्जियां न खाने से पाचन तंत्र के रोगों का खतरा बढ़ जाता है और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम पर बुरा असर पड़ता है. गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स रोग, इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम, फंक्शनल डिस्पेप्सिया, मोटापा, लीवर में फैट जमना और पेप्टिक अल्सर जैसे रोग लाइफस्टाइल से जुड़े गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों में शामिल हैं.

अकसर तनाव में रहने से भी आपका हाजमा खराब हो सकता है. तनाव होने पर आम तौर पर एड्रिनल ग्रंथियों से एड्रेनैलिन और कॉर्टिसॉल नाम के हार्मोनों का स्राव होता है. तनाव की वजह से पूरे पाचन तंत्र में जलन होने लगती है जिससे पाचन नली में सूजन आ जाती है और इस सबका नतीजा यह होता है कि पोषक तत्वों का शरीर के काम आना कम हो जाता है.

लंबे समय तक जारी रहने पर तनाव की वजह से इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम और पेट में अल्सर जैसी पाचन संबंधी तकलीफें हो सकती हैं. जांच के लिए डॉक्टरों के पास जाने वाले रोगियों की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि गैस्ट्रोइसोफेगल रीफ्लक्स (जीईआरडी) अब पाचन संबंधी सामान्य रोग बन गया है. जीईआरडी में असल में पेट के अंदर मौजूद अम्ल यानी एसिड इसोफेगस (भोजन नली) में वापस चले जाते हैं. इससे सीने में जलन तो होती ही है, उल्टी की शिकायत भी होती है. इसके अलावा फेफड़े, कान, नाक या गले की भी कई तकलीफें आ पड़ती हैं. इसके साथ कई परेशानियां जुड़ी हैं. मसलन, इसोफेगस में छाले और संकुचन जैसी परेशानियां भी हो जाती हैं. जीईआरडी अगर लंबे समय तक रह गया तो एक नई अवस्था आ सकती है, जिसका नाम है बैरेट्स इसोफेगस और इसका अगर समय पर इलाज न किया गया तो इसोफेगस का कैंसर भी हो सकता है.

पेट की हल्की लेकिन बार-बार शिकायतें होने पर जीवनशैली में थोड़े-बहुत बदलाव खास तौर पर फायदेमंद हो सकते हैं. इनमें बिस्तर पर सिर ऊंचा रखकर सोना, तंग कपड़े न पहनना, वजन ज्यादा होने पर उसे घटाना, शराब और सिगरेट का इस्तेमाल कम करना, खुराक में बदलाव करना, भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचना और सोते समय खाने से बचना शामिल है.

धूम्रपान और शराब का ज्यादा मात्रा में उपयोग करने से इसोफेगस में लौटते एसिड की मात्रा बढ़ती है, पेट में बनने वाले एसिड की मात्रा भी बढ़ जाती है. इससे पेट के अल्सर के ठीक होने में भी रुकावट आने लगती है. हाल के कुछ अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि शराब के साथ-साथ धूम्रपान का लीवर और पैंक्रियाज को नुकसान पहुंचाने में बहुत बड़ा हाथ है. पैंक्रियाज हर तरह के भोजन को पचाने वाला महत्वपूर्ण अंग है जबकि लीवर शरीर में भोजन के पचने के बाद उसके अवशोषण के लिए जरूरी है.

यह तो जाहिर-सी बात है कि हमारे मुल्क में मोटापा चिंताजनक स्तर पर बढ़ रहा है. पित्ताशय में पथरी, शराब के अलावा चर्बी वाले लीवर के रोग और गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स जैसे आंतों के कई रोगों में मोटापे का भी शर्तिया तौर पर हाथ है.

पाचन संबंधी रोग शरीर में जगह न बना सकें, इसके लिए जरूरी है कि वजन जरूरत से ज्यादा न होने पाए. वजन न बढ़े, इसके लिए रेशे वाले साबुत अनाज, फल, हरी सब्जियां, कम चर्बी वाला गोश्त और उसी तरह के डेयरी उत्पादों के अधिक सेवन के साथ पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ भी लेना चाहिए. एक ही बार में बहुत ज्यादा भोजन कर लेने से पाचन नली पर दबाव बढ़ सकता है. इसलिए ज्यादा बेहतर यह होगा कि दिन भर में नियमित अंतराल पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भोजन करते रहा जाए.

हाजमे के मामले में अगर आपको लंबे समय तक या फिर गंभीर रूप से कोई समस्या महसूस हो तो बिना और किसी तरह की देर किए अस्पताल पहुंचना चाहिए और कंप्लीट हेल्थ चेकअप कराना चाहिए.

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों के बारे में जरूरी जानकारी-
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोगों के कारण:
जीवन शैली इस तरह के रोग बेहिसाब शराब और सिगरेट पीने, फास्ट फूड ज्यादा खाने और काम के वक्त दफ्तर में तनावपूर्ण स्थितियां बनने से होते हैं.
जेनेटिक कारण इस बारे में ताजा अध्ययनों से पता चला है कि जेनेटिक रचना में एकाएक आए किसी तरह के बदलाव के कारण पैंक्रियाइटिस और पित्ताशय की पथरी जैसे रोग अधिक होते हैं.
आसपास का परिवेश और स्वच्छता साफ-सफाई की कमी से हेपेटाइटिस और तपेदिक जैसे संक्रमण होते हैं.

एहतियाती उपाय:
पोषक खुराक लें, कसरत करें, धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें, खुद को साफ रखने के अलावा टीके वगैरह भी जरूरी हैं. पेट, बड़ी आंत, लीवर कैंसर की जांच भी करवाएं.

(लेखक हैदराबाद स्थित एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोएंटीरोलॉजी के संस्थापक अध्यक्ष हैं.)

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