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लोकपाल: मतभेदों से बिगड़ती बात

सरकार ने भले ही लोकपाल विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए 30 जून की समय-सीमा तय कर ली हो लेकिन उसे यह भी देखना है कि यह विधेयक संसद में पारित हो जाए. इसलिए जरूरी संख्या जुटाने के लिए सरकार ने मानसून सत्र को लगभग एक पखवाड़े के लिए आगे बढ़ा दिया है.

सरकार ने भले ही लोकपाल विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए 30 जून की समय-सीमा तय कर ली हो लेकिन उसे यह भी देखना है कि यह विधेयक संसद में पारित हो जाए. इसलिए जरूरी संख्या जुटाने के लिए सरकार ने मानसून सत्र को लगभग एक पखवाड़े के लिए आगे बढ़ा दिया है.

मसौदे को अंतिम रूप देने के बमुश्किल एक घंटा बाद प्रधानमंत्री ने यूपीए गठबंधन के सभी सहयोगियों को रात्रिभोज पर आमंत्रित किया, जहां वित्त मंत्री और लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी के प्रमुख प्रणब मुखर्जी ने सभी के सामने विस्तार से अपना पक्ष रखा.

कुछ सहयोगी दलों जैसे तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, मुस्लिम लीग और राष्ट्रीय जनता दल ने सरकार के मसौदे का समर्थन किया, जिसमें प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है. वहीं द्रमुक ने इस प्रस्ताव का विरोध किया.

एक कैबिनेट मंत्री के मुताबिक, ''हम इस मसले पर द्रमुक को राजी करने की उम्मीद कर रहे हैं. उसका विरोध 2जी घोटाले से जुड़ा है और लोकपाल विधेयक से उसे कुछ खास लेना-देना नहीं है.'' अभी जहां समाजवादी पार्टी (सपा) अपनी राय नहीं बना सकी है, वहीं सूत्रों का कहना है कि वह प्रधानमंत्री, सांसदों और उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में रखने के पक्ष में नहीं है.

सरकार को उम्मीद है कि द्रमुक के 18 सांसदों ने अगर साथ नहीं दिया तो सपा के 22 सांसद जरूरी संख्या पूरी करने में काम आ सकते हैं. लेकिन मोल-भाव में अपनी अहमियत को हमेशा ध्यान में रखने वाली सपा ने अभी तक अपनी राय को अंतिम रूप नहीं दिया है. बसपा भी अभी अपना मन नहीं बना पाई है लेकिन कांग्रेस के साथ मौजूदा कटुता को देखते हुए शायद वह सरकार का समर्थन न करे.

इस मसले पर 3 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है. लेकिन विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वह सरकार का साथ देने के मूड में नहीं है. भाजपा का कहना है कि वह अपना रुख जाहिर करने से पहले बैठक का इंतजार कर रही है. लेकिन अनधिकृत तौर पर इसके नेता बताते हैं कि वे प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल में शामिल करने पर जोर देंगे.

इस बात ने संसद में सरकार के लिए संख्या जुटाने वाले मैनेजरों की चिंता बढ़ा दी है, जिन्हें उम्मीद थी कि लोकपाल का मुद्दा संसद बनाम सिविल सोसाइटी में बदल जाएगा. कपिल सिब्बल, जो ड्राफ्टिंग कमेटी में मुखर्जी, सलमान खुर्शीद, वीरप्पा मोइली और पी. चिदंबरम के साथ सरकार की ओर से नामांकित सदस्य थे, कहते हैं, ''हम निश्चित ही उनकी सलाह लेंगे.

राजनैतिक व्यवस्था से सलाह-मशविरे के बाद ही हम कैबिनेट में जाएंगे.'' कानून मंत्री मोइली ने तुरंत इस बात को स्पष्ट किया कि भले ही वे सरकार की ओर से नामांकित हों लेकिन उन लोगों ने जो विधेयक तैयार किया है, वह सरकार का नजरिया नहीं है. उन्होंने कहा, ''कैबिनेट में फैसला होने के बाद ही यह सरकार का नजरिया होगा.''

जुलाई के मध्य, जैसाकि पहले तय किया गया था, की जगह 1 अगस्त को दोबारा संसद बुलाने के फैसले को देखते हुए इसकी उम्मीद कम ही है कि यह अण्णा हजारे की ओर से तय की गई 16 अगस्त की समय-सीमा से पहले पारित हो सकव्गा. इसके अलावा कैसा भी विधेयक पारित कराने भर से अण्णा हजारे संतुष्ट नहीं होने वाले हैं. वे चाहते हैं कि संसद उनके मसौदे वाले बिल को पारित करे.

यह अनुमान लगाते हुए कि विपक्ष अण्णा से मुकाबला करने में उसका साथ नहीं देगा, कांग्रेस ने एक समानांतर रणनीति तैयार की है. जहां पहले योजना थी कि अण्णा की टीम को बहलाया-फुसलाया जाए, वहीं अब सरकार हजारे और उनके सहयोगी कार्यकर्ताओं को बदनाम करने में लग गई है.

हजारे कहते हैं, ''एक मजबूत लोकपाल बिल पर काम करने की जगह सरकार वित्तीय धांधलियों के मुद्दे उठा कर हमें परेशान करना चाहती है.'' जैसा कि उसने बाबा रामदेव के साथ किया. सरकारी टीम हजारे पर पुलिसिया हमला करने का मन बना रही है.

6 जून को महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के दफ्तर की एक टीम ने रालेगांव सिद्धि में हजारे के संचालित हिंद स्वराज ट्रस्ट का दौरा किया. उन्होंने कुछ फाइलों की जांच की और ट्रस्ट के हिसाब-किताब के बारे में कर्मचारियों से पूछताछ की. हजारे कहते हैं, ''हमने उन्हें सारे कागजात सौंप दिए. अगर हमने गड़बड़ी की है तो वे हमारे खिलाफ मामला दर्ज करें.''

सरकार ने सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ता अरविंद कव्जरीवाल के खिलाफ राजस्व सेवा के दौरान की गई किसी भी अनियमितता का सबूत खोज निकालने की भी कोशिश की. हजारे का अभियान चलाने वाले संगठन इंडिया अगेंस्ट करप्शन की संयोजक स्वाति मालीवाल कहती हैं, ''हमें पता चला कि कुछ अधिकारियों के समूह से कहा गया कि वे कव्जरीवाल के कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा संभाली गई फाइलों की गहराई से छानबीन करें. लेकिन उन्हें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला.

 दिग्विजय कहते हैं कि हजारे एक और उपवास करने गए तो उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाएगा जैसा दूसरे (रामदेव) के साथ किया गया.

 हजारे के 9 जून के पत्र का सोनिया गांधी ने जो जवाब दिया वह 19 अप्रैल को दिए गए उनके जवाब के मुकाबले काफी सख्त था. पहले वाले पत्र की भाषा में सहानुभूति का भाव था और उन्हें भरोसा दिलाया गया था, लेकिन बाद वाले पत्र में तीन लाइनों में झ्ड़िकी देने वाली भाषा थी. कम-से-कम दो कांग्रेस महासचिवों जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह ने हजारे को आरएसएस का चेहरा बताया है.

इसके लिए सोनिया ने उन दोनों के प्रति कोई नाराजगी नहीं जाहिर की है, जबकि इससे पहले जब दिग्विजय ने अप्रैल में हजारे के खिलाफ इस तरह के आरोप लगाए थे तो सोनिया को यह पसंद नहीं आया था. एक अन्य कांग्रेस महासचिव, बी.के. हरि प्रसाद ने कर्नाटक के लोक आयुक्त और लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य संतोष हेगड़े की साख पर सवाल उठाया था, ''वे लोकपाल के मामले में क्या योगदान दे सकते हैं, जब कर्नाटक का लोक आयुक्त रहते हुए वे बी.एस. येद्दियुरप्पा की भ्रष्ट सरकार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सके.''

सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि टीम हजारे सिर्फ नया विधेयक तैयार करना नहीं चाहती बल्कि संविधान बदलना चाहती है. सरकार इस बात से बेहद खुश है कि सिविल सोसाइटी आपस में बंट गई है. इस महीने से पहले राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की सदस्य अरुणा रॉय और उनके शिष्य केजरीवाल के बीच कई ई-मेलों का आदान-प्रदान हुआ था.

रॉय और एनएसी के अन्य सदस्यों ने खुले तौर पर लोकपाल बिल पर हजारे के रुख पर सवाल उठाया. उन्होंने केजरीवाल को लिखा, ''लोकपाल बिल देश में कहीं भी कुछ लोगों के एक समूह का पैतृक अधिकार है.'' लेकिन वे दिग्विजय सिंह की इस राय से सहमत नहीं थीं कि  उन्हें और एनएसी के एक अन्य सदस्य हर्ष मंदर को ड्राफ्टिंग कमेटी का हिस्सा होना चाहिए था.

घोटालों से दागदार यूपीए जानता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी जंग की धार तेजी से क्षीण होती जा रही है. उसका काम इस बात से और भी कठिन हो गया है कि सिविल सोसाइटी की ओर से विरोध हो रहा है. यह ऐसा वोट बैंक है जिसकी वह उपेक्षा नहीं कर सकता. जब पूछा गया कि बोतल से जिन्न बाहर हो गया है, ऐसे में सरकार अब क्या करेगी तो सिब्बल का जवाब था, ''जिन्न को वापस बोतल में बंद कर दो.'' उनके पास ऐसा करने के लिए 16 अगस्त तक का समय है.

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