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गहलोत की यह अंतिम बेला तो नहीं

भरतपुर में मेव मुसलमानों के मारे जाने से न सिर्फ राजस्थान बल्कि दूसरे राज्‍यों में भी मुसलमानों के नाराज होने का खतरा. सूत्रों का कहना है कि पुलिस की गोलीबारी में तो तीन व्यक्ति ही मारे गए, लेकिन बाकी की हत्या गुर्जरों की भीड़ ने की थी.

गोपालगढ़ गोपालगढ़

यह राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में क्या अशोक गहलोत के कार्यकाल के खात्मे का संकेत है? 14 सितंबर को भरतपुर में नौ मेव मुसलमानों का मारा जाना उनके लिए अशुभ हो सकता है. भरतपुर जिले के गोपालगढ़ कस्बे में मेव मुसलमानों और गुर्जरों के बीच विवाद को रोकने के लिए पुलिस एक बख्तरबंद गाड़ी की आड़ में राइफलों से गोलियां चलाती हुई एक मस्जिद में जा घुसी.

मेव कांग्रेस का वोट बैंक हैं जो राजस्थान और हरियाणा दोनों राज्‍यों में रहते हैं. सूत्रों का कहना है कि तथ्यान्वेषी तीनों टीमें-एक कांग्रेस मुख्यालय से, दूसरी राज्‍य इकाई की ओर से भेजी गई और तीसरी केंद्रीय गृह राज्‍य मंत्री जितेंद्र सिंह के स्वतंत्र दौरे में आई-का मानना है कि राज्‍य सरकार स्थिति से ठीक ढंग से नहीं निबट पाई और गोलीबारी से बचा जा सकता था.

मेव मुसलमानों के मारे जाने का मुख्यमंत्री के लिए इससे खराब वक्त और क्या हो सकता था. पिछले हफ्ते सरकार को कुछ नामी लोगों की हत्या के मामलों से निबटना पड़ा. 18 सितंबर को हनुमानगढ़ के नगर युवक कांग्रेस अध्यक्ष नवाब अली को पीलीबंगा में सुबह टहलने जाते समय गोली से उड़ा दिया गया. उसी दिन डूंगरपुर में स्थानीय कांग्रेसी नेता गहरीलाल पट्टीदार की भी हत्या हो गई.

गहलोत की परेशानी का सबब यह भी है कि उनके मंत्री महीपाल मदेरणा पर 1 सितंबर को लोक नर्तकी भंवरी देवी को गायब करवाने का आरोप है. बताया जाता है कि भंवरी ने वह वीडियो सीडी सार्वजनिक करने की धमकी दी थी, जिसमें उसे मदेरणा और कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं के साथ अंतरंग स्थिति में दिखाया गया है. सरकार ने 13 सितंबर को इस मामले की जांच सीबीआइ से कराने का फैसला किया.

भरतपुर में विवाद की जड़ थी गांव की मस्जिद के पास जमीन का एक टुकड़ा, जिसकी वजह से दोनों समुदायों में तनाव पैदा हो गया. गुर्जरों और सरकारी अधिकारियों का कहना है कि कोई दो दशक पहले एक पटवारी ने गलती से वह जमीन मेवों को कब्रिस्तान के लिए हस्तांतरित कर दी थी. गुर्जरों ने इसे अदालत में चुनौती दे रखी थी.

13 सितंबर को गोली चलाए जाने से एक दिन पहले गोपालगढ़ में दो अफवाहों को लेकर तनाव फैल गया. एक अफवाह यह थी कि गुर्जरों ने एक मौलवी का हाथ काट दिया है और दूसरी यह कि पुलिस ने एक मेव बदमाश को हिरासत में मार डाला है. इस पर अदालत परिसर में तारीख भुगतने आए दोनों समुदायों के बीच हाथापाई हो गई.

गोपालगढ़ की घटनाओं से अनभिज्ञ गहलोत ने 13 सितंबर की देर रात कोई एक बजे कानून और व्यवस्था को लेकर अधिकारियों के साथ बैठक की. उसमें उन्होंने पुलिस को निर्देश दिए कि वह शांति और भाईचारे को भंग करने के प्रयासों को लेकर बाखबर रहे.

अगले दिन, गहलोत की बैठक के नौ घंटे बाद, आसपास के इलाकों से कोई 1,000 मेव मस्जिद में इकट्ठे हुए और उन्होंने मौलवी की पिटाई किए जाने पर गुर्जरों के खिलाफ शिकायत करने का फैसला किया. यह कहना है उस मौके के गवाह अख्तर 'सैन का, जो कांग्रेस के नगर ब्लॉक के अध्यक्ष हैं. कोई 400 गुर्जर भी उस जगह पर पहुंच गए. दोनों पह्नों ने एक-दूसरे पर गोलियां चलाईं. भरतपुर में अधिकांश परिवारों के पास कानूनी या गैर-कानूनी ढंग से हासिल किए गए हथियार हैं.

जिला अधिकारियों ने दोनों पक्षों को शांत किया और समुदाय के बुजुर्गों को थाने में ले आए. जिलाधिकारी कृष्ण कुणाल और पुलिस अधीक्षक हिंगलाज दान की मौजूदगी में लंबी बातचीत के बाद कमान की कांग्रेसी विधायक जाहिदा खान और नगर की भाजपा विधायक अनिता सिंह शाम को 4.30 बजे मेवों के प्रतिनिधि अबु सरपंच और गुर्जरों के प्रतिनिधि शेर सिंह को लेकर समझैते को अंतिम रूप देने छत पर चली गईं. यह कहना है नजदीक के एक गांव के 35 वर्षीय मेव आत्मादीन का, जो मौके पर ही मौजूद था.

आत्मादीन और 'सैन बताते हैं कि ऐन इसी वक्त कुछ गुर्जरों ने दावा कर दिया कि मेव पहले ही पांच गुर्जरों की हत्या कर चुके हैं. आत्मादीन ने बताया, ''थाने में उनकी संख्या मेवों से अधिक थी और उन्होंने कलेक्टर पर गोलीबारी के आदेश पर दस्तख्त करने के लिए दबाव डाला.''

ऐसा लगता है कि अधिकारी दबाव में आ गए और उन्होंने दंगा नियंत्रण करने वाली बख्तरबंद गाड़ी के साथ एक सब-इंस्पेक्टर के नेतृत्व में 50 सशस्त्र पुलिसकर्मियों को 800 मीटर दूर मस्जिद में भेज दिया. गुर्जर उनके साथ वहां गए. बाद की जांच में लगे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है, ''आदेश था कि सशस्त्र मेवों को मस्जिद से हटाया जाए और गुर्जरों के शव हासिल किए जाएं, लेकिन वहां नेतृत्व का पूरी तरह अभाव था.''

पुलिस गुर्जरों की भीड़ के साथ मस्जिद की तरफ  बढ़ गई. आत्मादीन का कहना था, ''बख्तरबंद गाड़ी अलग-अलग जगहों से हवा में गोलियां चला रही थी और उसकी आड़ में पुलिसवालों ने सशस्त्र गुर्जरों के साथ मस्जिद में प्रवेश किया. अधिकारी ने बताया, ''वरिष्ठ अधिकारी चूंकि थाने में ही रुके रह गए, इसलिए मस्जिद में जाने वाले पुलिसवाले भी घटनास्थल से भाग गए और मेवों को सशस्त्र गुर्जरों के रहमोकरम पर छोड़ गए.''

हुसैन का कहना है कि उसने यह नजारा थाने की छत से देखा. उसका दावा है, ''जो घायल वहां से भाग निकलने की कोशिश कर रहे थे, गुर्जरों और पुलिस दोनों ने उन्हें पकड़कर घसीटा.'' आत्मादीन का कहना है, ''मेरे बगल में खड़े तीन पुलिसवालों के साथ मैंने देखा कि कुछ घायलों को घसीटकर गोबर के ढेर पर और उस भूसे में फेंका जा रहा है जिसमें आग लगाई जा चुकी थी.''

हालांकि प्रेस में जाते समय तक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं आई थी, लेकिन सूत्रों का कहना है कि सीधी पुलिस गोलीबारी में तीन व्यक्ति मारे गए जबकि बाकी गुर्जरों की भीड़ के आने के बाद मारे गए. मुख्य सचिव एस. अहमद और पुलिस महानिदेशक एच.सी. मीणा ने 18 सितंबर को दावा किया था कि अधिकतर लोग तेज धारवाले हथियारों से और उन हथियारों से घायल हुए थे, जिन्हें लेकर पुलिस नहीं चलती. अहमद ने बताया, ''प्रशासन की तरफ से कोई लापरवाही नहीं बरती गई. इसके विपरीत, पुलिस के हस्तक्षेप से बहुत-से लोगों की जानें बचाई जा सकीं.''

जाहिदा खान का आरोप है, ''पुलिस के गोली चलाए जाने से पहले किसी की मौत नहीं हुई थी. पुलिस ने भीड़ को एक खास वर्ग पर हमले के लिए उकसाया था.'' प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चंद्रभान ने इन हत्याओं के लिए प्रशासन को दोषी ठहराया. पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय सचिव और उस स्थान का दौरा करने वाले दल की सदस्य काईता श्रीवास्तव सवाल उठाती हैं, ''पुलिस एक तरफ के लोगों को घिर गए लोगों की हत्या करने और गोलीबारी के बाद जले हुए शवों को कुएं में फेंक देने की इजाजत कैसे दे सकती है?

मुश्किलों से घिर गए गहलोत ने 16 सितंबर को पहले सीबीआइ और फिर हाइकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच कराने के आदेश दे दिए. मार्च में मुसलमानों के विरोध के कारण उन्हें सवाई माधोपुर के थानाध्यक्ष फूल मुहम्मद को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने के मामले की सीबीआइ जांच कराने का आदेश देना पड़ा था. इस घटना से पहले एक मीणा युवक ने खुद को जला लेने के बाद पानी के एक टैंक से छलांग लगा दी थी.

पुलिस और प्रशासन में नाकामियों के बाद कांग्रेस सोच रही है कि क्या वह 2013 के अगले विधानसभा चुनावों में गहलोत के नेतृत्व में चुनाव लड़ सकती है.

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