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किसानों का संकट: अच्छी फसल बन गई सिरदर्द

मौसम ने किसानों का साथ दिया और अच्छी फसल हुई तो मध्‍य प्रदेश सरकार उनकी दुश्मन बन गई.

मंडी में पड़ा गेहूं का भंडार मंडी में पड़ा गेहूं का भंडार

अपना खून-पसीना बहाकर फसल उगाने के बाद मध्य प्रदेश के किसान फसल बेचने के इंतजार में कई दिनों तक लाइन में खड़े रहते हैं. गेंहूं खरीद की प्रक्रिया इतनी कठिन हो गई है कि नतीजा संघर्ष और मारपीट के रूप में देखने को मिल रहा है. राजगढ़ जिले के मंडावर गांव में 24 मई को गेंहूं तुलवाने के विवाद पर मंडी परिसर में किसान सुनील खाती की हत्या कर दी गई.

राजगढ़ की सबसे बड़ी मंडी ब्यावरा में डोलजी सिंह 45 डिग्री तापमान में 16 दिनों से अपनी फसल बेचने का इंतजार कर रहे हैं. खुले आसमान के नीचे चंद पेड़ों की छांव में किसानों ने डेरा डाला हुआ है. मैदानों में खुले पड़े गेंहूं को धूप और  जानवरों से बचाने के लिए प्लास्टिक के जरिए किसी तरह ढका गया है. लगभग 10 बीघा जमीन के मालिक डोलजी 14 किमी दूर गांव बेलास से गेंहूं बेचने आए हैं. वे कहते हैं, ''कई किसान तो 22-25 दिनों से इंतजार कर रहे हैं. उम्मीद है कि बारिश न हो और सरकार गेंहूं खरीद ले.''

इस बीच राजगढ़ के कलेक्टर एम.बी. ओझा के एक आदेश ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. इसके मुताबिक, 50,000 रु. से अधिक का गेंहूं बेचने वाले किसानों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया जाएगा, यानी 37 क्विंटल से ज्‍यादा फसल बेचने वाले किसान गरीबी रेखा से बाहर हो जाएंगे. सरकार समर्थन मूल्य पर 1,385 रु. प्रति क्विंटल पर खरीदी कर रही है. यदि ऐसा हुआ तो राजगढ़ में ही हजारों गरीब किसानों को उन सरकारी सुविधाओं से वंचित होना पड़ेगा, जिनका लाभ वे अब तक गरीब होने की वजह से लेते आए हैं. गरीबी रेखा का किसान होकर अच्छी फसल पैदा करना उनके लिए मुसीबत बन गया है.

डोलजी गरीबी रेखा में आते हैं. घर के उपयोग के लिए छोड़कर वे बाकी 50 क्विंटल गेंहूं बेचने आए हैं. उनकी मुश्किल भी यही है कि गेंहूं बिकने के बाद वे गरीबी रेखा में रह जाएंगे या नहीं. वे कहते हैं, ''सरकार कैसे हमें अमीर मान रही है. हम बड़ी मुश्किल से गुजारा करते हैं. यदि हम 50,000 रु. का गेंहूं बेचते भी हैं तो वह पूरा मुनाफा तो है नहीं, उसमें उत्पादन लागत भी है.''

ओझा के इस निर्देश के बाद सिर्फ राजगढ़ में ही हजारों किसान गरीबी रेखा से बाहर हो जाएंगे. सवाल यह है कि यदि उन्हें इस साल बीपीएल सूची से हटाया जा रहा है तो क्या अगले साल फसल अच्छी न होने पर पुनः बीपीएल सूची में शामिल किया जाएगा?

भूकनी गांव के पूरजी तीन हफ्ते से ब्यावरा में बैठे हैं. उनका 40 क्विंटल गेंहूं बिकते ही वे भी गरीबी रेखा से बाहर हो जाएंगे, यानी 18 किलो गेंहूं, 2 किलो चावल और 3 लीटर घासलेट से वंचित हो जाएंगे. लोहारी गांव के राजाराम गुर्जर 3.5 एकड़ जमीन में हुआ 45 क्विंटल गेंहूं बेचने आए हैं. वे कहते हैं, ''सरकार बड़े-बड़े वायदे करती है, मगर किसान की परेशानी नहीं समझ्ती. पिछले साल तक खराब फसल ने किसान को तोड़ दिया था, अब फसल अच्छी हुई तो सरकार तोड़ रही है.'' तो क्या यह माना जाए कि मध्य प्रदेश का किसान 50,000 रु. का गेंहूं बेचकर एकाएक रईस हो रहा है या फिर गेंहूं का उत्पादन बहुत मुनाफे का सौदा है.

तुलसीपुरा के कालू सिंह 19 दिनों से ब्यावरा में बैठे हैं. वे बताते हैं कि लागत के बाद किसान कुछ बचा ले तो गनीमत है. वे कहते हैं, ''खेती के लिए बीज लगते हैं. खाद, दवाई, पानी, हकाई, जुताई और बिजली लगती है. सबका पैसा देना पड़ता है. किसान अपनी मेहनत नहीं जोड़ता. मौसम ने मदद की तो ठीक, नहीं तो जितना बीज डालते हैं उतना भी नहीं निकलता. जब नुकसान होता है तो सरकार कोई मदद नहीं करती. फायदा होता है तो किसान सरकार को खटकने लगता है.''

किसानों की मुश्किलें कम नहीं हैं. बरखेड़ी के किसान नारायण सिंह बताते हैं कि एक नया आदेश निकाला गया है. यदि आपको गेंहूं बेचना है तो पटवारी से लिखवा कर लाना होगा कि आपके पास कितनी जमीन है. सारे कागज वे पहले ही लगे हुए हैं. लेकिन अब किसान इसके लिए भी पटवारी के चक्कर लगा रहे हैं. वहीं बरदाने का खर्च उठाना पड़ रहा है. सरकार ने बरदाने की कमी के चलते किसानों से कहा था कि वे अपने बरदाने ले आएं और उन्हें प्रति बोरा 10 रु. मिलेगा. मगर किसानों को ये बोरे 20 से लेकर 25 रु. तक पड़ रहे हैं.

खाद्य नागरिक आपूर्ति राज्‍यमंत्री पारस जैन ने इंडिया टुडे को बताया, ''अभी फैसला नहीं किया गया है. न ही मुझे राजगढ़ कलेक्टर के किसी आदेश की जानकारी है.'' वहीं राजगढ़ कलेक्टर ओझा कहते हैं, ''हम बिचौलियों, दलालों को गेंहूं खरीद से दूर रखना चाहते हैं और जो किसान 50,000 रु. से अधिक का गेंहूं बेच रहे हैं, वे गरीब कैसे हो सकते हैं?''

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