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यादों के गलियारे: सच और सपना

आज के गति-शील समय में साहित्य के स्वरूप एवं शिल्प को गढ़ने में पत्रकारिता महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है इसलिए रोजमर्रा की घटनाओं के ताजातरीन अनुभव और उनसे ऊर्जा एवं प्रेरणा ग्रहण करता लेखकीय समाज घटनाओं की प्रगतिशीलता एवं प्रयोगशीलता के नए-नए गलियारे तलाशता-सा लगता है.

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संस्मरण   

यादों के गलियारे
नासिरा शर्मा
साहित्य भारती, कृष्णा नगर,
दिल्ली-51
कीमतः 300 रु. 

आज के गति-शील समय में साहित्य के स्वरूप एवं शिल्प को गढ़ने में पत्रकारिता महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है इसलिए रोजमर्रा की घटनाओं के ताजातरीन अनुभव और उनसे ऊर्जा एवं प्रेरणा ग्रहण करता लेखकीय समाज घटनाओं की प्रगतिशीलता एवं प्रयोगशीलता के नए-नए गलियारे तलाशता-सा लगता है.

नासिरा शर्मा की पुस्तक 'यादों के गलियारे' भी संस्मरण, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज एवं स्वतंत्र लेख इत्यादि के माध्यम से की गई ऐसी ही एक सार्थक तलाश है. आरंभ में जो संस्मरण पुस्तक में संकलित हैं उनसे ज्ञात होता है कि एक तरह का 'नॉस्टेल्जिया' लेखिका पर हावी है.

प्रकृति उनकी इस अभिन्न जीवन यात्रा का अनुपम अंग है जिससे वह निरंतर ऊर्जा एवं प्राणवायु प्राप्त करती हुई आगे की ओर प्रस्थान करती दीखती है. इसलिए उनके ये संस्मरण, यात्रा-संस्मण, लेख पढ़ते हुए एक फिल्म से गुजरने का-सा अनुभव होता है जिसमें आरंभ से लेकर अंत तक गतिशीलता का साम्राज्‍य है. यही गतिशीलता इस संकलन को पठनीय एवं रोचक बनाती है.
झांसी के बूढ़े किले, बेतवा के हरियाले जीवन एवं लखनऊ के बाराबंकी में पारिजात के विविधवर्णी सौंदर्य, ताजमहल के जादुई 'स्न से सराबोर हो आप कब इस प्रवाह का हिस्सा हो गए, यह आपको भी पता नहीं चलता.

बात चाहे प्रशासन एवं पुलिस द्वारा वोट एवं पैसों के लालच में लोगों को अवैध रूप से बसाने और काम निकल जाने के उपरांत संवेदनहीन तरीके से एक झ्टके में उजाड़ देने की हो अथवा चिकन का काम करने वाले कारीगरों के शोषण की या फिर ऐक्टिंग की तलब की वजह से खुद लेखिका के बेसिर-पैर के सवालों से दो-चार होने की खीझ, कुछ भी नहीं जो प्रतिरोध रच सके.

चूंकि खुद भी गाहे-ब-गाहे उसी व्यवस्था की होने की सहज स्वीकारोक्ति बनी हुई है इसलिए बीच-बीच में इस पर छिटपुट टीका-टिप्पणी करना ही लेखिका को उचित लगता है. मिजो समाज में औरतों के साथ होने वाली बदसलूकी एवं नाइंसाफी के प्रति लेखिका की गहरी सहानुभूति व्यक्त हुई है.

इसी तरह जेएनयू कैंपस में अध्यापकीय परिसर का हिस्सा होने के नाते लेखिका वहां के बिगड़ते माहौल एवं दूषित होते वातावरण का साक्ष्य रखती हैं तो खुद को उसका एक हिस्सा होने के लिए भाग्यवान भी मानती हैं और वहां विचार स्वतंत्रता की तारीफ भी करती हैं.

पुस्तक के अंतिम हिस्से में लेखिका के स्वतंत्र लेख हैं जिनमें 'भारत की अखंडता एवं राष्ट्रभाषा' नामक अपने पहले लेख में लेखिका की चिंता राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को उसका हक दिलवाने की है जो आम राष्ट्रवादी सोच से हट कर है.

साथ ही भाषा को धर्म, जाति आदि से अलग करके देखने का आग्रह भी है. इसी से जुड़ा मसला भाषा को शुद्ध बनाने और उसे अन्य भाषाओं के दखल से वर्जित करने का भी है. इसलिए वे समस्या का नितांत व्यावहारिक पहलू हमारे सम्मुख रखती हैं.

'प्रवासी भारतीयों की विडंबना' शीर्षक लेख में विदेश में बसे भारतीयों के अपने समाज एवं संस्कृति से दूर रहने की समस्याएं एवं डर हैं तो दूसरी संस्कृतियों से आदान-प्रदान के नए-नए अवसर भी हैं. इन दोनों ही पहलुओं पर लेखिका ने अपने विचार रखे हैं.

'बच्चों की दुनिया में बड़ों का दखल' लेख आधुनिकीकरण के कारण बच्चों की दुनिया पर पड़ रहे प्रभाव की विश्लेषणात्मक व्याख्या ही नहीं करता वरन्‌ परंपरागत एवं लोक-साहित्य (दादी-नानी की कहानियां, किस्सा तोता-मैना) आदि की जरूरत को भी रेखांकित करता है. साथ ही बाल साहित्य में प्रकाशकों की कम दिलचस्पी से लेखिका ह्नुब्ध हैं. पुस्तक के अंतिम भाग में संकलित एक अन्य लेख 'मैं नाटक लिखना चाहती हूं' में लेखिका अपने जीवन का एक स्वप्न पाठक के साथ साझा करती हैं.

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