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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का दागियों पर दांव

उत्तर प्रदेश में जिताऊ प्रत्याशी के चक्कर में बाकी पार्टियों की तरह कांग्रेस ने उतारे दबंग और हिस्ट्रीशीटर उम्मीदवार. लेकिन प्रदेश अध्‍यक्ष रीता बहुगुणा जोशी का कहना है कि किसी भी दागी प्रत्याशी को टिकट दिए जाने के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है.

हमीरपुर में चुनावी चौपाल में राहुल गांधी और रीता बहुगुणा-जोशी के साथ केशव बाबू शिवहरे हमीरपुर में चुनावी चौपाल में राहुल गांधी और रीता बहुगुणा-जोशी के साथ केशव बाबू शिवहरे

उत्तर प्रदेश विधानसभा का आगामी समर जीतने के लिए कांग्रेस पार्टी ने उस लक्ष्मण रेखा को लांघने में गुरेज नहीं किया है, जिसके लिए अब तक वह अपने प्रतिद्वंद्वी दलों को दोषी ठहराती रही है.

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी तकरीबन अपनी हर जनसभा में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के भ्रष्टराज और समाजवादी पार्टी (सपा) के गुंडाराज को हमेशा के लिए बदल देने की हुंकार भरते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस की प्रत्याशी सूची में शामिल कर्ई नाम देखकर इस हुंकार की घिग्घी बंध जाए तो बड़ी बात नहीं है.

कांग्रेस की यूपी सूची में ऐसे कई लोगों के नाम शामिल हैं जिन पर हत्या, हत्या का प्रयास और मादक पदार्थों की तस्करी सहित दर्जनों मुकदमे लंबित हैं. इन दागी प्रत्याशियों में ज्यादातर वे नेता शामिल हैं जो दूसरी पार्टियां छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हैं और उनकी दबंगई में कांग्रेस को जीत की उम्मीद नजर आ रही है.

बसपा और सपा की रणनीति से कदमताल करती कांग्रेस की रणनीति का पता लगाने के लिए इंडिया टुडे ने प्रदेश के अलग-अलग इलाकों से कांग्रेस का टिकट पाने वाले कुछ दागी नेताओं की पहचान की.

कांग्रेस ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में पिंडरा (वाराणसी) से अजय राय और नानपारा (बहराइच) से दिलीप वर्मा जैसे दागी प्रत्याशियों को टिकट दिया है. बुंदेलखंड में हमीरपुर से केशव बाबू शिवहरे और महोबा से अरिमर्दन सिंह का नाम भी दागियों की सूची में शामिल है.

मध्य उत्तर प्रदेश में राम खिलावन पासी मोहान सुरक्षित (उन्नाव) और अरविंद गिरि गोला (लखीमपुर खीरी) जैसे प्रत्याशियों के नाम शामिल हैं.

जातिगत और राजनैतिक समीकरणों के चलते कांग्रेस के टिकट वितरकों को ये नाम काफी कारगर नजर आए, लेकिन इस पहल ने स्थानीय कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में खासा असंतोष भर दिया है.

राहुल गांधी की कई जन-सभाओं से पहले काले झंडे लेकर खड़े होने वाले असंतुष्टों में युवा कांग्रेसी सबसे आगे हैं. हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा-जोशी को लगता है कि असंतोष मामूली है और चुनाव से पहले असंतोष पूरी तरह खत्म हो जाएगा. उन्होंने किसी भी दागी व्यक्ति को टिकट दिए जाने की जानकारी होने से इनकार कर दिया.

नानपारा (बहराइच) से दिलीप वर्मा दागी उम्मीदवारों की फेहरिस्त में खासी पहचान रखते हैं. 1995 में बहराइच के थाना दरगाह शरीफ में दलित सिपाही शिवसहाय से मारपीट करने के आरोप में 27 मई, 2001 को अनुसूचित जाति-जनजाति न्यायालय ने दिलीप को पांच साल जेल की सजा सुनाई. वे हाइकोर्ट में अपील के बाद स्टे ऑर्डर मिलने पर ही जेल से बाहर आए. उन पर 2004 में थाना रामगांव में पुलिसकर्मियों से मारपीट का आरोप लगा, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की और मामला रफा-दफा कर दिया.

सपा के शासनकाल में ही 2005 में जिला पंचायत सदस्य रामभूलन वर्मा हत्याकांड में भी दिलीप का नाम आया लेकिन वे बरी हो गए.

राजनैतिक इतिहास पर नजर डालें तो वरिष्ठ कांग्रेस नेता और केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के करीबी दिलीप की राजनैतिक प्रतिबद्घताएं समय के साथ बदलती रही हैं. इसकी एक मिसाल यह है कि उनकी पत्नी माधुरी वर्मा अब भी बसपा की एमएलसी हैं.

दिलीप 1993 और 1996 में बहराइच के महसी विधानसभा क्षेत्र से सपा के विधायक रहे. बेनी प्रसाद वर्मा ने जब सपा से अलग होकर समाजवादी क्रांति दल बनाया तो वे उनके साथ हो लिए.

2008 में जब बेनी ने कांग्रेस का दामन थामा तो दिलीप बसपा में शामिल हो गए. लेकिन बसपा से टिकट नहीं मिला तो कांग्रेस में शामिल हो गए. आपराधिक रिकॉर्ड और राजनैतिक मौकापरस्ती के सवाल पर दिलीप बिफर गए और इस बारे में इंडिया टुडे से कोई भी बात करने से इनकार कर दिया.

पिंडरा (वाराणसी) से कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय मौजूदा विधानसभा में निर्दलीय विधायक हैं. तीन बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और एक बार निर्दलीय विधायक बन चुके राय 2009 में सपा के टिकट पर सांसद का चुनाव हार चुके हैं. दबंग छवि वाले राय पर जमीन पर जबरन कब्जे के कई मामले दर्ज हैं.

2007 के विधानसभा चुनाव में भरे पर्चे में राय ने अपने ऊपर हत्या के प्रयास के दो मुकदमे सहित कुल चार मुकदमे दर्ज होने की बात स्वीकार की थी. हत्या के प्रयास के मामलों पर राय ने कहा, ''ये मामले मेरे खिलाफ राजनैतिक साजिश के तहत लगाए गए. हालांकि ये मामले अब खत्म हो चुके हैं.''

नए मामलों के बारे में उनका कहना है, ''पुराने मामले खत्म होने के बाद मेरे ऊपर बसपा सरकार ने कई और मामले लाद दिए हैं. इसी उत्पीड़न के चलते हाल ही में मुझे दो बार तीन-तीन महीने के लिए जेल भी जाना पड़ा.''

कुछ महीने पहले वाराणसी की एक अदालत में अजय राय की पेशी के दौरान बम फटा था. वैसे इलाके की राजनीति में राय को मुख्तार अंसारी के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है. इसी प्रतिद्वंद्विता के चलते 1991 में उनके बड़े भाई अवधेश राय की हत्या हुई थी और उनकी जगह लेने के लिए अजय राय राजनीति के मैदान में कूदे थे. हालांकि राय ने फिलहाल किसी तरह की दुश्मनी से इनकार किया.

बुंदेलखंड के हमीरपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी केशवबाबू शिवहरे पर लगे आरोपों की फेहरिस्त भी लंबी है. 1983 से 2007 के बीच शिवहरे पर 22 मुकदमे दर्ज किए गए.

इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, आबकारी अधिनियम, अफीम अधिनियम, आर्म्स एक्ट और गैंगेस्टर एक्ट जैसे मुकदमे शामिल हैं. उनके घर से मॉर्फीन बरामद होने का मामला भी पुलिस ने दर्ज किया था. इसके अलावा उनके पास से अफीम और गांजा बरामद होने की रिपोर्ट भी दर्र्ज हो चुकी है.

अफीम वाले मामले में हमीरपुर पुलिस का कहना है कि मामला दर्ज हुआ था, लेकिन मामला किस अदालत में चल रहा है, इसका रिकॉर्ड पुलिस के पास नहीं है.

आपराधिक रिकॉर्ड के सवाल पर शिवहरे ने कहा, ''आप जिन मुकदमों का जिक्र कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर मुकदमों में मुझे क्लीन चिट मिल चुकी है. अदालत से पाक-साफ बरी होने के बावजूद विरोधी गड़े मुर्दे उखाड़ने में लगे हैं. मैं इन बातों पर पहले ही पार्टी को अपनी तरफ से स्पष्टीकरण दे चुका हूं.''

उनके अलावा उनके भाई और बेटे पर भी इसी तरह के मामले दर्ज होने के सवाल पर उन्होंने कहा, ''यह सब राजनैतिक साजिश है.

कोई नहीं चाहता कि वैश्य समाज का एक सामाजिक कार्यकर्ता राजनीति में आगे बढ़े. लेकिन जनता को सब पता है, इसीलिए मेरे परिवार के सदस्य जिला पंचायत और अन्य चुनाव जीतते रहे हैं.'' शिवहरे ने बताया कि तस्करी के आरोप बेबुनियाद हैं. वे स्टोन क्रशर और इससे जुड़े अन्य कारोबार में लगे हैं. इसके अलावा उनके पास खेती-बाड़ी है.

महोबा विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमा रहे दबंग छवि के अरिमर्दन सिंह इससे पहले जनता दल और सपा के टिकट पर दो बार विधायक रह चुके हैं. अरिमर्दन सिंह बीच में बसपा के भी करीब रहे. 1995 में महोबा को जिला बनवाने की मुहिम में अहम भूमिका निभाने वाले अरिमर्दन सिंह पर 20 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं. इनमें हत्या का भी एक मुकदमा शामिल है.

उन्होंने आपराधिक मुकदमों के सवाल पर कहा, ''इनमें से ज्यादातर मुकदमे अब खत्म हो चुके हैं. बाकी मुकदमों में भी मैं बरी हो जाऊंगा. वैसे भी ये सारे मुकदमे बहुत पुराने हैं और सियासी दुश्मनी की वजह से इन्हें लोग फिर से उखाड़ रहे हैं.''

उन्नाव जिले की मोहान सुरक्षित विधानसभा सीट से किस्मत आजमा रहे रामखिलावन पासी पर हत्या और हत्या के प्रयास के चार मुकदमों सहित कुल 10 मुकदमे दर्ज हैं. 1993 में पहली बार बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके पासी ने 2008 में कांग्रेस का दामन थामा.

आपराधिक अतीत के सवाल पर पासी ने कहा, ''मैं दलित गरीब परिवार से हूं. 17 साल की उम्र में मैंने गरीबों की मान-मर्यादा से खिलवाड़ करने वाले सामंतों के खिलाफ लड़ाई छेड़ी और ये लड़ाई आज तक जारी है. ये सारे मुकदमे उसी लड़ाई का फल हैं.'' क्या जनता भी इस बात को मानेगी, इस सवाल पर पासी ने कहा, ''मैं 15 साल तक लगातार प्रधान रहा. उसके बाद मेरे परिजनों को लोग वोट देते रहे. मेरा सिर्फ यही कहना है कि जो भी दलितों की लड़ाई लड़ता है उसे बदनाम किया जाता है.''

लखीमपुर खीरी जिले की गोला सीट से कांग्रेस प्रत्याशी अरविंद गिरि पर 1975 से 2009 के बीच 24 मामले दर्ज हुए. इसमें तीन मामले हत्या और हत्या के प्रयास के हैं.

गिरि ने हत्या से जुड़े मुकदमे के सवाल पर कहा, ''ये सब बचपन के मुकदमे हैं और अब तो खत्म भी हो चुके हैं. बाकी मुकदमे राजनैतिक हैं. रेल रोको, धरना प्रदर्शन और जनता की लड़ाई लड़ने के दौरान दर्ज किए गए मुकदमे.'' उन्होंने बताया, ''इसी साल मैं पांच मुकदमों में बरी हुआ हूं और फिलहाल मेरे खिलाफ सात मुकदमे लंबित हैं.''

प्रत्याशियों पर लगे संगीन आरोप और उन आरोपों से पार्टी और प्रत्याशियों का मुंह फेरना, कहीं इस बात का इशारा तो नहीं कर रहा कि कांग्रेस ने भी मान लिया है कि पांच कालिदास मार्ग पर आसन जमाने के लिए दबंग नेताओं के सामने शीर्षासन करना ही पड़ेगा. अगर वाकई ऐसा है तो राहुल गांधी किस आधार पर लोगों को यकीन दिलाएंगे कि कांग्रेस बाकी दलों से अलग है और विकास की राजनीति करती है.
-साथ में आशीष मिश्र लखनऊ से और राहुल यादव वाराणसी से

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