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केरलः थोड़ा-सा हरा हो जाए

मल्लापुरम में मुस्लिम लीग का बोलबाला, इसी पर टिकी कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ की उम्मीदें. इधर, मार्क्सवादियों ने औरतों के दस्ते बनाए हैं, जो घर-घर जाकर उनके लिए वोट मांग रहे हैं.

मल्लापुरम केरल का सबसे ज्यादा आबादी वाला जिला है. पिछले चुनाव नतीजों पर गौर करें तो यही जिला तय करता है कि सूबे में किसकी हुकूमत होगी. पर इस बार इस मुसलमान बहुल जिले (जहां कुल आबादी का 70 फीसदी मुसलमान हैं) में सरगर्म चुनाव प्रचार का वैसा असर नहीं दिखाई दे रहा. मतदाता इस बात से कम ही फिक्रमंद हैं कि कौन जीतेगा. उन्हें ज्यादा फिक्र चिलचिलाती गर्मी और तेजी से सूखते कुओं की है. गर्मी यहां सामान्य से कहीं ज्यादा है और ऐसे में पीने के पानी की सप्लाई करने वाली टैंकर लॉबी का और जगह-जगह खुले मिल्क शेक स्टॉलों का धंधा चोखा चल रहा है.

अलबत्ता इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) जरा भी फिक्रमंद नहीं है. सुन्नी मुसलमानों की यह सियासी जमात पिछले 40 साल से कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की सहयोगी पार्टी है. जिले की 16 में से 12 सीटों पर इसके नुमाइंदे चुनाव लड़ रहे हैं. 2011 में आईयूएमएल ने सभी 12 सीटें जीती थीं. आइयूएमएल के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष पी.के. कुन्हालीकुट्टी कहते हैं, ''हम केरल की 24 सीटों पर लड़ रहे हैं. हम अपना 2011 का प्रदर्शन फिर दोहराएंगे.''

65 वर्षीय कुन्हालीकुट्टी को पार्टी का 'सियासी दिमाग' माना जाता है. वे वेंगारा से दूसरी बार खड़े हैं और उम्मन चांडी की सरकार में उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं. उनकी तकदीर पिछले दो दशक से आइयूएमएल की तकदीर से गहरे जुड़ी रही है. 'आइसक्रीम पार्लर' सेक्स स्कैंडल में उनका भी नाम आया था और 2005 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. तब घोटाले की पीड़ित एक महिला ने दावा किया था कि 1996 में मंत्री ने उसका यौन शोषण किया था. 2006 के विधानसभा चुनाव में वे कुट्टीपुरम से हार गए थे. तब लीग को भी अपनी सबसे अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा था. उसने 22 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसके केवल सात नुमाइंदे विधानसभा में पहुंच सके थे.

मगर अब एक दशक के बाद कुन्हालीकुट्टी पार्टी के एकमात्र नेता के तौर पर उभरे हैं, कम से कम ऐसे नेता के तौर पर जिसकी अहमियत है. वे कहते हैं कि अब वे ज्यादा बूढ़े और समझदार हो चुके हैं. वेंगारा में चुनाव प्रचार के दौरान कुन्हालीकुट्टी ने इंडिया टुडे से कहा, ''बेशक आपकी उम्र और तजुर्बे का आपके रवैयों पर कुछ न कुछ फर्क तो पड़ता ही है, मुझमें बेहतरी के लिए बदलाव आया है. अब मैं ज्यादा सुनने के बाद ही फैसले लेता हूं.'' यह उनका गृह निर्वाचन क्षेत्र है और यहां के लोग और मुद्दे उनकी उंगलियों की पोरों पर हैं.

2011 के विधानसभा चुनावों में कुन्हालीकुट्टी की अगुआई में पार्टी ने शानदार जीत पाई थी और मुसलमान वोट बैंक पर पकड़ भी मजबूत की थी. इससे उनकी सियासी हैसियत में इजाफा हुआ था. दिग्गज सियासतदां और मल्लापुरम में आइयूएमएल के पूर्व जिला सचिव एम.आइ. थंगल कहते हैं, ''असल में 2011 में एलडीएफ को सत्ता में लौटने से रोकने का सबसे ज्यादा श्रेय आइयूएमएल को ही गया था. अगर दूसरी सीटों पर मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट न दिए होते तो पार्टी बुरी तरह हारती.'' जिस सूबे की कुल 3.33 करोड़ आबादी में 26.6 फीसदी मुसलमान हैं, वहां यह न मानना नाइंसाफी होगी कि 2011 के कड़े मुकाबले में यूडीएफ की चैतरफा जीत में इस एकजुट वोट बैंक की बड़ी भूमिका थी.

थंगल के मुताबिक, केरल के मुसलमानों की फितरत कमोबेश धर्मनिरपेक्ष है. अपनी बात की तस्दीक के लिए वे आजादी के आंदोलन में मुसलमानों की बड़ी तादाद में भागीदारी का हवाला देते हैं. पांच साल पहले सियासत को अलविदा कह देने वाले और बिस्तर से जकड़े थंगल कहते हैं, ''मल्लापुरम की तमाम ऐतिहासिक निशानियां इस बात की गवाह हैं कि हमने किस तरह अंग्रेजों से लोहा लिया था और किस तरह आजादी की लड़ाई को सहारा दिया था. फिरकापरस्ती हमारी रवायत नहीं रही, हमारे जज्बात की गहरी जड़ें हिंदुस्तानी तहजीब में हैं.''

इन रवायतों को खासी तरजीह दी जाती है. वैसे वे बीते जमाने की चीज हैं. आइयूएमएल ने बीच का सियासी रास्ता चुना है और समुदाय के कई लोगों को कट्टरता के छोरों पर धकेल दिया है. पार्टी ने कभी आक्रामक सियासत का रास्ता नहीं अपनाया. यहां तक कि 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद भी उसने ऐसा नहीं किया. नतीजतन ज्यादा आक्रामक रुख वाले छोटे-छोटे अलहदा धड़े उभर आए.

1990 के दशक में अब्दुल नासर मदनी और उनकी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) उनमें सबसे अव्वल थी. मगर उसके बाद से वे दरकिनार होते गए (1998 के कोयंबटूर और 2008 के बेंगलूरू बम धमाकों में तमाम किस्म के आरोप लगने के बाद वे फिलहाल बेंगलूरू जेल में हैं). हाल के वर्षों में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया सरीखे धड़े उभरे हैं पर उन्हें ज्यादा लोगों में मकबूलियत अभी हासिल करनी है.

जाने-माने इतिहासकार डॉ. के.वी. कुन्हीकृष्णन कहते हैं, ''मोटे तौर पर केरल के मुसलमान राष्ट्रीय फलक पर बीजेपी के उभार को लेकर ज्यादा फिक्रमंद हैं. उन्हें लगता है कि कांग्रेस महज तमाशबीन का किरदार अदा कर रही है और उनके हितों को महफूज नहीं रख पा रही है. यह बात ज्यादा लंबे दौर में आइयूएमएल को सियासी तौर पर नुक्सान पहुंचा सकती है.''

उधर सीपीएम जिले में एक नए सियासी औजार को आजमा रही है. गिनती के लिहाज से वाम मोर्चे के मजबूत गढ़ दो निर्वाचन क्षेत्रों पोन्नै और थवानूर तक सिमट गए हैं. पर मल्लापुरम जिले में वाम मोर्चे के चुनाव अभियान की देखरेख कर रहे और सीपीएम की सेंट्रल कमेटी के सदस्य ए. विजयराघवन कहते हैं, ''वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के पास आइयूएमएल को उसके गढ़ों में हराने का मुकम्मल नक्शा है. हम 2014 के आम चुनावों से ही इस रणनीति पर काम कर रहे हैं.'' पार्टी ने कुछ असरदार स्थानीय कारोबारियों और पूर्व कांग्रेस नेताओं को एलडीएफ के उम्मीदवारों के तौर पर उतारा है.
अलबत्ता वाम मोर्चा ज्यादा सेंध नहीं लगा सका है. इसकी वजह यह है कि आइयूएमएल को सुन्नी मुसलमानों की तरफदारी हासिल है जिनकी अगुआई ई.के. अबूबकर मुसलियार के हाथ में है. सूबे के 12,000 में से 8,500 मदरसों पर उनका कब्जा है. इसके अलावा 2,000 मदरसे सुन्नियों के एपी धड़े (कांथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार की अगुआई वाले) के कब्जे में हैं, जिसने कुछेक बार वाम मोर्चे की तरफदारी की है. बाकी मदरसों पर मुजाहिदीन और जमात के धड़ों का कब्जा है. मदरसों पर कब्जे को लेकर एपी और ईके धड़ों में टकराव होता रहता है और कांथापुरम ने खुलेआम आइयूएमएल के कुछ उम्मीदवारों की मुखालफत की है.

मगर आइयूएमएल नेताओं को रत्ती भर फिक्र नहीं है कि 'हंसिया सुन्नी' (वाम मोर्चे के साथ एपी धड़े के गठबंधन को लेकर) क्या कारस्तानी करने वाले हैं. नीलांबुर में आइयूएमएल की महिला शाखा की नेता जेलसीमिया हुसैन कहती हैं, ''यह हमारे लिए परेशानी की बात नहीं है. हम केरल में बीजेपी के उभार को लेकर ज्यादा फिक्रमंद हैं. बीजेपी तुच्छ मुद्दों को लेकर लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है. अब वे हमें बता रहे हैं कि हम क्या खाएं, क्या पहनें और अपने राष्ट्रीय झंडे को सलामी कैसे दें?''

सीपीएम के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री पलोली मोहम्मद कुट्टी कहते हैं कि आइयूएमएल के किले में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा. वे कहते हैं, ''जिले में वाम मोर्चे के हक में अंदर ही अंदर एक हवा जरूर है. सत्ता विरोधी रुझान तो है ही, इसके अलावा मुसलमान युवा खाड़ी के देशों की आर्थिक सुस्ती को लेकर भी परेशान हैं. वे कहीं ज्यादा हकीकत से जुड़े हैं. उनकी अपनी अलहदा सियासत है, वे मदरसों या आइयूएमएल की अगुआई करने वाले पनकड़ खानदान की सियायत के मुताबिक नहीं चलते.''

मार्क्सवादियों ने औरतों के दस्ते बनाए हैं, जो घर-घर जाकर उनके लिए वोट मांग रहे हैं. उन्होंने खास तौर पर ऐसे परिवारों और नौजवानों को निशाना बनाया है जो आइयूएमएल के भीतर सत्ता की उठापटक से आजिज आ चुके हैं. उनकी दलील है कि मुसलमान वोट बैंक में से थोड़ा-बहुत भी उनको मिल जाता है, तो इससे उन्हें इतनी सीटें जरूर मिल जानी चाहिए जिससे विधानसभा में वे आरामदायक हालत में होंगे.

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