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किताबें/उपन्‍यास: क्योंकर ये जिंदगी ऐसी ही हुई

एक लंबा सफर तय करना था हमें. साल का सबसे खराब मौसम इस सफर के लिए और सफर भी इत्ता लंबा.'' जर्नी ऑफ मेजाए में टी.एस. इलियट की लिखी इन पंक्तियों से रोहिंटन मिस्त्री के इत्ता लंबा सफर की शुरुआत होती है, जो, '70 के दशक में मुंबई शहर (तब बॉम्बे) के आसपास तय होता है.

इत्ता लंबा सफ़र

रोहिंटन मिस्त्री

पेंगुइन बुक्स, पंचशील पार्क,

नई दिल्ली-17,

कीमतः 250 रु.

एक लंबा सफर तय करना था हमें. साल का सबसे खराब मौसम इस सफर के लिए और सफर भी इत्ता लंबा.'' जर्नी ऑफ मेजाए में टी.एस. इलियट की लिखी इन पंक्तियों से रोहिंटन मिस्त्री के इत्ता लंबा सफर की शुरुआत होती है, जो, '70 के दशक में मुंबई शहर (तब बॉम्बे) के आसपास तय होता है. पृष्ठभूमि में भारत-पाकिस्तान युद्घ, स्वतंत्र बांग्लादेश का निर्माण और वह तमाम सियासी उथल-पुथल है, जो धीरे-धीरे जिंदगियों में काले अंधेरों की तरह घुल रही है.

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बैंक का मामूली क्लर्क गुस्ताद नोबेल भले ही यह गाता हो कि यू विल नेवर ग्रो ओल्ड व्हाइल देअर इज लव इन योर हार्ट, लेकिन वह हर दिन बूढ़ा होता जाता है. उसकी आंखों के सामने एक भरी-पूरी दुनिया हर रोज उजड़ती है. पिता की किताबों की दुकान बंद हो जाती है. (मानो किताबों की दुकानें तो बंद होने के लिए ही हैं. खुद मेरे देखते-देखते पिछले दो दशकों में कितनी किताबों की दुकानें बंद हो गईं.)

घर का एक-एक कीमती सामान बिक जाता है. बेटे के रूप में एक उम्मीद बाकी है, लेकिन वह आखिरी उम्मीद भी बिखर जाती है, जब आइआइटी की परीक्षा पास करने के बावजूद वह इंजीनियरिंग में जाने से इनकार कर देता है. बेटी की तबीयत लगातार गिरती  जा रही है, जीवन के संघर्षों में पति-पत्नी का प्रेम भी अनवरत बहस और संघर्ष में बदल चुका है. घर के भीतर और बाहर लगातार एक गुस्सैल चिड़चिड़ापन फड़फड़ाता रहता है.

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

ऐसे में गुस्ताद के पास एक ही विकल्प है कि वह पुरानी स्मृतियों में लौट जाए. बीते दिनों को याद करे, जब सुबह की धूप के साथ खुशियां और उम्मीद घर की खिड़की से आया करती थी. और ऐसे में एक दिन गुस्ताद को एक पुराने दोस्त मेजर बिलमोरिया का एक लिफाफा मिलता है और उस लिफाफे के साथ शुरू होता है गुस्ताद का लंबा सफर. इस सफर में वह अपने अतीत की तलाश करता है और शहर की भी. मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया मिस्त्री का यह नॉवेल सच ए लांग जर्नी, जिसका मोनिका जोशी ने इत्ता लंबा सफर नाम से हिंदी में अनुवाद किया है, गुस्ताद, मुंबई शहर, बड़ी राजनैतिक परिघटनाओं और उसके व्यापक असर की कहानी है.

यहां सियासत का गंदा चेहरा है, ताकत की लड़ाई है, कुछ लोगों के स्वार्थ के लिए दांव पर लगाया जाता बहुसंख्यकों का हित है. जीवन की हर विडंबना है और एक अकेला उदास बूढ़ा, जिंदगी को तब तलाशने की कोशिश करता, जब जिंदगी गुजर गई. मानो उन गुजरे प्लेटफॉर्म के नक्शे याद करता, उन्हें फिर से देखने की तमन्ना करता, जिनसे गाड़ी को गुजरे जाने कितने बरस बीते.

23 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

16 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

रोहिंटन मिस्त्री के यहां दो चीजें बड़ी गहराई से गुंथी मिलती हैं-नॉस्टेल्जिया का अवसाद और सियासी हलचलों के बीच बिगड़ता-उलझ्ता वर्गीय यथार्थ. अवसाद तो इस कदर है कि दरवाजे, आलमारी, मेज और घर की हर चीज गहरी उदासी में डूबी जान पड़ती हैं. सब हैं, फिर भी सब अकेले हैं. एक साधारण पारसी मध्यवर्गीय आदमी के जीवन का उत्तरार्ध बहुत भरोसेमंद उदासी के साथ व्यक्त होता है. मुंबई के बहुत-से पुराने रईस पारसी परिवार आज अजीब गुमनामी और अवसाद में डूबे नजर आते हैं.

यह अवसाद इतना गहरा है कि उनकी बिल्डिंग, लिफ्ट और दरवाजे की घंटी तक में महसूस होता है. हर चीज गुजरे अतीत की भव्यता पर शोक मनाती जान पड़ती है. पुरानी रौनक अब याद है. शहर बदरंग, उदास रोशनियों का शहर हुआ जाता है. इसे पढ़ते हुए  हम यकीन करते हैं, यकीन करते हुए उस उदासी को महसूस करते और जीने लगते हैं. दूर कहीं सीमा पर युद्घ छिड़ा है, लेकिन उसका असर रिसते-रिसते दूरदराज के शहरों और उन लोगों की जिंदगियों तक पसरता जाता है, जिनका भारत-पाकिस्तान की लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है. जिनका कोई सियासी पक्ष भी नहीं है. वे युद्घ की विभीषिकाओं को झेलने के लिए सिर्फ इसलिए अभिशप्त हैं क्योंकि वे इंसान होने को अभिशप्त हैं.

9 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

2 नवंबर 201: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यह उपन्यास कभी मुंबई के सेंट जेविर्यस कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के पाठ्यक्रम में हुआ करता था, लेकिन बाल ठाकरे के पोते ने इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी. उसका मानना था कि इसमें बाल ठाकरे और मराठियों के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं. बेशक वह किसी कैरेक्टर की सोच, उसके विचार भर थे, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने भी शिवसैनिकों से पंगा लेना ठीक नहीं समझ और किताब प्रतिबंधित हो गई.

इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत मिस्त्री की किस्सागोई है. वह सरल भी है और घुमावदार भी. उसमें टैगोर जैसी सिधाई है, टॉमस मान के डेथ इन वेनिस जैसा अकेलापन और मार्खेज सी उदासी, जैसी नो वन राइट्स टू द कर्नल को पढ़ते हुए महसूस होती है. एक सीधी रेखा में चलते हुए  वह इत्ता लंबा सफर तय करती है. गुस्ताद, दिलनवाज, सोहराब, डेरियस, मैल्कम और मिसेज कटपिटिया, सभी चरित्रों को बेहद बारीकी से बुना गया है. जैसे कुछ साल पहले होमी अदजानिया की फिल्म बीइंग सायरस के चरित्रों ने चौंकाया था क्योंकि वे बहुत सच्चे जान पड़ते थे, वैसे ही इस उपन्यास का हर चरित्र अपने आसपास देखा-जाना हुआ सा लगता है.

19 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
12 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
 
5 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

मिस्त्री एक शहर को जिस उदासी, लेकिन उम्मीद के साथ देखते हैं, उसे पढ़ते हुए ओरहान पामुक का इस्तांबुलः मेमोरीज ऐंड द सिटी याद आता है. रोशनियों के इस शहर में उनकी निगाह गंदी, संकरी, बदबूदार गलियों, पुराने अपार्टमेंट की गिरती चारदीवारियों, सड़ रही चालों तक जाती है. खूबसूरत समंदर कभी न खत्म होने वाली सीलन बनकर इन दीवारों में बसता है. यहां वह सुंदर नहीं रहता, फफूंद बन जाता है. रुके हुए प्लेटफॉर्म पर धीरे-धीरे गुजरती गाड़ी को देखने के एहसास जैसा है यह इत्ता लंबा सफर. देखना कि इस क्षण और इस जीवन के बाहर वक्त और जिंदगियों का फैलाव कितना विशाल है. जीवन ऐसा ही है. सफर भी ऐसा ही हुआ करता है. 

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