scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

लेखक की मर्मस्पर्शी स्मृतियां

मार्कण्डेय की स्मृतियों को ताजा करता कथा का यह अंक कई मायनों में महत्वपूर्ण है. इस संस्मरण अंक को एक मिशन बनाकर प्रकाशित किया है मार्कण्डेय की बेटियों डॉ. स्वस्ति सिंह और सस्या ने.

X

संस्मरण&

कथा
मार्कण्डेय स्मृति अंक;
संपा.: सस्या;
कथा प्रकाशन,
थॉर्नहिल रोड, इलाहाबाद, उ.प्र.,
कीमतः 100 रु.

मार्कण्डेय की स्मृतियों को ताजा करता कथा का यह अंक कई मायनों में महत्वपूर्ण है. इस संस्मरण अंक को एक मिशन बनाकर प्रकाशित किया है मार्कण्डेय की बेटियों डॉ. स्वस्ति सिंह और सस्या ने.

यह अंक इस अर्थ में भी उल्लेखनीय है कि इसमें साहित्यकारों ने अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा को अलग रखते हुए मार्कण्डेय को श्रद्धांजलि दी है और उनके साथ बीते अपने अंतरंग प्रसंगों को याद किया है.
जहां नामवर सिंह का गला मार्कण्डेय के अवधी गीतों को याद करके भरा जा रहा होता है, वहीं अमरकांत अपने संस्मरण में यह कहकर पाठकों की आंखें नम कर देते हैं कि ''कान अब हमेशा हिरनिया के बोल को तरसेंगे.''

राजेंद्र यादव अपने संस्मरण में उन दिनों को याद करते हैं जब दुष्यंत आधी रात को मार्कण्डेय की छाती पर बैठ कर पूछ रहे थे कि ''बता साले, यह चक्रधर कौन है.''

हिंदी साहित्य मार्कण्डेय के उस आलोचकीय अवदान को कैसे भूल सकता है जब वे 'चक्रधर' नाम से कल्पना में लेख लिखा करते थे! कहते हैं कि चक्रधर नाम से लिखे अपने लेखों में मार्कण्डेय न केवल अपने समकालीन लेखकों की कठोर मीमांसा करते थे बल्कि वे स्वयं अपनी रचनाओं की भी बड़ी निर्ममता से पड़ताल करते थे.

अपने संस्मरण में जहां एक ओर शेखर जोशी ने मार्कण्डेय के पूरे जीवन को खंगाल डाला है, वहीं ममता कालिया अपने संस्मरण में इस बात पर खासा बल देती हैं कि ''मार्कण्डेय ने वामपंथ का दामन कभी नहीं छोड़ा.'' रवींद्र कालिया ने बड़े ही मार्मिक अंदाज में मार्कण्डेय के व्यक्तित्व के उस अनकहे पक्ष को याद करते हुए लिखा है कि 'एक से एक साधनहीन लोग थे मगर उनमें स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था. मार्कण्डेय इस बिरादरी का नेतृत्व करते थे. नई कहानी में मार्कण्डेय अकेला स्वर थे.''

इसके साथ-साथ संस्मरणों में कमला प्रसाद, विजय बहादुर सिंह, अरुण कमल, भगवान सिंह, सरला माहेश्वरी, रमेशकुंतल मेघ, नीलाभ आदि कई नाम सम्मिलित हैं.

इस अंक की संपादक और मार्कण्डेय की छोटी बेटी सस्या जहां अपने संपादकीय में कहती हैं कि ''पापा अपने पीछे जो बीज छोड़ गए हैं, वे हमारी अमूल्य धरोहर हैं'', तो वहीं उनकी बड़ी बेटी डॉ. स्वस्ति सिंह ने लिखा है कि ''कथा का प्रकाशन जारी रखना उनकी स्मृतियों को सहेज कर रखने जैसा है.'' मार्कण्डेय की भतीजी सारिका सिंह ने भी उनके साथ बिताए अंतिम दिनों को मर्मस्पर्शी ढंग से याद किया है.

पत्रिका के दूसरे अंश में उनके जीवित रहते उन पर लिखे गए कुछ संस्मरण सम्मिलित हैं जिनमें अमरकांत, कमलेश्वर, रवींद्र कालिया और बच्चन सिंह आदि के संस्मरण हैं. पत्रिका के अन्य अंश भी इस अर्थ में अति महत्व के हैं कि इसमें मार्कण्डेय की कुछ अप्रकाशित कविताएं जैसे कि 'पेड़ पर घर', 'हल्ला उठाओ', 'मशालें जलाते हैं, 'कवि-सभा' आदि संकलित तो हैं ही, उनके द्वारा तत्कालीन समय के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों के साथ किए गए उनके पत्राचार को भी संकलित किया गया है.

पत्रों को देखकर सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मार्कण्डेय के व्यक्तिगत और सामाजिक-संबंधों का दायरा कितना विस्तृत था.

इस अंक में वैचारिकी शीर्षक के अंतर्गत मार्कण्डेय के वैचारिक लेख एवं उनके कुछ चुनिंदा संपादकीय रखे गए हैं जो युवा लेखकों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं, संपादकों और आलोचकों के लिए भी लाभप्रद हो सकते हैं. कई ऐसे बड़े नाम हैं जिन्होंने 'मूल्यांकन' शीर्षक के अंतर्गत मार्कण्डेय की रचनाओं पर गंभीरता से विचार किया है. एक और विशेषता जो इस अंक को संग्रहणीय बनाती है वह है इसमें संग्रहीत मार्कण्डेय के साक्षात्कार और उनकी दुर्लभ तस्वीरें.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें