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बिहार में लद गए चीनी मिल के दिन

सरकार के लचर रवैए और इथेनॉल पर शर्त से बुरी हालत में चीनी मिलें.

सारण जिले में बंद पड़ी चीनी मिल सारण जिले में बंद पड़ी चीनी मिल

जब चैनपुरा के बलिराम सिंह को वारिसलीगंज, जिला नवादा चीनी मिल चालू होने की उम्मीद जगी तो उन्होंने दो बीघा जमीन में गन्ना लगा दिया. अब गन्ना तैयार है पर चीनी मिल खुलने के आसार नहीं दिख रहे.

4 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

बलिराम कहते हैं, ''मिल जब चालू थी तब आर्थिक तंगी गन्ने की उपज से दूर हो जाती थी.'' अब आलम यह है कि उन्हें बहन की डोली उठाने का सपना पौने दो बीघा जमीन बेचकर पूरा करना पड़ा.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

बिहार में चीनी मिलों की इस दुर्दशा पर बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ओ.पी. साह कहते हैं, ''लीज पर दी जाने वाली बंद चीनी मिलों का मूल्यांकन ज्‍यादा कर दिया गया है. बंद मिलों की जमीन को छोड़कर मशीन और भवन उपयोगी नहीं रह गए हैं. निवेशकों को बैंकों का भी पूरा सहयोग नहीं मिल पा रहा. चीनी मिलों की कमांड एरिया की भौगोलिक संरचना भी बदल गई है.''

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यह किस्सा अकेले बलिराम का नहीं है. बिहार में सैकड़ों ऐसे कृषक परिवार, मजदूर और मिल कर्मचारी हैं, जो चीनी मिलें बंद होने से निराश हैं. ऐसी ही निराशा राज्‍य सरकार में भी है.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

राज्‍य सरकार ने वारिसलीगंज के अलावा बनमनखी, हथुआ (डिस्टीलरी सहित), गुरारू, गोरौल, सिवान, समस्तीपुर और लोहट चीनी मिल को दीर्घकालिक लीज पर चलाने के लिए निजी निवेशकों से टेंडर मंगाए थे. पिछले साल दिसंबर में टेंडर भरने के आखिरी दिन तक तीन चीनी मिलों के लिए छह आवेदन ही मिले हैं.

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यह चौथा मौका है, जब चीनी मिलों को लेकर निवेशकों ने कम दिलचस्पी दिखाई है. राज्‍य सरकार 2006 से ही सार्वजनिक क्षेत्र की बंद 15 चीनी मिलों को चालू करने, उसकी क्षमता विस्तार करने और नई चीनी मिलों की स्थापना का प्रयास करती रही है.

एक समय था जब देश के चीनी उत्पादन का 40 फीसदी बिहार से आता था, अब यह मुश्किल से 4 फीसदी रह गया है. आजादी से पहले 33 चीनी मिलें थीं, अब 28 रह गई हैं. इसमें से 10 निजी प्रबंधन में चल रही हैं. जिनमें बगहा और मोतिहारी की स्थिति ठीक नहीं है.

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

बाकी की 18 चीनी मिलों में तीन भारत सरकार के उपक्रम बीआइसी ग्रुप की हैं, जो बंद हैं. बिहार राज्‍य चीनी निगम लिमिटेड के अधीन 15 मिलें भी घाटे के कारण 1996-97 तक बंद रहीं. इकाइयों के पास किसानों का 8.84 करोड़ रु. और कर्मचारियों का 300 करोड़ रु. बकाया है.

मुश्किल यह कि निवेशकों की रुचि इथेनॉल बनाने में है जबकि राज्‍य सरकार को यह अधिकार नहीं है. ऐसे में बंद चीनी मिलों को चालू करा पाना बड़ी चुनौती है.

28 दिसंबर, 2007 से पहले गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने की मंजूरी थी. दिसंबर, 2007 को गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1996 में संशोधन किया गया, जिसके तहत सिर्फ चीनी मिलें ही इथेनॉल बना सकती हैं. मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं.

ईस्टर्न बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष मुकुटधारी अग्रवाल कहते हैं, ''2007 से पहले गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की छूट थी. लेकिन उस समय बिहार में चीनी मिलों के लिए प्रयास तेज नहीं हो सका. जब प्रयास तेज हुआ तब अलग से इथेनॉल यूनिट की स्थापना का प्रावधान देश भर में बंद कर दिया गया. इसका सीधा असर बिहार पर पड़ा है.''

बिहार के गन्ना उद्योग और लघु जल संसाधन मंत्री अवधेश प्रसाद कुशवाहा ने बताया, ''राज्‍य सरकार पहले पांच साल के कार्यकाल में निवेशकों का भरोसा जीतने का प्रयास करती रही. अब जब निवेशकों की रुचि जगी है, तब केंद्र ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की मांग को खारिज कर राज्‍य में बड़े निवेश को प्रभावित कर दिया है.''

हाल में एचपीसीएल बायोफ्यूल्स लिमिटेड ने सुगौली और लौरिया चीनी मिलों को चालू किया है. यहां डिस्टीलरी/इथेनॉल इकाई और 20-20 मेगावाट क्षमता का बिजली उत्पादन भी शुरू हुआ है. इतनी ही क्षमता की मोतीपुर चीनी मिल इंडियन पोटाश निगम को हस्तांतरित की गई है.

तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड रैयाम में गन्ना आधारित उद्योग और सकरी में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की प्रक्रिया जारी है. बिहटा चीनी मिल को पीएलआइ लिमिटेड को लॉजिस्टिक और इंडस्ट्रियल पार्क के लिए ली.ज पर देने का फैसला किया गया है.

हालांकि कुशवाहा दावा करते हैं कि अगले तीन साल में बिहार अपनी खपत के आठ लाख मीट्रिक टन चीनी उत्पादन के लक्ष्य को पूरा कर लेगा. 2005 के पहले दो लाख टन उत्पादन होता था लेकिन इसे अब चार लाख टन कर लिया गया है. बेशक सरकार बड़े दावे कर रही है. लेकिन इथेनॉल से जुड़ी शर्त और सरकार के कमजोर हौसले चीनों मिलों के लिए कोई खास उम्मीद नहीं बंधाते.

क्यों दूर भाग रहे निवेशक
1.सीधे तौर पर इथेनॉल बनाने की अनुमति का नहीं मिलना.
2. पुराने चीनी मिलों का अत्यधिक मूल्य निर्धारण.
3. पुरानी मिलों की मशीनों के बेकार होने के कारण उपयोगी न रहना.
4. कई मिलों की भौगोलिक परिस्थितियां बदलने से नुक्सान.
5. बैंकों का निवेशकों के प्रति नकारात्मक रुख.

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