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कहानी संग्रह: बात से ज्‍यादा बतकही

एक साथ विभिन्न पीढ़ियों के रचनाकारों की सक्रिय उपस्थिति को आज के कहानी परिदृश्य की खासियत कहा जा सकता है. ये रचनाकार अपने-अपने तेवर को बचाए रखते हुए अनुभव और अभिव्यक्ति की बहुकेंद्रीयता की रचना कर रहे हैं.

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खाली किताब का जादू
कृष्ण बलदेव वैद
यात्रा/पेंगुइन बुक्स,
पंचशील पार्क,
नई दिल्ली-110017
कीमतः 175 रु.

वातावरण का कोलाजः कृष्ण बलदेव वैद

एक साथ विभिन्न पीढ़ियों के रचनाकारों की सक्रिय उपस्थिति को आज के कहानी परिदृश्य की खासियत कहा जा सकता है. ये रचनाकार अपने-अपने तेवर को बचाए रखते हुए अनुभव और अभिव्यक्ति की बहुकेंद्रीयता की रचना कर रहे हैं.

वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बलदेव वैद के नए कहानी संग्रह 'खाली किताब का जादू' को इसी बहुकेंद्रीय समय का दृष्टांत कहा जा सकता है. युवा कहानीकारों से बिल्कुल अलग लहजे में वैद की ये कहानियां तेजी से बीत-बदल रहे समय के साथ मुठभेड़ या संवाद करने की कोशिश से नहीं उपजी हैं बल्कि वक्त के उस ठहरे हुए वक्फे में खामोश चहलकदमी से आकार लेती हैं, जो लेखक का नितांत निजी है. इस लिहाज से संग्रह की कहानियों को कहानी से ज्‍यादा जीवन का वह निजी कोना कहा जाना चाहिए, जिसमें अन्य का प्रवेश वर्जित है.

पहली कहानी 'कुकी की मौत' इस निजी कोने का ही शब्द रूप है. साथ और साहचर्य की एक अनोखी कहानी. निजीपन के दायरे में रहते हुए भी खास तरीके से अपने समय और समाज से संवाद की कोशिश है इसमें. खासकर उस लेखकीय और सांस्कृतिक समाज से, जिसका वैद हिस्सा हैं. भोपाल के भारत भवन से लेकर दिल्ली तक के सांस्कृतिक जीवन की धूप-छांहों से गुजरने के कारण यह कहानी महत्वपूर्ण है. कहानी, संस्मरण, स्केच और आत्मकथन के सीमांतों पर खड़ी यह कहानी वैद के ट्रेडमार्क भाषायी विन्यास के साथ सामने आती है.

'खाली किताब का जादू', 'मैं अकेला', 'वेनिस में वैराग्य', 'अंधेरे में कुछ (अ)दृश्य', 'नीचे, और नीचे' आदि कहानियों में कहानी से ज्‍यादा वातावरण प्रधान है. वह भी कैसा? बेठोस. मानसिक किस्म का. 'अंधेरे में कुछ (अ)दृश्य' ऐसे ही कई वातावरणों का कोलाज है.

कहानी 'विफलदास का लकवा' लेखकीय लकवे की आशंका को केंद्र में रखकर लिखी गई है. इसमें एक लेखक का जीवन है और लेखक की रचना प्रक्रिया पर एक कथन भी. इन कहानियों से गुजरते हुए साफ लगता है कि आप कहानी से नहीं बल्कि मूड के विभिन्न शेड्स से गुजर रहे हैं. ये कहानियां आपको किसी खास मुकाम तक नहीं ले जातीं, किसी खास उद्देश्य का पीछा नहीं करतीं, बल्कि एक पूरे वातावरण और दृश्य के आपके सोच में दाखिल होने का रास्ता तैयार करती हैं. इस वातावरण का अर्थांतरण करने की कोशिश में आपके हाथ मायूसी लगती है क्योंकि जरूरी नहीं कि जो लिखा जा रहा हो, उसके पीछे अर्थ सृजित करने की पूर्व निश्चित प्रतिबद्धता हो.

इस संग्रह की कहानियों में वैद की भाषा की विशिष्टता साफ देखी जा सकती है. उनकी भाषा को हिंदुस्तानी तहजीब की भाषा कहा जा सकता है. जब भाषा को हिंदी से आगे ले जाकर हिंदुस्तानियत के सांचे में ढाला जाता है तब यह न केवल लिक्खे का व्यापक जनतंत्र रचती है बल्कि पाठक को भी इस जनतंत्र में शामिल होने का आमंत्रण देती है. वैद हिंदी और उर्दू जबानों का फर्क नहीं मानते, इसी वजह से उनकी कहानियों में दोनों जबानों के शब्द सहजता से आते हैं.

वैद साहब के अंदाजे-बयां की नफासत बार-बार आपको सम्मोहित करती है. यहां बात से ज्‍यादा बतकही है. खुद के साथ भी और पाठक के साथ भी. भाषा जैसे लेखक के हाथों से छूटकर फिसलती जाती है और अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम कर लेती है. अगर साहित्य सबसे पहले और सबसे अंत में सिर्फ भाषा है तो ये कहानियां इस भाषा के सहारे बनने वाली एक भरी-पूरी दुनिया हैं.

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