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सायना नेहवाल के पुराने गुरु दरकिनार

जब बैडमिंटन की 21 वर्षीया धुरंधर खिलाड़ी सायना नेहवाल ने इस साल फरवरी में भारतीय खेल प्राधिकरण को पत्र लिखकर इच्छा जाहिर की कि भास्कर बाबू को उनका पूर्णकालिक कोच बनाया जाए तो उनका इशारा साफ था.

जब बैडमिंटन की 21 वर्षीया धुरंधर खिलाड़ी सायना नेहवाल ने इस साल फरवरी में भारतीय खेल प्राधिकरण को पत्र लिखकर इच्छा जाहिर की कि भास्कर बाबू को उनका पूर्णकालिक कोच बनाया जाए तो उनका इशारा साफ था.

वे सख्त मुख्य राष्ट्रीय कोच पुलेला गोपीचंद (37 वर्ष) के साथ अब काम नहीं करना चाहतीं. पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन गोपीचंद, जो छह साल तक सायना के कोच रहने के बाद बिना कोई कारण पूछे इस काम से हट गए, कहते हैं, ''यह उनका फैसला था. उन्होंने एकदम साफ कर दिया है कि वे मेरे साथ काम नहीं करना चाहती हैं.''

अब कई लोग कहने लगे हैं कि वे सानिया मि.र्जा की राह पर जा रही हैं. सायना को अगस्त, 2010 में पेरिस में विश्व चैंपियनशिप और फिर नवंबर में गुवांग्झू में आयोजित एशियाई खेलों में करारा झ्टका लगा था. पिछले साल घुटने की चोट ठीक होने में 10 हफ्ते लगे थे.

लेकिन उस दौरान उनकी छवि काफी चमकी थी. और उनकी कमाई भी एक साल पहले 2 करोड़ रु. से बढ़कर 10 करोड़ रु. तक पहुंच गई. योनेक्स व डेक्कन क्रॉनिकल समूह लंबे समय से उनके प्रायोजक रहे हैं और भारत पेट्रोलियम की वे कर्मचारी हैं.

इसके अलावा एयरटेल, हर्बल लाइफ न्यूट्रीशनल प्रोडक्ट्स, टॉप रामेन नूडल्स, अदानी विल्मर्स फॉरचून खाद्य तेल जैसी कंपनियों का वे विज्ञापन कर रही हैं और जल्दी ही जेपी सीमेंट्स का करेंगी. जिस तरह से ज्‍यादा से ज्‍यादा कंपनियां उनके पास विज्ञापन को लिए आ रही हैं, उससे यही लगता है कि उन्हें अपने प्रशिक्षण के समय में कटौती करनी पड़ सकती है.

उनका रहन-सहन भी तेजी से बदलने लगा है. उन्होंने नया हेयरस्टाइल बना लिया है. उन्होंने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप से लौटते समय हीथ्रो हवाई अड्डे के एक स्टोर से हीरे की खूबसूरत अंगूठी, घर पर फिटनेस के लिए एक ट्रेडमिल, एक आइपैड और फैशनेबल परिधान खरीदे. उनके पिता हरवीर सिंह को इसमें कुछ भी असामान्य नहीं लगता. वे कहते हैं, ''सायना कतई फिजूलखर्च नहीं है.

दूसरी लड़कियों की तरह उसे भी कपड़ों और गहनों का शौक है. उसे भी अपने रंग-रूप पर ध्यान देना अच्छा लगता है. इसमें क्या गलत है?'' हरवीर सिंह ने बेटी की कमाई से हैदराबाद में एक फ्लैट खरीदा है, जिसमें सायना माता-पिता के साथ रहती हैं. यह फ्लैट पुलेला गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी के एकदम पास है, जहां कार से जाने पर महज सात मिनट लगते हैं. इसके अलावा हैदराबाद में एक कोठी और व्यावसायिक जगह है.

सायना मात्र तीन साल में विश्व की नंबर 16 खिलाड़ी से अगस्त, 2010 में नंबर 2 पर पहुंच गईं. इस समय वे नंबर 4 हैं. गोपीचंद कहते हैं कि उन्हें अब भी खुद को आक्रामक बनाने की जरूरत है, क्योंकि चैंपियन ऐसे ही होते हैं.

सायना अपने बचाव में कहती हैं, ''मेरी इच्छा विश्व में नंबर एक बनने और अगले साल ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल करने की है. इससे कम कुछ भी नहीं. गोपी सर ने मेरा खेल निखारने में काफी मदद की है और बाबू सर भी बहुत योगदान दे रहे हैं.'' मार्च में बाबू के कोच बनने के बाद से उन्होंने गोपीचंद से शायद ही बात की है.

लेकिन वे ट्रेनिंग के लिए अकादमी अब भी जाती हैं. इन दोनों के बीच में फंसकर रह गए बाबू कहते हैं कि वे फरवरी से उनके साथ हैं, जब उन्होंने साफ कर दिया कि वे पूरा ध्यान चाहती हैं. वे हफ्ते में मैदान और उससे बाहर सायना पर आठ घंटे लगाते हैं ताकि वे कोर्ट कवर, आक्रमण व नेट गेम को बेहतर बनाने और फोरहैंड बचाव में विविधता लाने में मदद कर सकें. गोपीचंद खेल के हर पक्ष को मजबूत बनाने पर जोर देते थे.

क्या बाबू 2012 के लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के सायना के सपने को पूरा करने में मदद कर पाएंगे. वे मानते हैं कि सायना को चीनी खिलाड़ी के खिलाफ कोर्ट पर ज्‍यादा आक्रामक होने की जरूरत है. उनका फॉर्म बने रहना जरूरी है, ताकि वे कम-से-कम गलतियां करें. यह काम कोच नहीं कर सकता. यह तो अंदर से आना चाहिए.

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