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रमन सिंह ने खोला सरकारी घोषणाओं का पिटारा

'चावल वाले बाबा' विधानसभा चुनाव 2013 के लिए लगा रहे हैं सस्ते मकानों पर दांव.

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रमन सिंह रमन सिंह

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का प्रिय राजनैतिक मुहावरा है लोकलुभावन योजनाएं तैयार करना. 2008 में दो रु. किलो चावल बेचकर सत्ता में वापसी करने वाले रमन सिंह इस बार सस्ता घर देकर 2013 की सियासी फसल काटने के फेर में हैं. वैसे, मकान और चावल के अलावा भी जीवन से लेकर मृत्यु तक रमन सरकार के पास 21 प्रमुख योजनाएं हैं. रमन सिंह को जहां अपनी योजनाएं रामबाण लग रही हैं, वहीं विपक्ष इन्हें फुस्स पटाखे से ज्यादा कुछ नहीं मान रहा.
जून में रमन सिंह ने अपने निर्वाचन क्षेत्र राजनांदगांव में 11,800 करोड़ रु. की 'अटल विहार' नाम की आवास योजना का शिलान्यास किया. इसके तहत रायपुर से लेकर सुकमा तक एक लाख मकान बनाए जाएंगे. मुख्यमंत्री का दावा है कि देश में यह अपनी तरह की पहली योजना होगी, जिसमें कस्बों, ब्लॉक मुख्यालयों और 5,000 से अधिक आबादी वाले गांवों में मकानों का निर्माण होगा. इनमें 85 फीसदी मकान गरीबों के लिए होंगे. वे कहते हैं, ''गरीबों का जीवन स्तर उंचा करने के लिए अनाज के बाद अब हम आवास मुहैया कराने जा रहे हैं.''
 2008 में अपनी सस्ता चावल योजना के बल पर ही रमन सिंह 'चावल वाले बाबा' के नाम से प्रसिद्घ हुए थे और दोबारा सत्ता में आए थे. पिछले साल 15 अगस्त को उन्होंने नौ नए जिलों की घोषणा की थी और इस साल जनवरी में नए जिलों का गठन भी कर दिया.
सालभर में रमन सरकार एक दर्जन से ज्यादा योजनाओं का ऐलान कर चुकी है. उसने फरवरी में छात्रों को 4  फीसदी के ब्याज पर एजुकव्शन लोन देने की घोषणा की. निःशुल्क संजीवनी एंबुलेंस सेवा सभी जिलों में शुरू हो ही चुकी है जिसमें 108 डायल करने पर 20-25 मिनट में एंबुलेंस जाने का दावा है. हालांकि नक्सल प्रभावित इलाकों में यह उतनी कारगर नजर नहीं आ रही. अब तक सिर्फ  गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को ही किसी भी अस्पताल में एक साल में 30,000 रु. तक का इलाज करवाने की पात्रता थी, अब इसके दायरे को बढ़ाकर योजना में सामान्य वर्ग  को भी शामिल कर लिया गया है. आदिवासियों को पांच रु. प्रति किलो चने की योजना, लोगों को सस्ती दवाइयां मुहैया करवाने के लिए जेनरिक दवाइयां बेचना और मृत्यु के बाद सरकारी खर्च पर शव को घर भेजने जैसी योजनाएं प्रमुख हैं.
रमन सरकार की इस चुनावी रणनीति से कांग्रेस भी सतर्क हो गई है और इसे मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बता रही है. विपक्ष के नेता रवींद्र चौबे कहते हैं, ''सरकार ये घोषणाएं चुनावी लाभ पाने के लिए कर रही है. इससे गरीबों का कोई फायदा नहीं होने वाला.'' वे आरोप लगाते हैं कि 2006 में केंद्र ने राज्य सरकार को रायपुर में 27,000 मकान बनाने के लिए 300 करोड़ रु. दिए थे लेकिन वे मकान आज तक जनता को नहीं मिले. इस पर पलटवार करते हुए रमन सिंह कहते हैं, ''गरीबों के लिए बनी योजनाओं पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. खाली पेट तरक्की की बात नहीं सोची जाती.''
मई में प्रदेश कांग्रेस ने प्रदेश सरकार पर अपने वादे पूरे करने का दबाव बनाने के लिए 'वादा निभाओ' आंदोलन चलाया था. प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलेष नितिन त्रिवेदी कहते हैं, ''2008 को तो छोड़ ही दीजिए, अब तक 2003 के वादे भी पूरे नहीं हुए. आदिवासियों को जर्सी गाय अब तक नहीं मिली. बेरोजगारों को 500 रु. का मासिक भत्ता देने का वादा अधूरा है, हर आदिवासी परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी, किसानों को प्रति क्विंटल धान पर 270 रु. का बोनस, पांच हॉर्सपावर के सिंचाई पंप को मुफ्त बिजली जैसी योजनाओं को पूरा नहीं किया गया.'' 
योजनाएं सरकार के खजाने पर भी बोझ डाल रही हैं. सस्ता चावल योजना का इस साल का बजट 950 करोड़ रु. है, किसानों को बिजली कनेक्शन में छूट देने पर सालाना 255 करोड़ रु. का भार आएगा. अटल विहार योजना पर भी सरकार 240 करोड़ रु. की सब्सिडी देगी. लेकिन चुनावी साल में ऐसे भार हल्के लगें तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए. 

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