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रमन सिंह: पीडीएस से बनी राष्ट्रीय पहचान

चाऊर (चावल) वाले बाबा, यह पहचान बन गई है छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की. गरीबों में अंत्योदय श्रेणी को एक रु. और बाकी बीपीएल को दो रु. की दर से हर महीने 35 किलो चावल देने की सफल योजना ने उन्हें यह नाम दिया.

रमन सिंह रमन सिंह

चाऊर (चावल) वाले बाबा, यह पहचान बन गई है छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की. गरीबों में अंत्योदय श्रेणी को एक रु. और बाकी बीपीएल को दो रु. की दर से हर महीने 35 किलो चावल देने की सफल योजना ने उन्हें यह नाम दिया.

आधे से अधिक जिलों के नक्सल प्रभावित होने के बावजूद इस छोटे-से राज्य ने अपनी स्थापना के महज एक दशक में बड़ा धमाल किया है. उन्हें मीडिया की सुर्खियां पाने की बजाए चुपचाप अपना काम करने में विश्वास है. लेकिन उनका काम उन्हें सुर्खियों में ला ही देता है. वर्ष 2011 में देश ही नहीं, दुनिया में भी रमन सिंह सुर्खियों में रहे और विश्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार, नौ राज्य, ब्रिटेन और अन्य देशों से आए कार्यदलों ने राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की मुक्त कंठ से सराहना की. राज्य की सशक्त पीडीएस प्रणाली का ही नतीजा निकला कि छोटा-सा राज्य 2011 में सर्वाधिक चावल उत्पादन करने वाला बना और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य को कृषि कर्मण पुरस्कार से नवाजा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी बनाई हाइ पावर कमेटी की सिफारिश के बाद 2011 में ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि छत्तीसगढ़ की कंप्यूटरीकृत पीडीएस प्रणाली को लागू किया जाए, जिसके बाद केंद्रीय खाद्य मंत्रालय ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिखकर इस दिशा में कदम आगे बढ़ाने की सलाह दी. रमन सिंह अपनी 2011 की उपलब्धियों के बारे में कहते हैं, ''राज्य के पीडीएस को राष्ट्रीय पहचान मिली और नौ अतिरिक्त जिले बनाने की पहल को मैं विकास की दिशा में लंबी छलांग और जनता के भरोसे की दृष्टि से बेहतरीन काम मानता हूं.''

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री ने प्रशासन को आम जनता के और करीब ले जाने के मकसद से रातोरात नौ नए जिले बनाने की घोषणा कर विपक्ष के साथ-साथ अपनों को भी चौंका दिया. राज्य में आठ साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे सिंह की छवि ऐसी है कि सत्ता और संगठन में आम तौर से होने वाले टकराव की स्थिति कभी नहीं बनी और बनी भी तो उसे राज्य स्तर पर ही सुलझा लिया गया.

संगठन के वरिष्ठ नेताओं से उनकी हर मुद्दे पर चर्चा होती है, जो बेहतर समन्वय की मिसाल है. हालांकि इस साल उन पर विपक्ष की ओर से कई आरोप लगे और विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव भी आया लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज रमन सिंह कहते हैं, ''पिछले आठ साल में विपक्ष सिर्फ आरोप लगाता रहा, लेकिन एक भी आरोप न तो साबित हुआ और न ही मामले दर्ज हुए. जनता का मुझ पर विश्वास है, इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिरना ही था.''

छत्तीसगढ़ का मॉडल पीडीएस सचमुच राजनैतिक इच्छाशक्ति का उम्दा उदाहरण है. महज एक उपचुनाव की हार ने रमन सिंह को ऐसा झकझोरा कि उन्होंने पीडीएस में बदलाव की ठान ली और 23 करोड़ रु. की लागत से छह महीने में समूचा तंत्र बदल गया. कंप्यूटरीकृत तंत्र के जरिए किसानों से धान की खरीदारी और मौके पर ही किसानों को भुगतान की नई प्रणाली ने किसानों और उपभोक्ताओं की तकदीर बदल दी. उनके काम के अंदाज को रायपुर के खम्मारडीह की झुग्गी बस्ती में रहने वाली 60 वर्षीया गीता बाई की टिप्पणी से भी आंका जा सकता है. गीता बाई को नहीं मालूम कि पीडीएस की व्यवस्था में बदलाव कैसे आया, लेकिन वे चेहरे पर सुकून का भाव जाहिर करते हुए कहती हैं, ''पहले राशन के लिए दुकानदारों के आगे चिरौरी करनी पड़ती थी. लेकिन अब बिना किसी मशक्कत के हर महीने चावल, गेहूं, नमक मिल जाता है.''

नक्सलवाद को राज्य के विकास में बड़ी चुनौती करार देते हुए रमन सिंह दावा करते हैं कि अब इस मुद्दे को राष्ट्रीय संदर्भ में सोचा और समझ जाने लगा है. कहा जाता है कि अगर रायपुर में आने वाला कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री से मिलने की इच्छा रखता है तो वह मिलकर ही जाता है. पिछले आठ साल से रमन सिंह हर गुरुवार को जनदर्शन कार्यक्रम में हजार-डेढ़ हजार लोगों की समस्या सुन मौके पर ही समाधान करते रहे हैं. उनकी सबसे बड़ी खासियत उनका निजी राजनैतिक इंटेलीजेंस है, जिससे वे फीडबैक हासिल करते हैं.

लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा का एकमात्र चेहरा होने के बावजूद सरल स्वभाव की वजह से रमन सिंह केंद्र में नरेंद्र मोदी जैसी ठसक नहीं बना पाए हैं. हर मसले पर दिल्ली दरबार में हाजिरी देना उनकी कमजोरी है. लेकिन वे किस्मत के धनी कहे जाते हैं, जो अंदरूनी विरोधों के बावजूद जनता में प्रिय हैं. उनकी इसी छवि की वजह से पार्टी से ज्यादा केंद्र सरकार में उनके हितैषी हैं और वे केंद्र से राज्य का सारा काम आसानी से करा लेते हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे पूरी तरह निश्चिंत हो सकते हैं. हाल ही में भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव ने तो राज्य की पुलिस पर सवाल उठा दिया था. जाहिर है उन्हें खतरा घर के अंदर से है.

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