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डी.पी. यादव को ना, राजा भैया को हां

भ्रष्टाचार और अपराध से प्रदेश को मुक्ति दिलाने का संकल्प लेने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ठाकुरों को रिझाने के लिए गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपी को कारागार विभाग देकर बनाया कैबिनेट मंत्री.

राजनीति प्रतीकों का खेल है. विधानसभा चुनाव के दौरान साफ-सुथरी राजनीति के युवा प्रतीक बनकर उभरे अखिलेश यादव से बेहतर इस बात को भला कौन समझ सकता है. विधानसभा चुनाव से पहले शराब व्यापारी और बाहुबली नेता डी.पी. यादव को पार्टी में शामिल करने से इनकार कर अखिलेश यादव ने एक बड़ी लकीर खींच दी थी. ऐसा करने के लिए वे पार्टी के पुराने नेताओं से भिड़ भी गए. आइपैड और ब्लैकबेरी से संवाद करते अखिलेश यादव आधुनिक सोच वाले परिष्कृत युवा नेता की इमेज बनाने में सफल रहे. लेकिन राजनीति में छवि और प्रतीक जितनी तेजी से बनते हैं उतनी ही तेजी से बिखरते भी हैं. आपराधिक और भ्रष्ट नेताओं से परहेज करने वाले अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद एक ऐसा फैसला किया, जिसकी धमक प्रदेश और देश की राजनीति में लंबे समय तक सुनाई देगी. यह फैसला था राजा भैया को कारागार मंत्री बनाने का.

उत्तर प्रदेश के दागी मंत्रीबतौर निर्दलीय जीतकर आए रघुराज प्रताप सिंह यानी राजा भैया के सरकार में होने या न होने से विधानसभा में सपा के बहुमत पर कोई फर्क नहीं पड़ता. 403 सदस्यीय प्रदेश विधानसभा में सपा के 224 विधायक हैं. लेकिन अखिलेश यादव ने तय किया कि वे राजा भैया को न सिर्फ कैबिनेट मंत्री बनाएंगे बल्कि उन्हें कारागार (जेल) जैसा विभाग भी देंगे. राजा भैया के अतीत को देखते हुए इस फैसले ने अखिलेश के प्रशंसकों को भी चौंकाया है. राजा भैया कोई पहली बार मंत्री नहीं रहे हैं. समाजवादी पार्टी (सपा) की पिछली सरकार में भी वे मंत्री थे. लेकिन अब जबकि देश भर में साफ-सुथरी राजनीति की चाहत बढ़ी है और अखिलेश को ऐसी राजनीति के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा है, तो उनसे उम्मीदें बढ़ जाती हैं. हालांकि सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव का यही कहना है कि ‘किसी भी अदालत ने राजा भैया को दोषी करार नहीं दिया है.’ सपा की यह सफाई उस भारतीय मध्यवर्ग के आसानी से गले नहीं उतरेगी जिसने अखिलेश के रूप में एक सौम्य और आधुनिक नेता को देखने की तमन्ना पाल रखी है.

6 मार्च को विधानसभा चुनाव में पार्टी को बहुमत मिलने के साथ ही प्रचार के दौरान बनी सपा की नई प्रगतिशील छवि ही पृष्ठभूमि में चली गई. सपा कार्यकर्ताओं के जश्न ने कई घरों के चिराग बुझा दिए और दलित बस्तियों में मातम छा गया. तब से राज्‍य में लगभग हर रोज कहीं दलितों को सताने, कहीं विरोधियों को पीटने और कहीं जश्न में डूबे कार्यकर्ताओं से आम लोगों को परेशानी की खबर आने लगी. प्रदेश में गुंडाराज की वापसी का अंदेशा सही होता दिखने लगा. नए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं को चेताया लेकिन हालात बेहतर न होते देख सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को बजट सत्र छोड़कर लखनऊ में रहना पड़ा और उन्हें ‘लक्ष्मण रेखा न लांघने’ की चेतावनी भी देनी पड़ी.

लेकिन अराजकता और अनुशासनहीनता का स्त्रोत अकसर निचले कार्यकर्ताओं के बीच नहीं, बल्कि शिखर पर होता है. कार्यकर्ता अकसर ऊपर का संकेत पकड़ते हैं. राजा भैया को मंत्री पद शीर्ष नेतृत्व ने ही दिया है. उनके खिलाफ हत्या का प्रयास, हत्या के लिए अपहरण, डकैती जैसे पांच गंभीर मामलों समेत आठ आपराधिक मामले हैं और वे पिछले एक दशक में दो साल से ज्‍यादा समय तक जेल की सलाखों के पीछे बिता चुके हैं. कारागार मंत्री बनने के पीछे उनकी अपनी दलील है, ‘जेल में रहा हूं, सब जानता हूं’

राजा भैया की दलील में दम हो सकता है पर भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण से त्रस्त प्रदेश के लोगों को नई सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उनके मंत्री बनने की घोषणा के बाद से ही सोशल नेटवर्किंग साइट और पत्र-पत्रिकाओं की साइट पर प्रतिक्रियाओं का अंबार लग गयाः ‘कोली (निठारी कांड का आरोपी) को जेल से निकालकर बाल कल्याण मंत्री बनाया जाने वाला है...भैया भए कोतवाल अब डर काहे का...जब सत्ता गलत हाथों में हो तो मंत्री के लिए जेल भी घर बन जाता है...अच्छा है, आखिर जेल और अपराधियों की समझ राजा से बेहतर किसकी होगी... आखिर, जेल उनका घर है और अपराधी उनके भाई...जूनियर मुलायम, बहुत समझदारीभरा फैसला है...’ अखबारों की सुर्खियों और वेबसाइट पर टिप्पणियों से अखिलेश की बनी-बनाई छवि मानो एक झटके में धुल गई.

भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में अभियान चला रही टीम अण्णा की सदस्य किरण बेदी ने ट्वीट कियाः ‘उत्तर प्रदेश के जेल मंत्री का अपराध रिकॉर्ड काफी बड़ा है. हम उन्हें वोट/एक्सेप्ट करते हैं. खुद पर (कु)शासन के लिए!’ दिल्ली की तिहाड़ जेल की प्रमुख के तौर पर कैदियों की दशा सुधारने के लिए सराही गईं बेदी इतने पर ही नहीं रुकीं: ‘क्या मंत्री सरकारी नौकर होता है?’ उन्होंने अपने सवाल का खुद ही जवाब दिया, ‘बिल्कुल होता है.’ और फिर सवाल दाग दिया, ‘तो फिर दो तरह के नियम क्यों? आम नागरिकों के लिए चरित्र प्रमाणपत्र और मंत्री के लिए नहीं?’ बेदी ने जवाब दिया, ‘अगर यूपी के जेल मंत्री को उनके अपराध रिकॉर्ड के मद्देनजर काम करने की जगह दी जाए तो उन्हें 'जेल्ड मंत्री' कहा जाएगा.’

समाज के विभिन्न तबके ने राजा भैया को कारागार मंत्री बनाने की जमकर आलोचना की. केंद्र में सपा से समर्थन की उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का कहना है, ‘बेदाग छवि वालों को मंत्रिमंडल में रखने का अखिलेश यादव का दावा सरकार बनने के बाद धूमिल हुआ है, सपा को इसका नुकसान आगामी विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ेगा.’ अगला विधानसभा चुनाव पांच साल बाद होगा पर क्या सपा लोकसभा चुनाव में इसका असर न होने की उम्मीद कर रही है?

राजा भैया के खिलाफ सबसे ज्‍यादा मामले बसपा सरकार के दौरान दर्ज किए गए. 2003 में राजा भैया और उनके पिता उदय प्रताप सिंह के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) समेत कुल 76 मामले थे. उनमें से कई मामलों को मुलायम सरकार ने वापस ले लिया था. लेकिन 2007 में बसपा सरकार आते ही राजा भैया एक बार फिर निशाने पर आ गए. राजा भैया ने विभिन्न मामलों में 26 महीने जेल की सजा काटी. मुख्यमंत्री अखिलेश का कहना है, ‘अगर कोई राजा भैया के खिलाफ दर्ज मामलों की जांच करे तो उसे पता चल जाएगा कि उनके पीछे कौन है.’ फिलहाल, राजा भैया के खिलाफ आठ मामले हैं जिनमें पांच डकैती, हत्या का प्रयास, हत्या के लिए अपहरण और गंभीर रूप से घायल करने के मामले हैं. अगर वे इनमें से किसी भी मामले में दोषी पाए गए तो उत्तर प्रदेश के जेल मंत्री को सात साल से लेकर पूरी जिंदगी जेल में बितानी पड़ सकती है.

करीब दस साल पहले राजा भैया के घर पर छापा मारने वाले पुलिस अधिकारी आर.एस. पांडे का कुछ समय बाद सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया. इस मामले की जांच अभी चल रही है. लेकिन राजा भैया अपने और समर्थकों के ऊपर लगे सभी मुकदमों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं. वे कहते हैं, ‘आप मानेंगे कि मेरे और समर्थकों पर बर्तन चुराने की डकैती और 20,000 रु. की डकैती डालने का मुकदमा दर्ज हुआ था.’

लेकिन राजा भैया के इलाके में उनका इतना दबदबा है कि चुनाव में उनके खिलाफ ताल ठोंकने वाले उम्मीदवार भी सीधे तौर पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं. एक नेता का कहना है कि राजा भैया ने पूरे इलाके में दबंगई को एक संस्थागत रूप दे दिया है. स्थानीय बसपा नेता प्रबुद्घ तिवारी बताते हैं, ‘यहां पर लोगों का दिमाग 'कैप्चर' कर लिया गया है. आम आदमी के पास राजा भैया की नाफरमानी करने की हैसियत नहीं.’

आखिर क्या है राजा भैया के इस प्रभाव की वजह? इलाके में राजा भैया के समर्थकों ने 'राजा भैया यूथ ब्रिग्रेड' बना रखी है. इसके सचिव हरिओम बताते हैं कि भदरी राजघराने ने शुरू से ही अपनी रियाया के हित में काम किया है. इसका उद्देश्य जनता के सुख-दुख का ध्यान रखना, गरीबों की आर्थिक मदद करना, किसी भी जाति की गरीब कन्याओं का विवाह कराना जैसे काम हैं. कुंडा विधानसभा की पूरे तिगुनाइत देवीगढ़ ग्राम सभा में रहने वाले मजदूर पारसनाथ पटेल उन लोगों में शुमार हैं जिनकी बेटी का विवाह राजा भैया यूथ ब्रिगेड ने कराया है. पटेल बताते हैं, ‘दो साल पहले बड़ी बेटी का ब्याह राजा भैया की कृपा से हो गया. अब बाकी की शादी के लिए भी उन्हीं का आसरा है.’

किसी जमाने में भदरी रियासत से तीन किमी दूर लगे बोर्ड पर लिखा होता थाः ‘राज्‍य सरकार का अधिकार क्षेत्र यहीं समाप्त होता है.’ राजा भैया का परिवार कानून को तोड़ता-मरोड़ता नहीं था बल्कि अपने फरमान को कानून मानता था. परिवार पर चाहे कैसे भी आरोप रहे हों, पुलिस कभी राजमहल में घुसने का साहस नहीं कर पाई. ऐसा नहीं है कि मुलायम सिंह शुरू से ही राजा भैया के संरक्षक रहे हैं. 1989 में मुलायम के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में पहली बार राजा भैया के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज हुआ था. भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उन्हें 'कुंडा का गुंडा' करार दिया था.

दरअसल, मायावती ने राजा भैया और उनके परिवार के खिलाफ अभियान चलाकर 'ठाकुर उत्पीड़न' का संदेश दलितों को दिया. 'उत्पीड़ित' ठाकुर समुदाय ने पाया कि भाजपा और कांग्रेस ने उनका साथ नहीं दिया. ऐसे में बसपा की कट्टर प्रतिद्वंद्वी सपा ने उनकी ओर हाथ बढ़ा दिया. जब राजा भैया पोटा के तहत जेल में बंद हुए तो सपा कार्यकर्ताओं ने प्रदेश भर में धरना-प्रदर्शन किया. संभवतः मुलायम सिंह ने आने वाले दिनों में राजा भैया की उपयोगिता को भांप लिया था. 2007 से सपा ने कुंडा विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले राजा भैया के खिलाफ अपना प्रत्याशी उतारना बंद कर दिया. हालांकि मुलायम सिंह की दोनों बहुएं-मुख्यमंत्री अखिलेश की पत्नी डिंपल और उनके भाई प्रतीक की पत्नी अपर्णा-ठाकुर परिवार से हैं. लेकिन सपा से अमर सिंह की विदाई के बाद पार्टी के पास ठाकुरों को लुभाने वाला चेहरा नहीं था. ऐसे में राजा भैया को सबसे दमदार ठाकुर चेहरा मान लिया.

लेकिन राजा भैया के कारागार मंत्री बनने पर आशंका है कि वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके राजनैतिक विरोधियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. उनका एक ऐसा ही विरोधी दिवाकर शुक्ल जेल में बंद है और कुंडा में शुक्ल के परिवारवाले चिंतित हैं. राजा भैया ऐसी आशंकाओं को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘मैंने किसी मंत्रालय की मांग नहीं की थी.’ राजा भैया ने कारागार विभाग भले न मांगा हो पर नए मुख्यमंत्री ने संभवतः उनके अनुभव को देखते हुए यह संवेदनशील मंत्रालय थमा दिया हो. लेकिन बकौल बेदी, ‘कैदियों को रोल मॉडल चाहिए. आपराधिक रिकॉर्ड वाले जेल मंत्री जेल के भीतर राजनैतिक शिक्षा के लिए रोल मॉडल हो सकते हैं! नया प्रयोग!’

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