scorecardresearch
 

रेलवे के ड्राइवर: दोषी ड्राइवरों के हाथ आपकी जिंदगी

हर रोज 21 लाख सिग्नल पार कर 3 करोड़ से ज्यादा यात्रियों को अपने मुकाम तक पहुंचाती है भारतीय रेल. पर दूसरा पहलू देखिए, हर साल रेल हादसों में करीब 26,000 लोग मरते हैं.

हर रोज 21 लाख सिग्नल पार कर 3 करोड़ से ज्यादा यात्रियों को अपने मुकाम तक पहुंचाती है भारतीय रेल. पर दूसरा पहलू देखिए, हर साल रेल हादसों में करीब 26,000 लोग मरते हैं. आधे से ज्‍यादा मामलों में इन हादसों के लिए रेलवे के कर्मचारी ही जिम्मेदार होते हैं. ऐसे में रेलवे इसे लेकर कितना गंभीर है?

हर हादसे के बाद रेल प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार ड्राइवर या दूसरे कर्मचारियों को कड़ी सजा देने और घटना की जांच कराने का वादा करता है. लेकिन हाल ही में एक सूचना का अधिकार (आरटीआइ) अपील से हुए खुलासे ने इस मामले में रेलवे की गंभीरता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है. जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में ड्राइवर अपने पद पर या उससे नीचे के पद पर वापस आकर नौकरी कर रहे हैं. हालांकि रेलवे मान चुका है कि 62 फीसदी रेल हादसे उसके कर्मचारियों की नाकामी की वजह से होते हैं.रेल दुर्घटनाओं में हुई मौत

आरटीआइ अपील के जवाब में अब तक (17 में से) चार क्षेत्रीय कार्यालयों और (67 में से) आठ मंडल कार्यालयों से जवाब मिले हैं. इनके मुताबिक, जनवरी, 2005 से नवंबर, 2011 के बीच हादसों में दोषी पाए गए 132 ड्राइवरों को नौकरी से हटाया गया और 35 को जबरन सेवानिवृत्ति दी गई.

दूसरी ओर इन ड्राइवरों ने रेलवे में दया याचिका दायर की. नतीजतन 23 ड्राइवर अपने मूल पद पर ही बहाल हो गए. उनसे कम भाग्यशाली 39 ड्राइवर थोड़ा निचले ओहदे पर लौटने में कामयाब रहे. यानी सलाखों के पीछे जाना तो दूर, 167 दोषी ड्राइवरों में से 62 अपनी नौकरी पाने में कामयाब हो गए.

जो ड्राइवर निचले ओहदे पर वापस आए हैं उनमें से कुछ तीन साल बाद पुराने ओहदे पर आने के पात्र बन जाएंगे. यहां स्पष्ट कर दें कि सबसे ज्यादा क्रमशः 36 और 29 ड्राइवरों को नौकरी से हटाने वाले उत्तर-मध्य रेलवे (इलाहाबाद) और पूर्व-मध्य रेलवे (हाजीपुर) ने अपील के बाद बहाल किए गए ड्राइवरों के बारे में कोई भी रिकॉर्ड उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया. जाहिर है, यह संख्या बढ़ सकती है.

आगरा के अशोक कुमार ने अपनी आरटीआइ याचिका में रेलवे बोर्ड से पूछा था कि ''रेल हादसों के लिए पूरे तौर पर दोषी पाए गए कितने ड्राइवरों को दया अपील के आधार पर नौकरी में ले लिया गया?'' कुमार की अपील के पीछे एक वजह थी.

पिछले साल मई में दिल्ली से सटे फरीदाबाद के पास वे खुद एक रेल हादसे के गवाह बने थे. ''हादसे के बाद मैंने ड्राइवर से पूछा कि आप के ऊपर क्या कार्रवाई होगी? उसने चलताऊ ढंग से मुझसे कहा कि जांच चलेगी और बाद में मैं फिर से नौकरी पर आ जाऊंगा.'' कुमार सचमुच सकपका गए. उन्हें संदेह होने लगा कि दोषी ड्राइवरों के खिलाफ कोई सख्ती होती भी है या नहीं.ड्राइवरों की बहाली के आंकड़ों में पेंच

हर जरूरी छोटे-बड़े फैसले लेने वाले रेलवे बोर्ड का रवैया देखिए. दंडित किए जाने वाले ड्राइवरों के बारे में ब्यौरा उसके पास रहता है लेकिन आरटीआइ का उसने सीधे कोई जवाब न दिया. इसकी बजाए वह अर्जी उसने विभिन्न क्षेत्रीय और मंडलीय कार्यालयों की ओर बढ़ा दी, भूलभुलैया में भटकने के लिए.

कुमार को अब तक जिन जगहों से जवाब मिले हैं. इंडिया टुडे ने वही आंकड़े रेलवे बोर्ड से सीधे हासिल किए. इनके मुताबिक, जनवरी, 2005 से दिसंबर, 2011 के बीच रेलवे ने 226 ड्राइवरों को हादसों का दोषी पाए जाने पर नौकरी से निकाला या जबरन सेवा निवृत्ति दी. रेलवे में किसी कर्मचारी को नौकरी से हटाने के यही तरीके हैं.

बोर्ड के मुताबिक दया अपील के बाद 226 ड्राइवरों में से 19 को मूल पद पर और 78 को निचले पद पर बहाल किया गया. जितनी जगहों से अभी तक जवाब मिले हैं, उन्हीं के मुताबिक उक्त अवधि में 23 ड्राइवर मूल पद पर बहाल हुए, जबकि बोर्ड के मुताबिक पूरे देश भर में 19 ड्राइवरों की ही मूल पर बहाली हुई.

आखिर कैसे बहाल हो जाते हैं दोषी ड्राइवर? दया याचिकाओं के पीछे रेलवे में कुछ खिचड़ी तो नहीं पक रही? रेलवे बोर्ड के चेयरमैन विनय मित्तल ने तो इंडिया टुडे की कई कोशिशों के बावजूद बात करना ही मुनासिब न समझा. बोर्ड के प्रवक्ता अनिल कुमार सक्सेना ने अपनी तरफ से भरसक पक्ष रखने की कोशिश की. यही कि यात्रियों की सुरक्षा को लेकर रेलवे बहुत सख्त है.दोषी ड्राइवरों की बड़ी संख्‍या

हादसों के लिए जिम्मेदार ड्राइवरों की पहचान और उन्हें दंडित करने के लिए रेलवे में साफ-साफ नियम कायदे हैं. ''जहां तक दया याचिका का सवाल है तो प्राकृतिक न्याय का जो सिद्धांत देश के हर नागरिक पर लागू होता है, वही रेलवे के कर्मचारियों के लिए भी है. ऐसे कर्मचारी फैसले के खिलाफ निर्णय के लिए उच्च अधिकारी के पास अपील करते हैं.

अपीलीय अथॉरिटी कई मामलों में अपील पर विचार करने के बाद कर्मचारी को रियायत दे देती है, लेकिन यह विस्तृत जांच के बाद ही किया जाता है. वैसे भी किसी हादसे में मौतों के मामलों की जांच रेलवे सुरक्षा आयुक्त करता है, जो रेलवे का नहीं बल्कि किसी दूसरे विभाग का अधिकारी होता है. ऐसे में ड्राइवर को सेवा में वापस लेने के मामले को संदेह से देखने का सवाल ही कहां पैदा होता है?''

सक्सेना की मानें तो मूल पद पर वापसी का यह मतलब नहीं कि ड्राइवर को फिर से ट्रेन चलाने के ही काम पर लगाया जाएगा. ''अमूमन उसे बराबरी के ओहदे का ही कोई दूसरा दायित्व सौंपा जाता है.'' कैसे यकीन करें इन दावों पर? ये दावे इतने ही सही हैं तो केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) में 2005 में हुए अंतरराष्ट्रीय रेल सुरक्षा  सम्मेलन में रेल मंत्रालय के तत्कालीन निदेशक (सेफ्टी) अमिताभ ने क्यों कहा था कि 1994 से 2004 के बीच 60 फीसदी से ज्‍यादा रेल हादसे रेलवे कर्मचारियों की नाकामी से हुए?

आइए अब जरा उन पर नजर दौड़ाते हैं, जो बहाल हुए. उत्तर रेलवे के नई दिल्ली मंडल में 2005 से नवंबर, 2011 के बीच 12 ड्राइवरों को हटाया गया. उन्होंने जब अपनी सजा के खिलाफ अपील की तो उनमें से नौ निचले पद पर बहाल होने में कामयाब रहे. ध्यान रहे, सड़क हादसों में दोषी ठहराए जाने वाले ट्रक ड्राइवर लंबी अदालती प्रक्रिया के बाद जेल में चक्की पीसते हैं.

दूसरी ओर रेलवे के ड्राइवर बीच में ही बहाल होकर फिर से नौकरी का मजा लेते हैं. उत्तर रेलवे के ही अंबाला छावनी मंडल की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है. यहां उसी अवधि में आठ ड्राइवरों को नौकरी से हटाया गया और एक को जबरन सेवानिवृत्ति दी गई.

सजा पाए ड्राइवरों को अपील करनी ही थी. उनमें से चार को तीन साल के लिए शंटर के निचले पद पर भेज दिया गया. तीन साल के बाद ये चारों फिर से मूल पद पर आने की पात्रता हासिल कर लेंगे. दो अन्य ड्राइवरों के मामले में नौकरी से हटाए जाने की सजा को जबरन सेवानिवृत्ति में बदल दिया गया. यानी लाभ तो आखिर उसे भी मिला.

पूर्व तटीय रेलवे (भुवनेश्वर) का हाल देखिए. यहां तकरीबन सभी दया याचिकाओं पर ड्राइवरों के पक्ष में फैसला हुआ. 16 ड्राइवरों को हटाया गया और पांच को जबरन सेवानिवृत्ति दी गई. इन 21 ड्राइवरों में से 14 ने अपनी सजा के खिलाफ उच्च अधिकारियों के सामने अपील की. उनमें से 13 दया प्राप्त करने में कामयाब रहे. पांच ड्राइवर तो सीधे मूल पद पर वापस आ गए, जबकि आठ को निचले पदों पर पोस्टिंग दी गई.

इसी तरह दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मंडल में 23 ड्राइवरों को नौकरी से हटाया गया और तीन को जबरन सेवानिवृत्ति दी गई. दया याचिका के बाद इन 26 में से 23 नौकरी बचाने में कामयाब रहे और  10 तो अपने मूल पद पर वापस लौट आए.

रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के गृहराज्य पश्चिम बंगाल के दक्षिण-पूर्व रेलवे (कोलकाता) में इस दौरान 12 ड्राइवरों को सेवा से हटाया गया और एक को जबरन सेवानिवृत्ति का दंड मिला. इन 13 में से अपील सिर्फ तीन ने की और तीनों को मूल पद वापस मिल गया.

पश्चिम-मध्य रेलवे के जबलपुर मंडल में चार ड्राइवरों को सेवा से हटाया गया और दो को जबरन सेवानिवृत्ति दी गई. इन छह में से पांच की नौकरी दया अपील के बाद बच गई. कोटा, हाजीपुर, इलाहाबाद, नागपुर, फिरोजपुर, आगरा और नागपुर से मिले जवाब भी कुछ इसी तरह की कहानी बयान करते नजर आते हैं.

यहां सवाल यह उठता है कि क्या बाकी सरकारी विभागों की तरह रेलवे में भी किसी हादसे की जिम्मेदारी तय करने में बहुत लंबा समय लगता है. पुनरीक्षण अपील के बाद शुरू में दोषी पाए गए ड्राइवर अकसर आसानी से बच निकलते हैं. रेलवे के इस बारे में अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2005 के बाद से रेल हादसों में हर साल औसतन 26,000 यात्री जान गंवाते हैं.

2010 में तो मौत का यह आंकड़ा 27,000 तक जा पहुंचा था. मौत के आंकड़ों का यह पहाड़ रेलवे को चेताने के लिए काफी नहीं कि वह अपनी दया खास मौकों के लिए बचाकर रखे और दोषी ड्राइवरों के साथ सख्ती से पेश आए?

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें