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प्रेमचंद शोध संस्थान: दो गज का भी टोटा

करोड़ों रु. बहाने वाली सरकार के पास प्रेमचंद संस्थान के लिए जमीन तक नहीं है.

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उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर खानापूर्ति करते हुए मायावती की बसपा सरकार ने प्रेमचंद शोध संस्थान बनाने के लिए पौना एकड़ जमीन दे दी है. अपने शासन काल के अंतिम दौर में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मुंशी प्रेमचंद की 125वीं जयंती पर लमही में आयोजित समारोह में प्रेमचंद शोध संस्थान बनाने के लिए राज्‍य सरकार की तरफ  से ढाई एकड़ जमीन मुफ्त दिए जाने की घोषणा की थी. फिर सत्ता पलट गई.

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28 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे अंक

21 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे अंक

 

नई सरकार के खजाने से बमुश्किल पौना एकड़ जमीन ही निकली है. महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र प्रताप सरकार पर सवाल दागते हैं, ''मायावती सरकार आंबेडकर और कांशीराम जैसे लोगों की मूर्तियों एवं पार्कों के लिए जब कई सौ करोड़ रु. पानी की तरह बहा सकती है तो क्या प्रेमचंद का महत्व किसी मामले में इन लोगों से कम है? उनमें मायावती को कहीं वोट बैंक नहीं दिखाई देता है.''

वोट की बिसात पर कोई राजा तो कोई रंक बना दिया जाता है. अपने लेखन और विचारों से लोक को नई दिशा देने वाले इस महान उपन्यासकार के शोध संस्थान को लेकर ऐसी राजनीति हुई कि उसका लोक पक्ष गायब ही हो गया. वे कहते हैं, ''दूसरे देशों में जाकर प्रेमचंद के समकक्ष रचनाकारों के स्मारक देखिए तो पता चलता है कि अपनी परंपरा और विरासत के सम्मान और संरक्षण के मामले में हम उन लोगों के आसपास भी कहीं नजर नहीं आते.''

31 जुलाई को प्रदेश सरकार के संस्कृ ति मंत्री सुभाष पांडे ने जैसे ही बीएचयू के तत्कालीन कुलपति प्रो. डी. पी. सिंह को पौना एकड़ जमीन का कागज सौंपा, काशी के विद्वानों ने सरकार की आलोचना शुरू कर दी. बीएचयू के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राधेश्याम दुबे कहते हैं, ''प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकार पर शोध संस्थान बनाने के लिए यह जमीन तो कम है ही. यह उनकी गरिमा और महत्व का अवमूल्यन भी है.''

प्रख्यात साहित्यकार और समालोचक  एवं बीएचयू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. चौथीराम यादव कहते हैं, ''प्रेमचंद की महत्ता को ये राजनेता क्या समझेंगे. इन्हें तो अपने स्वार्थ की रोटियां ही सेंकनी आती हैं. चुनाव नजदीक आ रहा है तो मायावती को भी प्रेमचंद याद आ गए. लेकिन सरकार ने यहां भी खानापूर्ति वाला ही काम किया. पौना एकड़ जमीन देकर अपना कोरम पूरा कर लिया. प्रेमचंद या उन जैसे लोगों से इस सरकार का क्या लेना-देना.''

केंद्र की कांग्रेस सरकार और मुलायम सरकार के प्रति आभार जताते हुए जगतगंज निवासी अनिल यादव कहते हैं, ''वो तो भला हो मुलायम सिंह का, जिन्होंने प्रेमचंद के जीर्ण-शीर्ण पैतृक आवास के पुनर्निमाण एवं उनके नाम पर प्रस्तावित आवास पार्कों, पोखरों ,मार्गों, ग्राम, द्वार मान, स्तंभों और उद्यानों के लिए दो करोड़ पांच लाख रु. देकर इस महान उपन्यासकार की धरोहर को सुरक्षित रखने में सहायता की वरना मायावती सरकार के भरोसे तो प्रेमचंद से संबंधित कोई भी धरोहर आज जीवित नहीं होती. साथ ही कांग्रेस ने प्रेमचंद शोध संस्थान के लिए पैसा दिया, जो अभी तक शुरू ही नहीं हो सका है.''

किसानों द्वारा जमीन न देने का बहाना बनाकर सरकार ने पौन एकड़ में ही मामले को रफा-दफा करना चाहा है, जबकि किसान जमीन देने के लिए तैयार हैं. लमही निवासी प्रमोद श्रीवास्तव कहते हैं, ''मैं तो जमीन देने के लिए तैयार हूं. बस मुझे मेरा उचित मुआवजा मिल जाए.''

शोध संस्थान की बाबत क्षेत्रीय सांस्कृतिक अधिकारी लवकुश द्विवेद्वी का कहना है, ''लोग यह क्यों नहीं समझ्ते कि जहां कुछ भी नहीं था वहां अगर इतना भी हो रहा है तो वह अच्छा है.'' संस्कृति मंत्री सुभाष पांडे कहते हैं, ''मुलायम सिंह ने तो कहा था, जबकि हमारी सरकार तो वास्तव में जमीन दे रही है.''

प्रेमचंद शोध संस्थान को भव्य बनाने की प्रेमचन्द के वंशजों की भी दिली इच्छा है. उनके पौत्र अतुल राय कहते हैं, ''इस शोध संस्थान के लिए सरकार को कम-से-कम पांच एकड़ जमीन उपलब्ध करानी चाहिए.'' वे सरकार को याद दिलाने वाले अंदाज में कहते हैं कि प्रेमचंद गोर्की के समकक्ष माने जाते हैं. ऐसे में गोर्की और प्रेमचंद की तुलना स्मारक और शोध संस्थान के आधार पर की जाए तो प्रेमचंद गोर्की से बहुत पीछे छूट जाते हैं.

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