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पाकिस्तानी हिंदू: घर की तलाश में बेवतन

पाकिस्तान में जुल्म-ज्‍यादती से तंग होकर भाग आए 145 हिंदुओं को भारत सरकार ने भी टका-सा जवाब दे मायूस किया.

बाबा डेरा धुनी दास. मजनूं का टीला. उत्तरी दिल्ली. पाकिस्तान के सिंध प्रांत से जान बचाकर भागे 28 हिंदू परिवारों का फिलहाल यही पता है. गर्भवती महिलाओं, दुधमुंहे बच्चों से लेकर अधेड़ स्त्री-पुरुष तक कुल मिलाकर 145 पाकिस्तानी हिंदू यमुना के कछार में बसे इस डेरे में गंदगी और असुविधाओं के बीच गुजर कर रहे हैं.

जत्थे का 17 साल का एक लड़का एक पखवाड़े पहले कैंसर से मर गया और दो किशोर हेपेटाइटिस-बी से जूझ रहे हैं. एक-एक तंबू में 10 से 15 लोग किसी तरह रात काटते हैं और दुआ करते हैं कि उनकी जिंदगी में भी नई सुबह हो. पाकिस्तान लौटने पर उन्हें जान का खतरा है और भारत सरकार ने उन्हें वीजा खत्म होते ही वापस लौटने की हिदायत दे दी है.

अपने पूरे कुनबे के साथ पाकिस्तान के हैदराबाद से सटे मटियारी गांव से दिल्ली आए गंगाराम ने इन अल्फाज में अपना दर्द बयां कियाः ''सन्‌ 1947 का बंटवारा भी हमारे पुरखों को अपनी जमीन छोड़ने को मजबूर नहीं कर सका. मगर 1992 में बाबरी मस्जिद क्या ढहाई गई, हमारी जिंदगी दोजख बन गई. गांव के मंदिर गिरा दिए गए और अपने बहुसंख्यक मुसलमान भाइयों के लिए हम दुश्मन बन गए. दर्द जब हद से बढ़ गया तो हम किसी तरह भारत आ गए और अब यहीं रहना चाहते हैं.'' ये सारे परिवार हैदराबाद के चार गांवों मटियारी, सांगण, भिटशा और बुढ़ियाली से आए हैं. पनवार, बागड़ी, चौहान और सोलंकी जातियों से ताल्लुक रखने वाले ये परिवार पाकिस्तान में भूमिहीन मजदूर हैं.

लगातार चार साल एड़ियां घिसने के बाद इन्हें धार्मिक यात्रा पर भारत जाने का पर्यटक वीजा हासिल हुआ और ये लोग दो जत्थों में अगस्त और सितंबर में बाघा बॉर्डर के जरिए भारत में दाखिल हुए. इनमें से कुछ परिवारों का वीजा 2 नवंबर को ही समाप्त हो चुका है. इन परिवारों की मांग है कि भारत उन्हें शरणार्र्थी का दर्जा या भारत की नागरिकता दे.

गंगाराम के छोटे भाई शोभाराम के दो लड़कों भगवान दास (17) और मदन दास (15) के पाकिस्तान में ही हेपेटाइटिस बी से पीड़ित होने की पुष्टि हो गई थी. शोभाराम बताते हैं कि दिल्ली में बच्चों का किसी तरह का इलाज होना तो दूर, उलटे पेट पालने के लिए उन्हें मजदूरी करनी पड़ रही है. परिवार का एक लड़का पहले ही कैंसर से जान गंवा चुका है. कोई स्थायी समाधान होने तक ये लोग रेहड़ी लगाकर, सब्जी बेचकर और फुटपाथ पर छोटे-मोटे धंधे कर किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं.

कई परिवारों की महिलाएं कढ़ाई का काम जानती हैं, लेकिन फिलहाल इसे आमदनी का जरिया बनाने का कोई सिलसिला शुरू नहीं हुआ है. छोटे बच्चे को गोद में लिए सावित्री ने बताया कि कुछ सामाजिक संगठनों ने थोड़ी-बहुत मदद की है और बच्चों के लिए किताबें भी मुहैया कराई हैं. लेकिन इस तंगहाली में तालीम से पहले रोजी-रोटी की जरूरत है. बड़ों की इन चिंताओं से दूर बच्चों ने प्याज बेचने की डलिया को ही अपना खिलौना बना लिया है और पीड़ा दर्ज करने आए मीडिया के कैमरे उन्हें शरारत करने की नई वजह दे देते हैं.

लेकिन पाकिस्तान में ऐसी क्या ज्यादती हुई कि घर-बार छोड़कर भारत आ गए? इस सवाल पर पाकिस्तान से आए अर्जुन ने कहा, ''काम-काज में होने वाला सौतेलापन तो हम फिर भी बर्दाश्त कर लेंगे, लेकिन हम अपना धर्र्म नहीं छोड़ना चाहते. बहू-बेटियां महफूज नहीं हैं. घर में भी पूजा करना मुहाल है. हमारे ऊपर धर्म परिवर्तन करने का जबरदस्त दबाव है. बहुत-से हिंदू परिवार दबाव में झुककर पहले ही ऐसा कर चुके हैं.'' इन लोगों ने कई ऐसे गंभीर आरोप भी लगाए जिन्हें व्यक्त करना काफी संवेदनशील है.

क्या पाक से आए हिंदुओं के आरोप सही हैं और पाक सरकार अपने इन नागरिकों के लिए क्या कर रही है? इस सवाल पर दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के मिनिस्टर प्रेस मुहम्मद खालिद सरवर ने बताया, ''यह मामला हमारी जानकारी में आया है. चूंकि यह मामला पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्रालय के दायरे में आता है, लिहाजा हमने वहां से रिपोर्ट दरयाफ्त की है. रिपोर्ट आने के बाद ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता है.'' उन्होंने बताया कि इनमें से किसी पाकिस्तानी नागरिक ने अब तक उच्चायोग से संपर्क नहीं किया है.

उधर, सामाजिक संगठनों के तमाम दबाव के बावजूद भारत सरकार पाकिस्तानी हिंदुओं पर हो रहे जुल्म से पिघलती नजर नहीं आ रही है. लोकसभा में जब यह मुद्दा उठा तो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री मुल्लपल्ली रामचंद्रन ने अपने लिखित जवाब में कहा, ''सामूहिक धार्मिक यात्रा वीजा पर भारत आए सभी पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा की मियाद खत्म होने पर या कुछ खास मामलों में बढ़ाई गई मियाद खत्म होने पर पाकिस्तान लौटना होगा.''

29 नवंबर को आए इस सरकारी बयान के बाद इन परिवारों में मायूसी छा गई. क्या वाकई सरकार के पास इन लोगों की अर्जी सुनने की फुरसत नहीं है? इस सवाल पर पाकिस्तान मामलों के जानकार जी. पार्थसारथी ने कहा, ''मानवीय आधार पर भारत सरकार को इन लोगों को भारत में बसने की इजाजत दे देनी चाहिए. पूर्र्ण नागरिकता के बजाए इन्हें ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (ओसीआइ) या पर्संस ऑफ इंडियन ओरिजिन (पीआइओ) का दर्जा दिया जा सकता है.'' उन्होंने बताया कि इस तरह रहने की इजाजत दी जा सकती है जिसमें मताधिकार न हो, लेकिन देश में रहने और रोजी-रोटी कमाने की छूट हो.

बहरहाल, कानूनी नुक्तों और इंसानियत की दुहाई के बीच ये परिवार एक ऐसी जमीन की तलाश में हैं, जहां पैर तो जमाए ही जा सकें, साथ ही सिर उठाकर जीने की भी मनाही न हो. वैसे बहुत मुमकिन है कि सरकार इस मुद्दे को विदेशी कूटनीति के पारंपरिक चश्मे से ही देखे और एक लंबा अनिर्णय इन आस लगाए लोगों की झेली में आए. लेकिन सवाल यह है कि इन पाक नागरिकों के जो बच्चे भारत की जमीन पर अगले कुछ दिनों में जन्म लेंगे, उनका वतन भारत होगा या पाकिस्तान? या वे सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह में ही अपना मुस्तकबिल देखेंगे.

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