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मुस्लिम महिलाएं: स्त्री को हो बराबरी का हक

तीन तलाक के नियम, शोषण और गैर-बराबरी के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के बीच भी अब विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सभा में विरोध का परचम उठाती महिलाएं.

तलाक के सामंती नियमों और असमानता के विरोध में मुस्लिम औरतों के स्वर अब तीखे होने लगे हैं. मुस्लिम औरतों के अधिकारों को लेकर बनाए गए दो प्रमुख संगठनों परचम एवं भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने संयुक्त रूप से सहारनपुर में सम्मेलन आयोजित कर इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की. इस मौके पर देशभर में जागरूकता अभियान चलाने का अहम फैसला भी लिया गया.

महिला संगठनों ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एवं सरकार से मुस्लिम निजी कानून संहिताबद्ध किए जाने एवं मुस्लिम औरतों को कुरान में बताए गए अधिकार दिए जाने की मांग की. सम्मेलन में ईमेल, खत, मोबाइल और एसएमएस आदि के जरिए तलाक दिए जाने पर पूरी तरह से रोक लगाए जाने की जरूरत पर जोर दिया गया.

'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' पिछले पांच वर्षों से देश के 15 राज्‍यों में सक्रिय है. देशभर में करीब 25,000 मुस्लिम औरतें इस संगठन से जुड़ी हैं. इसकी अध्यक्ष नाइश हसन ने इंडिया टुडे  से कहा कि किसी भी धर्म के निजी कानून औरतों को सुरक्षा नहीं देते. मुस्लिम निजी कानून संहिताबद्ध कानून नहीं है. वह औरतों को सुरक्षा नहीं देता. उनके मुताबिक 1939 मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम में मुस्लिम औरतों को तलाक का अधिकार तो दिया पर मर्दों के एक तरफा तीन तलाक के हक पर अंकुश नहीं लगाया. सहारनपुुर में 28 अक्तूबर को परचम सामाजिक संस्थान के साथ मिलकर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने 'मुस्लिम पारिवारिक कानून में सुधार की संभावना' विषयक परिचर्चा आयोजित की.

नाइश हसन ने इस मौके पर कहा कि कु रान से औरतों को मिले अधिकार निजी कानून में नजर नहीं आते. इसलिए वे समुदाय के भीतर शोषण का शिकार हो रही हैं. उन्होंने कहा कि अल्जीरिया, मिस्त्र, इराक, जॉर्डन, कुवैत, लीबिया, मलेशिया, मोरक्को, फिलीपींस, सीरिया, ट्यूनीशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यमन में मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किया जा चुका है. नाइश हसन का कहना था कि शरीयत में क्या प्रावधान दिए गए हैं, इससे जुड़ी व्याख्याएं कई जानी-मानी कानूनी हस्तियों जैसे जस्टिस अमीर अली, तैयब मुल्ला, विलसन, फि टजिराल्ड एवं बैली द्वारा की गई हैं, लेकिन कोई संवैधानिक कानून नहीं है.

कानून की व्याख्याएं तब तक कानून नहीं बनतीं, जब तक उसे संसद द्वारा अनुसमर्थित नहीं कर दिया जाता. संसद में 1937, 1939 और 1986 के कानून को अनुमोदित किया गया है. नाइश हसन के मुताबिक भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने यह पहल की है कि कुरान के विचारों की तर्ज पर शादी और तलाक से संबंधित कानूनों को संहिताबद्ध (कोडिफाइड) किया जाए. जो कुरान के न्याय, समानता, बुद्धि और सबसे महत्वपूर्ण रहम आदि मूल्यों के मार्ग पर हो.

डॉ. कुदसिया अंजुम का कहना था कि छोटी-छोटी बातों पर एक ही झ्टके में औरतों को तलाक दिए जाने से उनकी हालत नरक जैसी बन गई है. प्रमुख उर्दू पत्रकार एवं लेखक डॉ. शाहिद जुबैरी का कहना था कि मुस्लिम औरतों को तलाक कुरान की भावनाओं के अनुरूप ही दिया जाना चाहिए. अल्लाह की नजर में तलाक देना गुनाह है, जिससे बचने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए. इस्लामिक राज्‍य में इसके लिए सजा का भी प्रावधान है.

इंस्टीट्यूट ऑफ मुस्लिम लॉ के डायरेक्टर एवं मशहूर वकील अनवर अली एडवोकव्ट का कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ अंग्रेजी हुकूमत में 1936-37 के दौरान दारुल उलूम देवबंद के संरक्षक रहे मौलाना अरशफ अली थानवी, पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना एवं सहारनपुर के मौ. अहमद काजमी एडवोकव्ट के प्रयासों के चलते तैयार किया गया था. आज उसी की रोशनी में मुसलमानों के शादी, विवाह, मेहर एवं खर्चा आदि के मुकदमों का निबटारा किया जाता है.

अनवर अली एडवोकव्ट की मांग थी कि इस कानून की कमियों-खामियों को दूर किया जाए. महिला अधिवक्ता शहजाद ने कहा कि तलाक और भरण-पोषण के मामले सुलझ्ने की बजाए अदालतों में उलझ जाते हैं.

इस दौरान एक तलाकशुदा महिला अदीबा ने तलाक पूर्व और तलाक के बाद के अपने कड़वे अनुभव बताए. तीन तलाक के मुद्दे पर देवबंदी मसलक की विख्यात इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद के नायब मोहतमिम और जाने-माने अरबी के प्रोफव्सर मौलाना अब्दुल खालिक संभली ने इंडिया टुडे से कहा कि इस्लाम में तीन तलाक को गुनाह माना गया है और दारुल उलूम एवं जमीयत उलमाए हिंद लोगों को जागरूक करने का काम कर रहा है.

दारुल उलूम का फतवा विभाग व उसके विद्वान मुफ्ती तलाक और निकाह संबंधी देश-दुनिया के लोगों द्वारा पूछे जाने वाले सवालों का कुरान और शरीयत की रोशनी में जवाब देने का काम करते हैं. उन्होंने कहा कि तीन तलाक पर कोई रोक नहीं लगा सकता, लेकिन इससे बचे जाने की अपील की जा सकती है.

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