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यूपीए सरकार पर मुलायम फिर हुए मेहरबान

यूपीए सरकार के लिए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव फिर बन रहे हैं तारणहार. केंद्र की कमजोर सरकार उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के लिए मुफीद साबित हो सकती है

ममता बनर्जी और प्रणब मुखर्जी ममता बनर्जी और प्रणब मुखर्जी

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव जमीन से जुड़े आदमी हैं और मिट्टी के अखाड़े पर कुश्ती कैसे लड़ी जाती है, इसके गुर वे जानते हैं. उनकी दूसरी खासियत यह बताई जाती है कि वे ठंडा करके खाते हैं.

लखनऊ और चंडीगढ़ में नए मुख्यमंत्रियों-पुत्र अखिलेश और मित्र प्रकाश सिंह बादल-के शपथ ग्रहण समारोह में वामपंथी और क्षेत्रीय दलों के नेताओं के जमावड़े से उत्साहित कुछ लोग बेशक तीसरे मोर्चे जैसे स्वप्निल विचार के फिर से शक्ल लेने की उम्मीद जता रहे हैं और ममता बनर्जी के लगातार गर्म होते तेवर के बीच यह संभावना वास्तविकता में बदलती दिख रही है कि यूपीए सरकार संकट में पड़ जाए.

ऐसे मौसम में तीसरे मोर्चे के बरसाती विचार का सामने आना स्वाभाविक है. रायसीना की पहाड़ी-जहां सत्ता के शिखर नॉर्थ और साउथ ब्लॉक बने हैं-में पूछा जाने लगा है कि क्या समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यूपीए की सरकार को बचाएंगे? कांग्रेस इस बात से खुश हो सकती है कि मुलायम केंद्र की सरकार को अस्थिर करने के मूड में नहीं हैं.संख्‍या है तो सत्ता है

73 वर्षीय मुलायम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को धोबी पछाड़ दांव से पटककर ठंडा कर चुके हैं. पुत्र अखिलेश को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपने के बाद उनकी नजर अब केंद्र की राजनीति पर है. संयुक्तमोर्चा के जमाने में एच.डी. देवेगौड़ा के हटने के बाद मुलायम प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहद करीब थे. वामपंथियों के समर्थन के बूते वे प्रधानमंत्री बन भी जाते, लेकिन ऐन वक्त पर लालू प्रसाद यादव ने दूसरे यादव की ताजपोशी की संभावना पर पानी फेर दिया. मुलायम इस महात्वाकांक्षा को फिर से पंख लगाना चाहेंगे.

उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर बहुमत हासिल करने वाली सपा इस समय लोकसभा चुनाव होने पर अपनी सीटों की संख्या दोगुना करने का ख्वाब देख सकती है और यह हकीकत से दूर का ख्वाब नहीं है. अगली लोकसभा में अगर कांग्रेस और भाजपा का गठबंधन सत्ता से दूर रह जाता है तो 40 से ज्‍यादा सांसदों के साथ मुलायम सिंह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में मजबूत दावेदार होंगे.

लेकिन क्या वे तत्काल चुनाव कराने की रणनीति पर काम कर रहे हैं और क्या वे इसके लिए केंद्र की सरकार को गिराने की कोशिश करेंगे? राजनीति में वे जिन चंद गिने-चुने लोगों से सलाह लेते हैं उनमें से एक का कहना है, 'मुलायम केंद्र की सरकार का समर्थन करते रहेंगे. जब तक समर्थन वापसी से बड़ा राजनैतिक लाभ मिलने की संभावना न हो, वे समर्थन वापस नहीं लेंगे. शह और मात जैसा बड़ा फैसला लेने से पहले वे जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव और फिर साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों पर नजर रखना चाहेंगे.'

यह बात कांग्रेस के मुंह में शहद की तरह घुल रही होगी. कांग्रेस ने मुलायम के साथ अतीत में बेहद बुरा किया है. इस बार के चुनाव में कांग्रेस के युवराज ने अपमानजनक लहजे में यह कहा था कि कांग्रेस गुंडों (और चोरों) का समर्थन नहीं करेगी.

थोड़ा पीछे जाएं तो परमाणु करार पर समाजवादी पार्टी ने मुसलमान वोटरों की नाराजगी का खतरा मोल लेते हुए 2009 में मनमोहन सिंह की सरकार को प्राणदान दिया था. लेकिन कांग्रेस ने सपा के साथ वही बर्ताव किया जो दूध में पड़ी मक्खी के साथ किया जाता है. ऐसे में अगर मुलायम एक बार फिर मनमोहन सरकार के संकट-मोचन बनते हैं, तो कांग्रेस को उन्हें झुक-झुक कर सलाम करना चाहिए.

सरकार का गणित

लखनऊ और चंडीगढ़ के शपथ ग्रहण समारोहों में विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद तीसरा मोर्चा जैसा कोई समीकरण उभरता नहीं दिख रहा है. ऐसे में केंद्र में अपनी ही सरकार को घुड़की देने का तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी का दांव उलटा पड़ सकता है. केंद्र सरकार को ममता के 19  सांसदों के साथ ही सपा के 22 सांसदों का बाहरी समर्थन हासिल है और संकट की घड़ी में मुलायम पर्याप्त कीमत वसूलकर उसे न केवल गिरने से बचा सकते हैं बल्कि सरकार में शामिल भी हो सकते हैं.

केंद्र की कमजोर यूपीए सरकार उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार की लोकलुभावन योजनाओं को परवान चढ़ा सकती है और अंततः तृणमूल कांग्रेस से पल्ला झड़कर फिर से वामपंथियों को रिझा सकती है.

कांग्रेस की यह दीर्घकालिक योजना पश्चिम बंगाल में भी कारगर होगी. ऐसे में यह कांग्रेस और यूपीए-2 के साझीदारों के लिए महत्वपूर्ण घड़ी है. विधानसभा चुनावों में शर्मसार हुई कांग्रेस केंद्र में सरकार बचाने के लिए कभी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी की चिरौरी कर रही है, तो कभी सपा प्रमुख को खुश करने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस कई तरह की योजनाओं पर एक साथ काम कर रही है. क्षेत्रीय दलों के नेताओं में महत्वाकांक्षा के बावजूद एका और इच्छाशक्ति न होना कांग्रेस को रास आ रहा है.

यही नहीं, प्रमुख विपक्षी भाजपा के साथ ही वाम मोर्चे के सांसदों का मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार न होने से भी देश की पुरानी पार्टी को मदद मिल रही है. 12 मार्च को बजट सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद इसीलिए यह कह पाए 'मैं आश्वस्त हूं कि सरकार के पास जरूरी नंबर हैं.'

दरअसल, सपा की तरह ही तृणमूल का भी फायदा लोकसभा चुनाव जल्दी होने में है. पश्चिम बंगाल में अपार बहुमत से चुनाव जीतने के बाद ममता को एहसास हो चुका है कि वे अपनी लोकप्रियता के चरम पर हैं. उन्हें मालूम है कि शिखर पर पहुंचने के बाद सिर्फ एक ही रास्ता बचता है और वह है नीचे का. लिहाजा, केंद्र तथा राज्‍य में कांग्रेस से छुटकारा पाकर अपने मौजूदा 19 सांसदों की संख्या बढ़ाने का सबसे बढ़िया समय यही है. वे 2014 का इंतजार नहीं कर सकतीं क्योंकि तब तक राज्‍य में उनकी सहयोगी कांग्रेस वाम मोर्चे के साथ गठजोड़ करके विरोधी बन सकती है. वैसे तो, बिहार में जनता दल (यू) के बहुमत से उत्साहित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी केंद्र की सरकार को घेरने का मौका नहीं चूकना चाहते.

जद (यू) के 20 सांसद हैं और मध्यावधि चुनाव की दशा में उसे भी फायदा होने की उम्मीद है. लगातार तीसरी बार ओडीसा की सत्ता में आए बीजू जनता दल के नवीन पटनायक के 14 सांसद हैं. उधर, दक्षिण में अन्ना द्रमुक की जे. जयललिता पिछले साल तमिलनाडु में अपनी शानदार वापसी से उत्साहित हैं. इनमें से तृणमूल कांग्रेस यूपीए की साझीदार है, लेकिन ममता बिहार और ओडीसा के मुख्यमंत्रियों के संपर्क में रहती हैं. हालांकि उनके बीच कोई राजनैतिक गठजोड़ नहीं है पर राजनैतिक सहमति है, जो किसी भावी मोर्चे का आधार बन सकती है. लगता है तृणमूल प्रमुख को ज्‍यादा जल्दबाजी है.

दीदी क्‍यों नाराज

ताज्‍जुब नहीं कि दिनेश त्रिवेदी के रेल बजट पर ममता की झल्‍लाहट के बाद मनमोहन सरकार को औपचारिक रूप से नोटिस जारी हो गया है. ममता इस बात पर ज्‍यादा भड़कीं कि उन्होंने ऐसा प्रगतिशील, सुधार-स्नेही बजट पेश करने की गुस्ताखी की जो उनकी लोकलुभावन राजनीति के कतई खिलाफ है.

हैरान-परेशान कांग्रेसी कैबिनेट मंत्री मनौती कर रहे हैं कि अब ममता को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट में कुछ आपत्तिजनक न दिखाई पड़े. अन्यथा खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश और पेंशन रिफॉर्म जैसे यूपीए के चंद बेहद पसंदीदा बिल ठंडे बस्ते से बाहर नहीं निकल पाएंगे. एक ओर ममता जहां कोलकाता से एक के बाद एक फरमान जारी कर रही हैं तो कांग्रेस केंद्र में यूपीए सरकार बचाने के रास्ते तलाश रही है. बजट सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संसद में मुलायम की सीट तक जा पहुंचीं और उत्तर प्रदेश की जीत पर उन्हें बधाई दी.

बाद में रेल बजट पर हुई छीछालेदर के बाद कांग्रेस ने आनन-फानन में कैबिनेट मंत्री पवन बंसल और वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा को अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत करने के लिए लखनऊ रवाना किया. इसके पीछे बेहद बेसब्र राजनैतिक गणित काम कर रहा है-यूपीए के पास तृणमूल को छोड़कर 257 सांसद हैं, जो सरकार बचाने के लिए जरूरी संख्या 272 से खासे कम हैं. अगर इसमें सपा के सांसदों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 279 हो जाती है.

बजट सत्र के पहले ही दिन से ममता यूपीए को लगातार तीखे संकेत दे रही हैं. सबसे पहले उन्होंने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण में नेशनल काउंटरटेररिज्‍म सेंटर (एनसीटीसी) को शामिल करने के खिलाफ संशोधन प्रस्ताव पेश करने की धमकी दी. इस धमकी से सकते में आए वित्त मंत्री मुखर्जी को यूपीए सहयोगियों को यह समझने के लिए आगे आना पड़ा कि अभिभाषण के खिलाफ प्रस्ताव लाना या बजट की मुखालफत करना अपनी ही सरकार का गला घोंटने जैसा है. इसके बाद, जब प्रधानमंत्री ने सहयोगियों को डिनर पर आमंत्रित किया तो ममता ने पार्टी की कनिष्ठ सांसद डॉ. रत्ना डे को इसके लिए भेजा. मगर अगली ही सुबह 14 मार्च को पंजाब में प्रकाश सिंह बादल के शपथ ग्रहण समारोह में उनकी ओर से एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री और दो अन्य पार्टी नेता शामिल हुए.

द्रमुक भी अपने 18 सांसदों के साथ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के इस महीने के अंत तक पेश किए जाने वाले एक प्रस्ताव को लेकर यूपीए को बंधक बनाए हुए है. वह चाहता है कि सरकार इस मामले में कथित युद्ध अपराधों के सिलसिले में जेनेवा में पेश किए जाने वाले प्रस्ताव पर श्रीलंका के खिलाफ वोट डालने का आश्वासन दे.

मुलायम का ऑक्‍सीजन

उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जब यह पूछा गया कि क्या सपा कांग्रेस की नैया पार लगाएगी, तो उन्होंने कहा कि इसका फैसला तो उनके पिता मुलायम सिंह यादव ही करेंगे. अखिलेश हंसते हुए बोले, 'अभी तो उत्तर प्रदेश की सरकार बनाई है.' मुलायम सिंह का भी कहना है कि उनके जेहन में 'फिलहाल यूपी के अलावा कुछ नहीं है.'

सपा के लोकसभा सांसद शैलेंद्र कुमार ने बजट पेश होने के दिन सरकार के स्थिर होने का भरोसा दिलाया और अखिलेश यह बात पहले कह चुके हैं. वैसे, मुलायम दिल्ली लौटने पर जिन लोगों से मिले उनमें पहला नाम माकपा नेता प्रकाश करात का है. कांग्रेस के एक नेता के शब्दों में, 'हमारे लिए सच कहें तो यह अच्छी खबर है.' उन्होंने स्पष्ट किया, 'ममता और वामपंथी एक मंच पर कभी नहीं आ सकते.' शायद इसी वजह से ममता ने अखिलेश के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने के लिए किसी वरिष्ठ पार्टी नेता को नहीं भेजा.

कांग्रेस के नेता ममता के बदले मुलायम से दोस्ती करने में छुपे खतरों को भी भलीभांति समझते हैं. मुलायम कोई सुविधाजनक सहयोगी साबित नहीं होने वाले. वे उत्तर प्रदेश को मिलने वाली तमाम केंद्रीय योजनाओं का सेहरा भी अपने माथे पर बांधेंगे. इससे राहुल गांधी के बेहद महत्वाकांक्षी मिशन 2014 के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. बताया जा रहा है कि सपा यूपीए सरकार में शामिल हो सकती है. मुलायम के चचेरे भाई रामगोपाल यादव को राज्‍यसभा का उपसभापति बनाया जाएगा.

फिलहाल, तृणमूल नेता सुदीप बंद्योपाध्याय के लोकसभा में दिए गए इस बयान से कांग्रेस को सांस में सांस आई है कि उनकी पार्टी सरकार से समर्थन वापस नहीं ले रही है. उन्होंने कहा, 'सरकार खतरे में नहीं है.' इस आश्वासन से यूपीए राहत की सांस नहीं ले सकती है क्योंकि ममता का राजनैतिक हित तो जल्द-से-जल्द चुनाव में है. जाहिर है संकट पूरी तरह टला नहीं है. मनमोहन सिंह मुलायम सिंह को धन्यवाद दे सकते हैं कि सरकार को ऑक्सीजन सप्लाई फिलहाल जारी है. यूपी के दंगल के बाद मुलायम खुद अपने शब्दों में 'सुस्ता रहे हैं.' कुश्ती और राजनीति के इस उस्ताद के अगले दांव का सबको इंतजार है.

-साथ में आशीष मिश्र लखनऊ में और संतोष कुमार दिल्ली में

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