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घुंघरुओं की खनक पर थम गया वक्त

बुरहानपुर में मुगलिया दौर से चली आ रही मुजरे की परंपरा वक्त के थपेड़ों से खत्म होती जा रही है.

ताप्ती नदी के किनारे बसा शहर बुरहानपुर और शहर से भी ज्यादा प्रसिद्घ इसका एक इलाका बोरवाड़ी. जब सारी दुनिया सोती है, तब यहां की गलियां गुलजार होती हैं. यहां ज्यादातर मुजरेवालियों के घर गुलाबी या जामुनी रंग के हैं. जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है, कुछ उसी तर्ज पर यहां भी बड़े से हॉल में मुजरा होता है. हॉल की चटकीले रंगों वाली दीवारों पर बड़े-बड़े आईने लगे होते हैं, फॉल्स सीलिंग पर खूबसूरत झूमर लटक रहे होते हैं. मुजरा देखने वालों को यहां ‘मेहमान’ कहा जाता है. मेहमाननवाजी भी पूरे अदब से होती है. यहां मुजरे के माहौल और परंपरा में तनिक भी बदलाव नहीं आया है. लेकिन इस परंपरा को जिंदा रखने वाला डेरेदार समाज जरूर समय के साथ खुद को बदल रहा है या यूं कहें कि बदलने को मजबूर है.

डेरेदार समाज ने पिछले साढ़े चार सौ बरसों से मुजरे की परंपरा को बचाकर रखा है. लेकिन जैसा कि डेरेदार समाज के अध्यक्ष अमीन अहमद बताते हैं, ‘अब 60 परिवारों में से सिर्फ 24 घरानों में ही मुजरा होता है.’ बाकी के 36 घरों ने खुद को 'शरीफ घर' बताकर इस पेशे से नाता तोड़ लिया है. चूंकि मुजरेवालियों के घर मेहमानों के लिए हमेशा खुले रहते हैं, इसीलिए 'शरीफ घरवालों' ने अपने घरों के बाहर तख्तियां लगा दी हैं, जिन पर लिखा होता है, ‘बिना इजाजत अंदर आना मना है.’ मुजरेवाले घरानों और शरीफ घरानों में बस यही फर्क है.

जिन घरानों में अब भी मुजरा बदस्तूर जारी है, वे भी अपनी नई पीढ़ी को इससे जुदा रखना चाहते हैं. 32 साल की फिरदौस उर्फ शाहीन, जिसे लोग गुड्डी के नाम से भी जानते हैं, पिछले लगभग दो दशकों से मुजरा करती आ रही है. अपने काम से प्रेम करने वाली गुड्डी के लिए कमाई का एकमात्र जरिया भी यही है. इसीलिए वह इस पेशे को छोड़ना नहीं चाहती, लेकिन अपने सात साल के बेटे को इस दुनिया से दूर ही रखना चाहती है. गुड्डी कहती है, ‘मुजरा बेशक एक कला है, लेकिन तवायफों के प्रति समाज का नजरिया कभी बहुत अच्छा नहीं रहा. मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा पढ़-लिख जाए और इस दुनिया से दूर हो जाए.’ इसी नजरिए के कारण दस बरस पहले तक जहां मुहल्ले के लगभग 20 घरों में रोजाना मुजरा हुआ करता था, वहीं आज हफ्ते में तीन दिन भी मुजरे की महफिल जम जाए तो बहुत है.

बुरहानपुर में मुजरे का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि मुगल इतिहास. सोलहवीं सदी में शाहंशाह अकबर ने फारूखी बादशाह बहादुरशाह को हराकर बुरहानपुर पर कब्जा जमाया था. सत्ता संभालने के लिए अकबर ने अपने बेटे मुराद शाह को यहां भेजा. वह अपने लावो-लश्कर के साथ मनोरंजन के लिए तवायफों को भी उनके डेरों समेत लाया था. सन्‌ 1606 में पहली बार बुरहानपुर में तबले की थाप के साथ घुंघरुओं की छम-छम गूंजी. जहांगीर के पुत्र शहजादा परवेज के स्वागत में 1606 में ही अकबरी सराय में भव्य जलसा हुआ, जिसमें आम जनता ने पहली बार मुजरा देखा. वह आयोजन बुरहानपुर में मुजरों के इतिहास का पहला पन्ना बना.

1616 में जहांगीर ने ही इन डेरेवालों को बोरवाड़ी क्षेत्र में बसाया था. उस दौर में मोतीकुंवर, बेगम गुलारा जैसी तवायफों पर जहांगीर भी मोहित थे. उसने मोती कुंवर के लिए असीरगढ़ के पास महल बनवाया था, जिसे मोती महल कहा जाता है, तो गुलारा बेगम के लिए भी उतावली नदी के किनारे महल गुलारा बनवाया था. कट्टर छवि वाला बादशाह औरंगजेब भी बुरहानपुर की एक हिंदू तवायफ  हीराबाई से प्रेम करता था.

डेरेदार समाज खुद को जहांगीर और औरंगजेब की प्रेयसियों और मशहूर तवायफों गुलाराबानो, मोतीकुंवर और हीराबाई का वंशज मानता है. जमाना तेजी से बदला, लेकिन यहां के मुजरों में वही तहजीब और परंपरा कायम रही. पिछले 38 साल से मुजरों में हारमोनियम बजा रहे निसार अहमद बताते हैं, ‘मुजरों पर आजकल के आइटम गीतों का असर नहीं पड़ा. आज भी लोग उमराव जान के गीतों पर ही मुजरा देखना पसंद करते हैं.’ एक और खास बात यह है कि यहां आज भी रिकॉर्ड किए गीतों की बजाए संगतकारों के साथ ही बाकायदा महफिल सजाकर मुजरे पेश किए जाते हैं. गीत-संगीत के प्रति अपने प्रेम के कारण इस पेशे को अपनाने वाली युवा तवायफ समीना बताती है, ‘मुजरा तो बचपन से ही देखते आए हैं. सजना-संवरना, नृत्य करना अच्छा लगता था. इच्छा है कि बॉलीवुड में बस एक मौका मिल जाए.’ हालांकि यहां की एक भी तवायफ इतनी खुशकिस्मत नहीं रही, जिसे यह मौका मिला हो.

तवायफों के जीवन से जुड़ी एक कड़वी सचाई यह भी है कि वे अपने बच्चों को पिता का नाम नहीं दे पातीं. तवायफों का निकाह नहीं होता है, लेकिन सरफराजों की बदौलत वंश चलता है. जो व्यक्ति डेरेदार समाज की एक रस्म में तवायफ का जीवन भर का खर्च उठाने का वायदा करता है और उसे मुजरा करने की छूट भी देता है, उसे सरफराज कहते हैं. तवायफ का सरफराज की संपत्ति पर कोई हक नहीं होता, न उसके बच्चों को पिता का नाम मिलता है. इस समाज के ज्यादातर लोग अपनी मां के नाम से ही जाने जाते हैं.

पर मशहूर तवायफ फातिमा के बेटे जफर अहमद ने इस परंपरा को बदलकर एक मिसाल कायम की है. अहमद को उनकी मां के सरफराज रहे पावरलूम व्यवसायी रउफ सेठ ने अच्छी तालीम दिलवाकर काबिल बनाया. अपनी मां को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए अहमद ने सरफराज की परंपरा को तोड़ते हुए उनका रउफ सेठ से बाकायदा निकाह पढ़वाया.

कुछ समय से डेरेदार समाज में शिक्षा के प्रति भी जागरूकता बढ़ी है. अमिन अहमद बताते हैं कि समाज के कई बच्चे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं. लोगों ने बेटियों को भी पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर, वकील, शिक्षिका बनाया है. लेकिन ये लोग तवायफ के वंशज के तौर पर अपनी पहचान जाहिर नहीं होने देना चाहते. शायद तवायफों को लेकर समाज का वही घिसा-पिटा रवैया इसके मूल में है.

हालांकि जो महिलाएं आज भी गुजर-बसर के लिए मुजरे पर ही निर्भर हैं, उनके जीवन को पुलिस के कड़े रवैये ने और भी कष्टदायक बना दिया है. इस बस्ती से लंबे समय तक पार्षद रहे गोपी खुराना कहते हैं, ‘प्रशासन मुजरे को तो अपराध नहीं मानता, लेकिन सुरक्षा-व्यवस्था कायम रखने के उद्देश्य से उसने मुजरों पर पहरा बिठा दिया है. मुजरा देखने आने वालों के नाम बाकायदा रजिस्टर में दर्ज होते हैं. इससे घबराकर लोगों ने यहां आना कम कर दिया है जिसका सीधा असर तवायफों की आमदनी पर पड़ा है.’

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