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आरटीआई: उनकी जान की आफत जानकारी

कभी मजबूरी की आड़ लेकर तो कभी झूठ बोलकर, सूचना छिपाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे सूचना अधिकारी

राज्‍य सूचना आयोग का ऑफिस राज्‍य सूचना आयोग का ऑफिस

आम आदमी के लिए सचाई सामने लाने का हथियार बन चुका  सूचना का अधिकार कानून (आरटीआइ) छह साल पहले जब देश में लागू हुआ था तब इसकी ताकत का अंदाजा कम ही लोगों को रहा होगा. आज इसकी मदद से 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी और लवासा सिटी जैसे ढेरों बड़े घोटाले उजागर हुए हैं.

प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी कहते हैं, ''आजादी के बाद किसी कानून का इतना असर नहीं पड़ा जितना आरटीआइ का. इससे भ्रष्टाचार के मामले तो उजागर हो ही रहे हैं, जवाबदेही भी बढ़ी है.'' इसी खौफ के चलते केंद्र सरकार इसका दायरा सीमित करने की तैयारी में भी है.

दूसरे राज्‍यों के साथ प्रदेश में भी 12 अक्तूबर, 2005 को, सरकार और सरकारी मशीनरी को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और लोक प्राधिकारियों के कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए, आरटीआइ अधिनियम लागू किया गया था. लेकिन सचाई यह है कि सरकारी मशीनरी से आज भी सूचनाएं आसानी से नहीं मिलतीं.

लोकायुक्त और पुलिस की आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा को इसके दायरे से बाहर करने का फैसला भी इसे कमजोर बनाता है. हालांकि 24 सितंबर को मध्य प्रदेश हाइकोर्ट में इस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर शासन को नोटिस मिला है.

मरीजों पर, उनकी सहमति के बगैर, अवैधानिक रूप से दवाओं का परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने का मामला उजागर करने वाले इंदौर के डॉ. आनंद राय का अनुभव भी इसकी पुष्टि करता है. उन्होंने आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) से ड्रग ट्रायल मामले की जांच रिपोर्ट आरटीआइ के तहत मांगी थी, जो सत्यापन के अधीन बताते हुए नहीं दी गई जबकि सत्यापन पहले ही हो चुका था.

चार्टर्ड एकाउंटेंट, उद्योगपति और पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी, जो आरटीआइ कार्यकर्ता भी हैं, कहते हैं, ''सूचना रोकने का उद्देश्य देरी करना भी होता है क्योंकि ऐसे मामलों में सूचना आयोग के पास अपील करनी पड़ती है और निराकरण होने तक दो साल की देरी कर दी जाती है. इससे आरटीआइ कानून की धार कुंद हो जाती है.''

जानकारी देने में देरी के सवाल पर तिवारी कहते हैं, ''सूचना अधिकारियों को जैसा प्रशिक्षण मिलना चाहिए वैसा नहीं दिया गया. उन्हें कानून और उसकी प्रक्रिया की जानकारी भी नहीं है.''

कोठारी ने प्रदेश में मेडिकल यूनिवर्सिटी की स्थापना संबंधी दावे और मांग संबंधी दस्तावेज मांगे थे. जवाब मिला कि मंत्रिमंडल को फैसला लेना है जिसके लिए दस्तावेज जरूरी हैं, इसलिए जानकारी नहीं दी जा सकती. असल में फैसला लेने के लिए मूल दस्तावेज जरूरी थे जबकि आरटीआइ के तहत उनकी सत्य प्रतिलिपि मांगी गई थी.

एक एनजीओ से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता रोली शिवहरे कहती हैं, ''सूचना अधिकारियों का रवैया ऐसा होता है जैसे वे सूचना नहीं भीख दे रहे हों.'' भोपाल की शिवहरे ने स्वास्थ्य मंत्रालय से प्रदेश भर में टीकाकरण की जानकारी मांगी थी. इस पर उनसे हरेक जिले में आवेदन देकर जानकारी लेने को कहा गया.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमूल्य निधि कहते हैं, ''सूचना अधिकारियों की कोशिश आवेदन खारिज करने की होती है. जानकारी देते भी हैं तो 30 दिन की अवधि खत्म होने से ठीक पहले. परेशान करने की नीयत से ही जरूरी राशि जमा कराने के सात दिन बाद बुलाया जाता है जबकि सूचना पहले से तैयार रखकर उसी समय देनी चाहिए.''

कई बार असंबद्ध जानकारी दे दी जाती है. अमूल्य निधि ने नर्मदा विकास प्राधिकरण और निमाड़ में फर्जी रजिस्ट्री कांड की जांच के लिए बने झा आयोग के बीच पत्राचार सहित सभी दस्तावेजों की प्रतिलिपि मांगी थी. उन्हें पत्र तो दिए गए लेकिन दस्तावेज नहीं. इंदौर के राकेश चंदौरे ने नगर निगम से मलिन बस्ती में आवासीय इकाइयों के निर्माण संबंधी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट मांगी लेकिन यह कहते हुए इनकार कर दिया गया कि इससे अनुबंधित और व्यावसायिक हित तथा व्यापार गोपनीयता प्रभावित होगी.

हालांकि परियोजना रिपोर्ट बनाने के लिए सलाहकार को भुगतान किया गया था और अब रिपोर्ट निगम की संपत्ति है. कोठारी ने एक महत्वपूर्ण मामले में प्रदेश प्रदूषण निवारण मंडल से रामकी समूह द्वारा पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का घातक कचरा जलाए जाने संबंधी विश्लेषण रिपोर्ट की प्रति मांगी तो रिपोर्ट की फोटोकॉपी में लगने वाले खर्च की जगह पूरे विश्लेषण का खर्च बतौर शुल्क मांग लिया गया.

रोली ने उद्योग एवं वाणिज्‍य विभाग से निवेशक सम्मेलन (इन्वेस्टर्स समिट) में तैयार सहमति पत्र (एमओयू) मांगे जो यह कहते हुए नहीं दिए गए कि इससे व्यापारिक रिश्तों पर असर पड़ेगा जबकि आयोग ने इन्हें सार्वजनिक दस्तावेज मानकर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए. कोठारी कहते हैं, ''अपील करने में याचिकाकर्ता का पैसा खर्च हो रहा है लेकिन लोक सूचना अधिकारी को कोई सजा नहीं मिलती.''

देरी का कारण आयोग में स्टाफ की कमी भी है. भोपाल के आरटीआइ कार्यकर्ता अजय दुबे कहते हैं, ''कानून को राज्‍य सरकार ने ही कमजोर किया है. कर्मचारियों की मांग के बावजूद भर्ती नहीं की गई. 10 पदों में से सिर्फ 3 पदों पर ही आयुक्त हैं.''

मुख्य सूचना आयुक्त तिवारी भी अपनी पीड़ा जाहिर करते हैं, ''फिलहाल सिर्फ  दो आयुक्त इकबाल अहमद और महेश पांडे हैं, आयोग का अपना भवन तक नहीं है. निर्वाचन आयोग के भवन में चार कमरे मिले हैं, उनमें ही काम चल रहा है. स्टाफ  मिल भी जाए तो बैठाएंगे कहां? वित्त विभाग ने भवन के लिए मंजूर किए गए दो करोड़ रु. जारी ही नहीं किए.''

रतलाम के विधायक पारस सकलेचा ने विधानसभा में सवाल उठाया था कि राज्‍य सूचना आयोग में कितनी दूसरी अपीलें लंबित हैं और क्या इसका कारण स्टाफ  की कमी है? इस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माना था कि अपीलें लंबित होने का कारण सूचना आयुक्तों और स्टाफ  की कमी होना भी है. विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार 10 फरवरी, 2011 तक कुल 4,765 अपीलें लंबित थीं.

2010 में आयोग को 3,548 अपीलें की गईं जिनमें से सबसे ज्‍यादा 953 पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से संबंधित थीं. दूसरे क्रम पर नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग था जिससे संबंधित 413 अपीलें लंबित थीं. राजस्व विभाग से संबंधित 290 अपीलें और लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से संबंधित 172 अपीलें लंबित थीं.

उच्च शिक्षा विभाग के जानकारी न देने या अधूरी देने पर आयोग में की गई अपीलों की संख्या 158 और स्कूली शिक्षा विभाग से संबंधित अपीलों की संख्या 155 थीं. कोठारी कहते हैं, ''प्रथम अपीलीय अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं होने से उस पर कोई आंच नहीं आती. इसलिए इस स्तर पर निराकरण नहीं होता है और आयोग के पास अपीलों की संख्या बढ़ती जाती है.''

लोक सूचना अधिकारियों और अपीलीय अधिकारियों को सजा का डर न होना भी उनके इस रवैए का कारण है. दुबे ने 12 जुलाई, 2010 को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना में हुई अनियमितता को लेकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जानकारी मांगी थी जो उन्हें नहीं दी गई.

दुबे ने अपीलीय अधिकारी के सामने भी गुहार लगाई लेकिन दूसरी अपील के लिए आखिरकार उन्हें राज्‍य सूचना आयोग का दरवाजा ही खटखटाना पड़ा. साल भर बाद 9 अगस्त, 2011 को आयोग में सुनवाई हुई जिसमें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के लोक सूचना अधिकारी को 15 दिन के भीतर चाही गई जानकारी से जुड़े मूल अभिलेख पेश करने के निर्देश दिए लेकिन यह अवधि बीत जाने के एक माह बाद भी अभिलेख पेश नहीं किए गए जबकि आयोग का फैसला अंतिम और बंधनकारी होता है.

दुबे कहते हैं, ''आयोग के निर्देश हवा में उड़ा दिए गए. आयोग के पास अवमानना का मामला सुनने की ताकत नहीं है. अधिकारियों ने नियमों की आड़ लेकर कानून को लाचार बना दिया है.''

वैसे आयोग के पास 25,000 रु. तक आर्थिक दंड (शास्ति) लगाने का अधिकार है और वह जानबूझ्कर सूचना छिपाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ  कार्रवाई की सिफारिश भी कर सकता है. लेकिन विधानसभा में दी गई जानकारी से पता चलता है कि 2010 में मात्र एक अधिकारी पर अर्थदंड लगाया गया.

रोली कहती हैं, ''कई मामलों में अपीलकर्ता जानबूझ कर सूचना रोकने के प्रमाण दे रहे थे लेकिन अर्थदंड लगाने की पुख्ता वजहें नजरअंदाज कर दी गई.'' वे सूचना आयुक्त  इकबाल अहमद पर आरोप लगाते हुए कहती हैं, ''वे तो अर्थदंड लगाए जाने का कारण बताओ नोटिस तक नहीं देते हैं. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को हतोत्साहित करते हुए लोक सूचना अधिकारी का पक्ष लेते हैं.''

इस पर तिवारी सफाई देते हैं, ''आयोग राजस्व इकट्ठा करने वाला विभाग नहीं है इसलिए अर्थदंड पर जोर नहीं दिया जाता. इस कानून का उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि सूचना उपलब्ध कराना है. अर्थदंड का नोटिस देने से लोक सूचना अधिकारी हतोत्साहित होता है.'' डॉ. राय एक और पहलू की ओर ध्यान खींचते हैं, ''80 फीसदी मामलों में सूचना समय पर नहीं मिलती इसीलिए इसे मुफ्त दिया जाता है.

इसका बोझ सरकारी खजाने पर पड़ रहा है लेकिन फिर भी किसी की जिम्मेदारी तय नहीं. सूचना छिपाने पर लोक सूचना अधिकारी की गोपनीय रिपोर्ट में यह तथ्य दर्ज किया जाना चाहिए.''

सूचना छिपाने के लिए आवेदन में हेरफव्र तक के उदाहरण हैं. गौतम कोठारी ने 21 फरवरी, 2007 को सूचना पाने के लिए आवेदन दिया. जानकारी न मिलने पर अपील की लेकिन अपीलीय अधिकारी के सामने उनके आवेदन में फव्रबदल कर उसे 21 अप्रैल, 2007 को दिया बताया गया.

आयोग ने कोठारी के पास मौजूद पावती देख आवेदन 21 फरवरी को ही दिया पाया लेकिन इस आपराधिक कृत्य में लिप्त कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. उच्च स्तर पर की गई शिकायत के बाद जांच की औपचारिकता हुई और कर्मचारी को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया.

आरटीआइ कानून के दुरुपयोग की शिकायतें भी हैं. इसे ब्लेकमेलिंग का जरिया भी बनाया गया है. तिवारी कहते हैं, ''कानून का दुरुपयोग रोकना बेहद जरूरी है.'' दुबे इससे सहमति जताते हुए सुझाव देते हैं, ''विधानसभा में उठाए गए सवालों की तरह इसमें चाही गई जानकारी और संबंधित आवेदनों को सार्वजनिक करना चाहिए, इससे ब्लैकमेलिंग की शिकायतों में कमी आएगी.

ब्लैकमेल करने वाले जानकारी नहीं मिलने पर भी आयोग के सामने लिखकर देते हैं कि जानकारी मिल गई.'' आरटीआइ कार्यकर्ता कहते हैं कि आरटीआइ आवेदनों की विभागवार समीक्षा होनी चाहिए, इसकी भी मासिक या सालाना रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए.

व्यापक प्रचार-प्रसार के अभाव में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, इस कानून को लेकर जागरूकता की कमी है. दुबे कहते हैं, ''इसे स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए.''

वहीं कोठारी कहते हैं, ''आरटीआइ आवेदन और जानकारी देने की व्यवस्था ऑनलाइन हो जाए तो लोगों की भागीदारी बढ़ जाएगी.'' तय किया गया था कि एनजीओ आरटीआइ के तहत जानकारी देने के लिए पूरा सेटअप तैयार करेंगे और सूचना देंगे तभी उन्हें सरकारी अनुदान मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. रोजगार गारंटी योजना में आरटीआइ को लोकप्रिय बनाने के लिए एक कॉलसेंटर बनाने की योजना थी, इसे भी फाइलों में दबा दिया गया.

तमाम रुकावटों के बावजूद सूचना आयोग ने सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने, छात्रों को उत्तर पुस्तिकाएं दिखाने , गोपनीय रिपोर्ट दिखाए जाने और सेवा रिकॉर्ड दिखाए जाने जैसे आदेश पारित किए हैं, जो देश भर में मिसाल बने हैं.

-साथ में ग्वालियर से समीर गर्ग

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