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उप-निरीक्षक जो न्यायाधीश बन गया

ओ.पी. सैनी बहुत कम बोलते हैं. 2जी मामले की सुनवाई के लिए खास तौर पर चुना गया यह पूर्व पुलिसकर्मी आसानी से प्रभावित नहीं होता

कनिमोलि कनिमोलि

उन्हें जो कहना होता है, सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश ओमप्रकाश सैनी अपनी कलम से कहते हैं. 2जी स्पेक्ट्रम मामले में द्रमुक सांसद कनिमोलि और सात अन्य अभियुक्तों को जमानत न देने के उनके 34 पृष्ठों के फैसले में कई कठोर बातें दर्ज थीं. यह आश्चर्यजनक इसलिए है कि वे अदालत में ज्‍यादा बात नहीं करते.

16 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

कम ही लोग जानते हैं कि 57 वर्ष के सैनी ने अपना कॅरिअर दिल्ली पुलिस में उप निरीक्षक के रूप में शुरू किया था. 1981 के बैच के कोई 100 उप-निरीक्षकों में से, वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने कानून में गहरी रुचि दिखाई थी. उनके बैच के एक साथी याद करते हैं, ''माना जाता है कि हम सबको भारतीय दंड विधान की कामकाजी जानकारी होनी चाहिए, पर सैनी उन लोगों में से थे, जो गहराई तक गए.'' हरियाणा निवासी सैनी पुलिस में छह साल तक काम करने के बाद न्यायिक दंडाधिकारी की परीक्षा में बैठे. उस समय परीक्षा देने वाले अपने साथ के लोगों में से चयनित होने वाले सैनी अकव्ले थे.

जब सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति ए.के. गांगुली की खंडपीठ ने सरकार को 2जी मामले से निबटने के लिए विशेष अदालत के गठन का निर्देश दिया, तो इसकी सुनवाई के लिए सैनी को खास तौर पर चुन लिया गया. 28 मार्च को दिल्ली सरकार ने उन्हें 2जी के सारे मामलों की सुनवाई करने के लिए नियुक्त कर दिया.

9 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
2 नवंबर 201: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

उस समय तक सीबीआइ के विशेष रूप से नियुक्त जज सैनी कॉमनवेल्थ खेलों से संबंधित मामलों की सुनवाई करके सुरेश कलमाडी के साथी ललित भनोत, वी.के. वर्मा, के.यू.के. रेड्डी, प्रवीण बख्शी और देयरूकर शेखर को सलाखों के पीछे भेज चुके थे. वे भ्रष्टाचार के एक मामले में अभियुक्त नाल्को के अध्यक्ष ए.के. श्रीवास्तव को जमानत देने से भी इनकार कर चुके थे.

2जी घोटाले से पहले सैनी का सबसे बड़ा मामला लाल किले में हुई गोलीबारी का था, जिसमें उन्होंने मुख्य अभियुक्त मुहम्मद आरिफ को फांसी और छह अन्य को उम्र कैद की सजा सुनाई थी. 22 दिसंबर 2000 को लाल किले की घटना में मुहम्मद आरिफ और उसके साथियों ने इस स्मारक पर धावा बोलकर सेना के एक शिविर पर हमला कर दिया था, जिसमें तीन जवान मारे गए थे.

19 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
12 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
 
5 अक्‍टूबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यह मामला सैनी को सन्‌ 2000 में मिला जब उसकी सुनवाई कर रहे न्यायाधीश (एम.एस. सब्बरवाल) सेवानिवृत्त हुए. जटिल होने की वजह से कम-से-कम दो न्यायाधीशों ने यह मामला लेने से इनकार कर दिया था. इसके साथ पांच मामले जुड़े थे और इसके 300 गवाह थे, और सुनवाई नए सिरे से शुरू होनी थी.

इस मामले में जांच अधिकारी रहे रिटायर्ड पुलिसकर्मी सुरेंद्र संड याद करते हैं, ''उन्होंने सारे मामले की सुनवाई एकाग्रता से की. वे बहुत दृढ़ थे और अभियुक्तों को खराब व्यवहार करके बच निकलने नहीं देते थे. ऐसे मौके भी आए जब आरिफ के वकील ने अदालत में एक पुलिस-कर्मी को चांटा मारकर सांप्रदायिक चाल चली थी, लेकिन न्यायाधीश इससे विचलित नहीं हुए.''

28 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
21 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे
7 सितंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

अक्तूबर 2005 में सैनी ने आरिफ को फांसी की सजा सुनाई, जिसे हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट  दोनों ने बरकरार रखा था. यहां तक कि 2जी मामले की सुनवाई के दौरान भी सैनी का ध्यान पूरी तरह इसी मामले पर रहता है और वे अपनी अदालत में भीड़ लगाने वाले अभियुक्तों की ऊंची हैसियत की अनदेखी किए रहते हैं. एक अभियुक्त के वकील का कहना है, ''वे सारी बहस को बहुत गौर से सुनते हैं. जब कनिमोलि के वकील विशेष व्यवहार की मांग करते हैं, तो वे सहानुभूतिपूर्ण नजर आते हैं. लेकिन वह दिखावा भर होता है.'' काम से काम रखने वाले न्यायाधीश अपने सलाहकार खुद ही हैं.

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