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लो! शहर गया अब जंगल में

तीस साल पुरानी अधिसूचना पर अब गया जंगलात महकमे का ध्यान. लागू होने की बारी आई तो बूंदी वालों के हाथ-पांव फूले

बूंदी शहर बूंदी शहर

इन दिनों खासा हड़कंप मचा हुआ है बूंदी शहर और आसपास के इलाके की आबादी में. इसे शहर के विकास में अवरोध माना जाए या आपदा? समस्या गंभीर है. बीते 30 वर्षों से सो रहे वन विभाग के एकाएक जागने से यह विकराल रूप सामने आया है.

लापरवाही, भ्रष्टाचार, अनैतिक गठजोड़ और लकीर पीटने की प्रवृत्ति ने पर्यटन नगरी के रूप में तेजी से विकसित हो रहे बूंदी शहर के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा दिया है. अनजानी आशंका से भयभीत शहर के आम आदमी की जबान पर बस एक ही चर्चा हैः ''अब तो शेर (नाहर) बेगड्या ही शहर में रेवेगा तो अपण कठी जावॅगा?''

हाल ही में बूंदी शहर के एक बड़े हिस्से (लगभग पूरे शहर) को रामगढ़ विषधारी अभयारण्य की सीमा में मानते हुए यहां वानिकी से इतर के कामों के लिए भूमि आवंटन और खरीद-फरोख्त के पंजीयन पर रोक लगा दी है. आदेश के बाद यहां उप-पंजीयन कार्यालय ने आई अर्जियों को लौटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

नगरपालिका ने भी वन महकमे की बताई सीमा में पट्टों और निर्माण की स्वीकृति पर रोक लगा दी है. ये आदेश 1972 के वन्यजीव कानून की धारा 20 के तहत निकाली गई अधिसूचना पर पंजीयन और मुद्रांक विभाग के अतिरिक्त महानिरीक्षक ने जारी किए हैं.

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पिछले मंगलवार को अभयारण्य क्षेत्र से जुड़े वन अधिकारियों को नैनवां रोड क्षेत्र में निर्माण कार्य होता नहीं मिला तो काम पर जाते मजदूरों को ही बटोरकर पूछताछ के लिए दफ्तर बुलवा लिया. अधिकारियों ने बताया कि अभयारण्य क्षेत्र में न तो कोई निर्माण कराया जा सकता है और न ही पूर्व में निर्मित स्थलों पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो सकती हैं.

एक पखवाड़े बाद देवउठनी एकादशी है लेकिन बाणगंगा रोड स्थित माहेश्वरी भवन, चमन-ए-सब्जबाग, होटल वृंदावती, जैन नसियां, महेश वाटिका के साथ नैनवां रोड सामुदायिक भवन और कई मैरिज गार्डन अभयारण्य क्षेत्र में आने के कारण यहां शादी और दूसरे कार्यक्रम भी नहीं हो सकेंगे.

वन विभाग के कारिंदे घूम-घूमकर लोगों को सूचनाएं भी दे चुके हैं. तमाम मकानों के निर्माण कार्य बीच में ही रुक गए हैं. जमीन की बढ़ती कीमतें स्थिर होने के साथ ढलान पर हैं.

यह स्थिति आखिर उत्पन्न कैसे हुई? जानकारों के मुताबिक, राज्‍य सरकार ने 1982 में 20 मई को एक अधिसूचना जारी कर बूंदी शहर और इससे सटे दलेलपुरा, ठीकरदा, बोरखेड़ा, आकोदा, फजलपुरा, नयागांव, भैरूंपुरा, गुढ़ासदावर्तिया, डाबेटा, विषधारी, कालानला, नंदगांव बस्ती समेत 18 गांव अभयारण्य की सीमा में घोषित कर दिए.

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बूंदी शहर के नैनवां रोड, जैतपुर, बूंदी-जयपुर राजमार्ग पर फूलसागर रोड तक के रिहाइशी इलाके भी इसमें शामिल थे. इतना ही नहीं रीको औद्योगिक क्षेत्र, रजतगृह कॉलोनी, आइटीआइ, बहादुरसिंह सर्कल बाइपास, शहर का मुख्य बाजार, इंद्रा मार्केट, बालचंद पाड़ा बाइपास इलाकों को भी इसमें शुमार किया गया है. बालचंद पाड़ा क्षेत्र वास्तविक पुरानी बूंदी है, जहां 400-500 पुरानी हवेलियां हैं और इन दिनों पर्यटन व्यवसाय का केंद्र.

अभयारण्य क्षेत्र 307 वर्ग किमी में फैला बताते हैं. इसमें से 215.6 वर्ग किमी जमीन वन विभाग की है. अभयारण्य क्षेत्र का 20 फीसदी हिस्सा अब रिहाइशी इलाके में बताया जा रहा है. एक तो वन महकमे का नासमझी भरा फैसला और दूसरे अब उसके कुंभकर्णी नींद से जागने के बाद लकीर पीटने से शहर का तो पूरा विकास ही थम सकता है.

महकमे ने अब सभी तरह के विकास कार्यों को रुकवाकर वन्यजीव संरक्षण योजनाएं लागू करने का मानस बनाया है. उसने यहां निर्मित सभी पट्टा और रजिस्ट्रीशुदा मकानों को भी अवैध घोषित कर दिया है. बेचान, खरीद और रजिस्ट्री पर रोक लगाने से शहर के लोगों में भारी असंतोष और गुस्सा है.

क्षेत्रीय रेंजर सुरेश मिश्र ने घोषित क्षेत्र में निर्मित सभी कॉलोनियों और गांवों के रिहायशी क्षेत्र को अवैध बताते हुए इन इलाकों में इक्जिस्टेंस की अवधारणा पर काम करने की बात कही. मिश्र कहते हैं, ''सभी निर्माण अवैध हैं. वन विभाग अपनी कार्रवाई के लिए अधिकृत है.''

राजस्थान राज्‍य वन संरक्षण बोर्ड के सदस्य राजपाल सिंह ने अभयारण्य क्षेत्र में मानव विकास और रिहायशी निर्माण कार्यों को मिलीभगत का नतीजा बताते हुए अवैध करार दिया है. अभयारण्य क्षेत्र में आने वाले नवनिर्मित रिहायशी इलाकों में अधिसूचना के बावजूद बेचान और खरीद स्पष्टीकरण के लिए राज्‍य वन विभाग के सचिव ने 7 जुलाई को जिला कलेक्टर को चिट्ठी भी लिखी थी.

इस मामले में छात्र नेता रूपेश शर्मा की अगुआई में एक दर्जन गांवों के किसानों ने ज्ञापन देकर वन विभाग की मनमानी पर रोक लगाने की मांग की है. दूसरे कई संगठनों ने भी कलेक्टर को ज्ञापन दिए हैं. शहर के लोगों का कहना है कि वन विभाग की इस विसंगति को लेकर किसी नेता ने ठोस अंदाज में विरोध दर्ज नहीं कराया है.

युवा कांग्रेस नेता सत्येश शर्मा कहते हैं, ''मसला वाकई गंभीर है और दीपावली के बाद एक सर्वदलीय आंदोलन शहर के हित में किया जाएगा.'' बूंदी के भाजपा विधायक अशोक डोगरा ने भी चेतावनी दी है कि ''विधानसभा सत्र से पहले मामला न निबटा तो वे विधानसभा में धरना देने के साथ ही सरकार के सामने भूख हड़ताल शुरू कर देंगे.

पर प्रशासन आखिर क्या कर रहा है? जिला कलेक्टर आरती डोगरा ने इंडिया टुडे को बताया कि 'एडीएम (सीलिंग) की अगुआई में राजस्व महकमे और वन विभाग का संयुक्त सर्वे दल गठित किया गया है.

इसमें तहसीलदार, भूअभिलेख निरीक्षक, पटवारी, वन विभाग के अमीन सहित और लोगों को शामिल किया गया है, जो अभयारण्य सीमा के तहत बूंदी शहर के क्षेत्रों का खसरा नंबरवार सर्वे करके रिकॉर्ड समेत रिपोर्ट पेश करेंगे.

इसी के आधार पर राज्‍य सरकार को रिपोर्ट भेजी जाएगी. सर्वे शुरू हो गया है, पर 18 गांवों और शहर की आधी आबादी अब क्या वन्यजीवों का सा व्यवहार सहने के साथ-साथ विकास को भी तरसेगी?

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