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दिल्ली की जज्‍बाती तहरीर

अपनी इस किताब के जरिए निर्मला जैन ने यह एहसास शिद्दत के साथ कराया है कि दिल्ली जैसे शहर को किस तपाक से देखें. इस किताब का (और लेखिका का) कमाल यह है कि भुला दी गई दिल्ली और दिल्ली की रवायतें, जिंदगी की कद्रें, बोली-बानी, गली-कूचे, मोहल्ले और आपसदारियां-एक बार फिर जिंदा हो उठती हैं.

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संस्मरण
दिल्ली
शहर दर शहर
निर्मला जैन
राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, 
नई दिल्ली-2
कीमतः 250 रु.

पुरानी दिल्ली में न्नगालिब स्मारक

अपनी इस किताब के जरिए निर्मला जैन ने यह एहसास शिद्दत के साथ कराया है कि दिल्ली जैसे शहर को किस तपाक से देखें. इस किताब का (और लेखिका का) कमाल यह है कि भुला दी गई दिल्ली और दिल्ली की रवायतें, जिंदगी की कद्रें, बोली-बानी, गली-कूचे, मोहल्ले और आपसदारियां-एक बार फिर जिंदा हो उठती हैं. जैन ने जिस जद्ग़बे, एहतराम और अनुभवों के साथ दिल्ली को तहरीर किया है, उसका तसव्वुर, तिलिस्म-सा रच देता है. गली-कूचे, राहगु.जर, सड़कें, इमारतें, हवेलियां-केवल विवरण नहीं हो जातीं. उनके पसःमंजर, किस्सागोई भी है, जो कशिश पैदा करती है. उन्होंने दिल्ली के दिल को अपनी भाषा में उतारा. और बड़ी सलाहियत के साथ, दिल्ली की आत्मा तक पहुंचीं. दिल्ली शहर को वे उसके जुगराफिए तक सीमित नहीं रखतीं, तवारीश् और तहरीक तक पहुंचती हैं. इस तरह का लेखन, शहरनामा न होकर, अपने काल और युग की धड़कनों को महसूस कराता है.

मोहल्लों, कूचों की संरचना के अतिरिक्त, रहन-सहन रख-रखाव, नाम-लिहा.ज, हिंदू-मुसलमानों के बीच खूबसूरत संबंधों पर लेखिका कम लफ्ज़ों में, लेकिन स्मृतियों की गर्मजोशी के साथ लिखती चली गई हैं. वे बताती हैं कि पुरानी दिल्ली के निवासियों में  मुसलमानों के अतिरिक्त, खत्री, जैन, बनियों, कायस्थों के भी घर थे. लेकिन सबका संबंध आपस में तपिश भरा था.

यह लेखिका के शानदार अनुभवों और संस्मरणों की किताब है. शुरू के चार-पांच अध्याय पुरानी दिल्ली की संस्कृति और जीवन शैली को लेकर लिखे गए हैं. इस किताब का ये हिस्सा बेमिसाल है. बाद में लेखिका का रंज भी महसूस होने लगता है, जब वह बदहवास लोगों की बदहवास और (बेतरतीब) दिल्ली के विषय में अपने ख्यालों का इ.जहार करती हैं. इसके बावजूद, 14 अध्याय में दिल्ली के नक्श और नक्शेकदम तथा कोने-खित्तों और रग-रेशे की पड़ताल जितनी यथार्थवादी है उतनी नफीस भी. पुरानी दिल्ली पर लिखते हुए लेखिका ने तिलिस्म रचा है, तो नई दिल्ली (ल्युटन की दिल्ली) के तामीर होने का विवरण जितना ऐतिहासिक है, उतना रोचक भी.

जैन के लेखन की विशेषता यह भी है कि वे सूचनाओं का जाल नहीं बिछातीं. सूचना और ज्ञान का फर्क वे समझ्ती हैं. इसलिए यह किताब, दिल्ली की सूचनाओं को नकारती हुई दिल्ली का ज्ञान हो जाती है. जैन के पास स्मृतियों का सरमाया है और परिपक्व अनुभव. इन्हीं तत्वों से वह दिल्ली को ढूंढ़ने निकल पड़ती हैं-पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक से दिल्ली के खेल गांव और उसके बाद तक की दिल्ली तो इधर वैशाली-पीतमपुरा. जहां जैन का घर था और आमदर.फ्त का इतना शोर कि घर बदलना पड़ा.

जैन आजादी के बाद की सूरतेहाल बयान करती हैं-दंगे, शरणार्थियों का आगमन, गांधीजी की हत्या, दिल्ली का बेतरतीब फैलते चले जाना (गौरतलब है कि  वे शरणार्थियों की कहीं बेकद्री नहीं करतीं). सच तो यह है कि पूरी किताब में वे इंसानी मूल्यों को समझ्ती हैं और उन 'कद्रों' की तलाश उनकी दिल्ली की तलाश है. जैन 'सेकुलर एथिक्स' तथा 'लिव-टुगेदर' की भावना को बार-बार, बड़े सच्चेपन के साथ व्यक्त करती हैं.

पुरानी दिल्ली के बाद जब लेखिका-सियासत और शिक्षा और दिल्ली के बदलते जीवन शिल्प की बात करती हैं तो उनकी अपनी भाषा भी बदली-बदली न.जर आती है. कहीं अखबारी दस्तावेज हैं, कहीं डायरीनुमा टिप्पणियां, तो कहीं संस्मरण. डॉ. नगेंद्र, डॉ. नामवर सिंह अजित कुमार, शीला संधु (राजकमल की सर्वेसर्वा) भारतभूषण अग्रवाल और मॉडल टाउन की शामें और अदबी नशिस्तें. वे किसी जीवंत संस्मरण की तरह हैं. ऐसे संस्मरण किसी दस्तावे.ज की तरह पढ़े (और रखे) जा सकते हैं.

शिक्षा जगत, दिल्ली विश्वविद्यालय और साहित्य की, इस किताब में लेखिका ने शानदार जगह बनाई है. आपात्‌काल के डरावने दौर पर लिखते हुए लेखिका ने कई महत्वपूर्ण लेखकों (नाम भी तहरीर किए गए हैं) की अवसरवादिता पर सांकेतिक चुटकी ली है. आपात्‌काल के समर्थन के विषय में वे लिखती हैं, ''उन दिनों लेखकों/पत्रकारों को इस काम के लिए, घेर कर ले जाने का दायित्व श्रीकांत वर्मा ने ओढ़ रखा था.'' जैन ने डॉ. नगेंद्र पर बहुत विस्तार से लिखा है. उनका तानाशाह रवैया, उनकी धज, अड़ियल रुख सब पर लेखिका ने साफगोई से लिखा है. लेकिन इस रंजीश, संजीदा और कशीदा वातावरण के बरक्स दूसरा वातावरण भी है जिसमें डॉ. नामवर सिंह जैसी बाशऊर शख्सियत की उपस्थिति है तो अजित कुमार और भारतभूषण अग्रवाल भी हैं. बाद का लेखन जैन के साहित्य संस्मरणों की गूंज और लय और रिद्म में बदल जाता है जिसमें अदबी शख्सियतों के बीच, गर्मजोशी भरी मित्रताएं...हबीब और र.कीबवाला अंदाज भी है लेकिन कटुताएं बिलकुल कम.

जैन ने दिल्ली विश्वविद्यालय पर खूब सारा लिखा. खूबसूरत गद्य! लेकिन जेएनयू और जामिया छूट गए. दरियागंज के किताबों वाले पटरी बा.जार को भी उन्होंने छोड़ दिया. अच्छा होता अगर वे विश्व पुस्तक मेलों की तपिश भरी उपस्थिति पर भी कुछ लिखतीं. इंडिया इंटरनेशनल पर तो उन्होंने काफी कुछ लिखा. लेकिन दिल्ली की बहुत सारी संस्थाओं का .जिक्र तक नहीं. उर्दू .जबान पर भी कुछ नहीं कहा.  

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