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कविता संग्रह: नए संबंधों की कविताएं

एक ऐसी दुनिया की तलाश मेंअरुण शीतांशवाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-2. कीमतः 200 रु. आज का हर युवा कवि पूरे सहज भाव से नई दुनिया की तलाश में लगा है. एक ऐसी दुनिया, जिसमें सिर्फ पवित्रता हो, सिर्फ निष्कलुषता हो. हिंदी के युवा कवियों की यही उत्सुकता इन्हें इस जटिल समय से लड़ने का साहस प्रदान करती रही है.

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एक ऐसी दुनिया की तलाश में
अरुण शीतांश
वाणी प्रकाशन, दरियागंज,
नई दिल्ली-2.
कीमतः 200 रु.

आज का हर युवा कवि पूरे सहज भाव से नई दुनिया की तलाश में लगा है. एक ऐसी दुनिया, जिसमें सिर्फ पवित्रता हो, सिर्फ निष्कलुषता हो. हिंदी के युवा कवियों की यही उत्सुकता इन्हें इस जटिल समय से लड़ने का साहस प्रदान करती रही है. अरुण शीतांश की कविताएं अपने पाठ के दौरान कमोबेश कुछ ऐसा ही एहसास दिलाती रही हैं.

अरुण के पहले संग्रह हुएक ऐसी दुनिया की तलाश में' की कविताएं भी ऐसी ही आग लपेटकर हमारे समक्ष खड़ी होती हैं, हाजिर होती हैं: घर के कोने में/ एक पांव पर खड़ा हूं/ तुम्हारी प्रार्थना के लिए/ ध्यान के लिए/ चैन की नींद के लिए/ ताकि  तुम रह सको/ तनाव मुक्त.

हिंदी आलोचना के दिग्गजों की मानें तो कविता की सामाजिक उपयोगिता समाप्त-सी है. परंतु हमारे आलोचक यह बताने से कतराते रहे हैं, गुरेज करते रहे हैं कि साहित्य की कौन-सी विधा है जिसकी सामाजिक उपयोगिता बची हुई है? कविता को लेकर आलोचकों का यह संकोच समझ से परे है.

अरुण अपनी कविता 'चांद की चोरी' में कहते भी हैं: किसी ने सत्य की चोरी की/ चोरी की झूठ की/ प्यार की/ शायद सबने मिलकर चोरी की/ चोरी की झूठ की/ प्यार की/ शायद सबने मिलकर चोरी की/ देश की. शायद हमारे आलोचक भी समकालीन हिंदी कविता के साथ ऐसा ही कुछ कर रहे हैं.

जहां तक अरुण की कविताओं का प्रश्न है तो उनकी कविताएं समय के महत्व को, समय के परे के महत्व को रेखांकित करती हुई चलती हैं. हां, यह भी सत्य है कि अरुण के कवि व्यक्तित्व की अपनी एक सीमा रेखा है जिससे वे आगे नहीं निकल पाते. दरअसल, अरुण कविता जैसी महत्वपूर्ण विधा को बहुत हल्के से लेते हुए दिखाई देते हैं.

यह अरुण से ज्‍यादा कविता के लिए खतरनाक है. हालांकि इस संग्रह में उनकी 'बाबूजी', 'पृथ्वी की पीड़ा', 'छाई', 'मामा का मचान' आदि कविताएं आम आदमी के संघर्ष और पीड़ाओं को विविध रूप में एकदम स्वाधीन होकर प्रकट करती हैं. इससे यह भी उजागर होता है कि अरुण का अनुभव, अन्वेषण, सर्जक हमारे समय का पूरा लेखा-जोखा रखे है.

हालांकि वरिष्ठ कवि अरुण कमल लिखते हैं कि ''अरुण शीतांश का यह पहला कविता संग्रह नैसर्गिक प्रतिभा, वैचारिक प्रतिबद्धता एवं भविष्य के स्वप्नों का जीवंत प्रकाश है'' परंतु असल में अरुण शीतांश को यानी उनके कवि-व्यक्तित्व को अभी समकालीन हिंदी कविता से बहुत कुछ सीखना है, काफी कुछ हासिल करना है. इसलिए कि कविता में ठंडापन कवि को नु.कसान ही पहुंचाता है. अरुण को भाषा और मुहावरे पर भी ध्यान देना चाहिए.

बावजूद इसके, अरुण की कविताएं हमें समृद्ध ही करती हैं. अशोक वाजपेयी ने कभी विनोद कुमार शुक्ल की कविता पर विचार प्रकट करते हुए लिखा था कि ''कविता का काम चीजों के बीच नए संबंध खोजना है, वहीं चीजों को उनकी स्वतंत्र सत्ता में देखना भी है.'' अरुण अपनी कविताओं में ऐसा कर पा रहे हैं, यह सुखद है.

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