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बिहार: कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर तनातनी

राज्‍यपाल ने राज्‍य के छह विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति की. दूसरी ओर बिहार के मानव संसाधन विकास मंत्री पी. के. शाही ने कुलपतियों की नियुक्ति को गैर-कानूनी बताया.

कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर तनातनी कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर तनातनी

राज्‍यपाल ने राज्‍य के छह विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति की. दूसरी ओर बिहार के मानव संसाधन विकास मंत्री पी. के. शाही ने कुलपतियों की नियुक्ति को गैर-कानूनी बताया.

राज्‍यपाल देवानंद कुंवर के राज्‍य के छह विश्वविद्यालयों में नियमित कुलपति (वीसी) और प्रो-कुलपति की नियुक्ति करने से सात महीने से जारी गतिरोध खत्म हो गया है. लेकिन राजभवन और बिहार सरकार के बीच परस्पर विश्वास में लगातार आ रही कमी की समस्या अब भी बरकरार है, संभवतः दोनों पक्षों के बीच खाई और गहरा गई है.

बहरहाल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन नियुक्तियों को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा है, लेकिन राज्‍य के मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्री पी.के. शाही ने इन्हें ''गैर कानूनी'' करार दिया है. संयोग से, शाही, जो पूर्व महाधिवक्ता भी हैं, इस मुद्दे पर पहले भी राज्‍यपाल की आलोचना करने से पीछे नहीं रहे हैं. शाही ने राज्‍यपाल की आलोचना करते हुए कहा कि नियुक्तियों से पहले राजभवन ने राज्‍य सरकार से अनिवार्य परामर्श को कोई तवज्‍जो नहीं दी. राज्‍य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति कुंवर और नीतीश के बीच 17 जुलाई को बैठक हुई थी. इसमें उन आरोपों पर बात हुई थी जिनमें कहा गया था कि राजभवन उच्च शिक्षा की राह में आ रहा है. बड़े स्तर पर माना जा रहा है कि बेशक मुलाकात के दौरान कुलपति की नियुक्तियों को लेकर चर्चा हुई थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने बैठक के दौरान कुलपति पद के लिए किसी भी नाम पर चर्चा नहीं की थी.

गुवाहाटी हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपनी वकालत के जौहर दिखा चुके राज्‍यपाल कुंवर इस बात से काफी हद तक सहमत नजर आते हैं कि कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर मुख्यमंत्री के साथ उनकी दो मुलाकातें परामर्श की शर्त को पूरा कर देती हैं. कहा जा रहा है कि मानव संसाधन विकास के भेजे गए नामों के पैनल में से किसी भी नाम को न चुने जाने से शाही नाराज हैं, वहीं विश्वविद्यालय के सूत्र तर्क दे रहे हैं कि नियम एचआरडी को नाम भेजने के लिए योग्य नहीं बनाते हैं. राज्‍यपाल सचिवालय का मानना है कि सरकार अवश्य ही परामर्श प्रक्रिया के दौरान कुछ नाम सुझा सकती है, लेकिन कुलाधिपति के लिए यह बाध्य नहीं है कि वे उन नामों को लेकर राजी हों.

राज्‍यपाल ने शंभू नाथ सिंह को पटना विश्वविद्यालय का नया कुलपति नियुक्त किया है. इससे पूर्व वे इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) के स्कूल ऑफ जर्नलिज्‍म ऐंड मीडिया स्टडीज में विभाग प्रमुख थे. उनके अलावा अरुण कुमार को मधेपुरा के बीएन मंडल विश्वविद्यालय, अरविंद पांडे को दरभंगा के कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, राम विनोद सिंह को छपरा के जेपी विश्वविद्यालय, कुमार विमल को मुजफ्फरपुर के भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय और शम्सु जोहा को पटना की मौलाना मजहरूल हक अरेबिक और पर्सियन यूनिवर्सिटी का कुलपति नियुक्त किया गया है.

इन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का कार्यकाल इस साल जनवरी में ही खत्म हो गया था. कुलपतियों की मौजूदा नियुक्तियां इस संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण हैं कि पिछले सात महीने से कार्यवाहक कुलपति इन विश्वविद्यालयों को चला रहे थे क्योंकि राज्‍य सरकार और राजभवन के बीच एक राय नहीं बन पा रही थी, जिस कारण से मतभेद खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे.

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राज्‍यपाल के पक्ष में आवाज बुलंद कर इस मसले को राजनैतिक रंग देने की कोशिश भी की. कांग्रेस नेता रंजीता रंजन कहती हैं, ''राज्‍यपाल के राज्‍य के विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति होने के कारण कुलपतियों की नियुक्ति उनका अधिकार होता है. राजग नेता इसे मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. राजग के राज्‍यपाल के पद के महत्व को कम करने के प्रयासों को कांग्रेस कतई बर्दाश्त नहीं करेगी.'' इससे पूर्व, जद (यू) प्रवक्ता और राज्‍यसभा सदस्य शिवानंद तिवारी मंगलवार को प्रधानमंत्री से मिले थे और कुंवर के राज्‍य सरकार से परामर्श के बिना कुलपति नियुक्त करने के लगातार प्रयासों की शिकायत की थी.

उधर, युवा कांग्रेस अध्यक्ष ललन कुमार ने बिहार के राज्‍यपाल के संवैधानिक अधिकार पर सवाल उठाने की राजग की कोशिशों की आलोचना की है. राज्‍य सरकार और राज्‍यपाल के बीच विश्वास में कमी का यह कोई नया मामला नहीं है. बेशक शासन नीतीश कुमार का हो या लालू प्रसाद, भगवत झा आजाद और यहां तक कि राज्‍य के पहले मुख्यमंत्री एस. के. सिन्हा का रहा हो, राज्‍य को बमुश्किल ही सरकार और राज्‍यपाल में सौहार्द्रपूर्ण संबंध कभी देखने को मिले हैं. इसे विडंबना ही कहेंगे कि राज्‍य की उच्च शिक्षा के लिए यह कतई अच्छी खबर नहीं है.

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