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योगी आदित्यनाथ का राजयोग

यूपी में भाजपा ने हिंदुत्व के प्रतीक योगी आदित्यनाथ को सूबे की बागडोर सौंप दी, लेकिन चुनावी घोषणाओं और सपा की योजनाओं से खजाने पर बढऩे वाले बोझ में सामंजस्य बनाना आसान नहीं दिखता.

मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकारियों के साथ योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकारियों के साथ योगी आदित्यनाथ

सत्ता बदलते ही कैसे शासन के ढंग बदल जाते हैं, बूचडख़ानों पर कार्रवाई यह साफ जाहिर करती है. पिछले वर्ष अप्रैल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जब राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सूबे में चल रहे बूचडख़ानों का ब्योरा तलब किया तो चौंकाने वाली बात सामने आई थी. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एनजीटी को बताया था कि सूबे में चल रहे 126 बूचडख़ानों में केवल एक के पास ही संचालन की अनुमति है.

एनजीटी के सख्त रुख के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने फौरन सभी अवैध बूचडख़ानों पर कार्रवाई करने का आदेश दिया लेकिन अधिकारी इस पर कुंडली मार कर बैठ गए. इस मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लपक लिया और सरकार बनते ही सभी यांत्रिक बूचडख़ानों को बंद करने का चुनावी वादा जोर-शोर से किया. 19 मार्च को योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार ने जैसे ही सत्ता संभाली, अधिकारी अवैध बूचडख़ानों पर कार्रवाई के लिए निकल पड़े. पूरे प्रदेश में अभियान चलाकर 48 घंटे के भीतर चार दर्जन से अधिक बूचडख़ानों को सील कर दिया गया. प्रशासन की कार्रवाई के बाद इलाहाबाद, मेरठ, कानपुर में लोग विरोध में उतर आए.

अब भाजपा सरकार की असल चुनौती उन यांत्रिक बूचडख़ानों को बंद करने की है जिसका वादा उसने अपने चुनावी संकल्प-पत्र में किया है. सूबे में कुल 44 यांत्रिक (मैकेनिकल) बूचडख़ाने हैं जो स्थानीय निकाय के कानूनों के अनुसार संचालित हैं. इनसे हर वर्ष दो हजार करोड़ रु. का मांस विदेशों को भेजा जाता है. मेरठ में यांत्रिक बूचडख़ाना चलाने वाले याकूब कुरैशी कहते हैं, ''यांत्रिक बूचडख़ाने निगम ऐक्ट के मुताबिक संचालित हैं. इन्हें किसी के आदेश से बंद नहीं किया जा सकता."

भाजपा सरकार के सामने चुनौती उन 15,000 मजदूरों की भी है जिन पर बूचडख़ानों पर ताले लटकने के बाद बेरोजगार हो जाने का खतरा मंडरा रहा है. इन चुनौतियों का आभास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी था जब 20 मार्च की दोपहर तीन बजे मुख्यमंत्री कार्यालय में उन्होंने अधिकारियों के साथ पहली बैठक की. आदित्यनाथ ने बैठक में पहुंचे सभी अधिकारियों को भाजपा का चुनावी संकल्प-पत्र थमाया और उसी के मुताबिक योजनाओं का प्रस्ताव तैयार करने को कहा. निश्चित तौर पर डेढ़ दशक बाद यूपी की सत्ता में लौटी भाजपा सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनावी वादों को पूरा कर भरोसा जीतने की है.

कर्ज माफी की परीक्षा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फरवरी को लखीमपुर की चुनावी रैली में घोषणा की थी कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने पर पहली कैबिनेट बैठक में किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा. बीजेपी ने अपने चुनावी संकल्प-पत्र में किसानों का फसली कर्ज माफ करने का वादा किया है. कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 2.33 करोड़ किसान हैं जिनमें 1.85 सीमांत किसान और 30 लाख लघु किसान हैं. संस्थागत वित्त विभाग राज्य बैंकर्स समिति के जरिए किसानों पर फसली ऋण का आकलन करवा रहा है. दिसंबर, 2016 तक जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के किसानों पर कुछ 92,000 करोड़ रु. फसली ऋण है, जिसमें लघु और सीमांत किसानों का हिस्सा 61,000 करोड़ का है.

वित्त विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, ''प्रदेश की वित्तीय हालत ऐसी नहीं है जो किसानों की कर्ज माफी का जोखिम ले सकें. इससे पूरी अर्थव्यवस्था चरमराने की आशंका है जिसका असर दूसरी योजनाओं पर भी पड़ेगा." भाजपा सरकार के लिए राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार किसानों की कर्ज माफी पर राज्य की मदद करने को तैयार है. लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर डॉ. अरविंद मोहन कहते हैं, ''कर्ज माफी से किसानों का कोई भला नहीं होने वाला. सरकार किसानों की उपज को बाजार मुहैया कराकर उनकी आमदनी बढ़ाए ताकि वे अपना कर्ज स्वयं चुका सकें." केवल किसानों की कर्ज माफी ही नहीं बीजेपी की कई अन्य चुनावी वादे भी प्रदेश के खजाने पर बोझ बढ़ाएंगे. (देखें बॉक्स)

सपाई योजनाओं के भविष्य पर धुंध
इलाहाबाद में फूलपुर तहसील के माधोपुर गांव की रहने वाली रानी देवी को अपनी समाजवादी पेंशन की चिंता सता रही है. रानी के बैंक अकाउंट में पिछले एक वर्ष के दौरान छह हजार रु. आए थे जो उनके जैसे खेतिहर मजदूर के लिए एक बड़ी रकम थी. यूपी में सत्ता परिवर्तन के बाद उन योजनाओं का भविष्य अधर में लटक गया है जिन्हें समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार ने समाजवादी नाम से शुरू किया था. (देखें बॉक्स) भाजपा सरकार के लिए सबसे ज्यादा चुनौती पूर्ण उन निर्माणधीन प्रोजेक्ट को पूरा करना है जिन्हें सपा सरकार ने शुरू किया था.

 मेट्रो, लखनऊ में गोमती रिवर फ्रंट, जेपी सेंटर, आइटी सिटी, गाजियाबाद में बन रहा एलिवेटेड हाइवे जैसे कई प्रोजेक्ट पूरा होने की तय समयसीमा से काफी पीछे चल रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी चुनावी रैलियों में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे का जिक्र कर अपनी सरकार की विकास योजनाओं का पुरजोर प्रचार किया था. मैनपुरी, कन्नौज, इटावा, फिरोजाबाद जैसे समाजवादी पार्टी के गढ़ समेत 10 जिलों से होकर गुजरने वाले इस एक्सप्रेसवे से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप की जांच योगी सरकार के लिए एक चुनौती है. यह एक्सप्रेसवे कुल 60 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जिसमें सपा ने केवल 10 और बीजेपी ने 48 सीटें जीती हैं. बीजेपी सरकार के एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बताते हैं, ''सरकार सपा सरकार के दौरान निर्माण कार्यों में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक आयोग का गठन कर सकती है जिससे निर्धारित समयसीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी."

कैसे पूरा होगा हर घर बिजली का सपना
विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आमने-सामने आ गए थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी चुनावी रैलियों में सपा सरकार पर आरोप जड़ा था कि मंदिरों में तो बिजली आती नहीं जबकि दरगाहों को 24 घंटे बिजली मिलती है. अखिलेश ने भी योगी को चुनौती देते हुए कहा था कि बाबा किसी बिजली के तार को पकड़कर दिखाएं ताकि पता चले कि बिजली आ रही है कि नहीं. अब सूबे में भाजपा सरकार बनने के बाद आदित्यनाथ की सबसे बड़ी चुनौती 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हर घर में बिजली पहुंचाने की है. भाजपा के इस चुनावी लक्ष्य को पूरा करने के लिए यूपी को दो वर्ष बाद 22,000 मेगावाट बिजली की जरूरत पड़ेगी.

इसके लिए अतिरिक्त बिजली का इंतजाम करने के अलावा वितरण नेटवर्क भी दुरुस्त करना होगा. ''ऑल इंडिया पावर इंजीनियरर्स फेडरेशन" के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ''दो वर्ष के भीतर हर घर में बिजली पहुंचाने के लिए सरकार को एक करोड़ से ज्यादा नए कनेक्शन देने की चुनौती है. इसके अलावा ट्रांसमिशन सिस्टम सुधारने के लिए बड़ी संख्या में छोटे सब स्टेशन और लाइनें भी तैयार करानी होंगी" सूबे में बिजली वितरण का नेटवर्क दुरुस्त करने के लिए प्रदेश सरकार को कम से कम 10,000 करोड़ रु. के निवेश की जरूरत होगी.

बिजली विभाग के पूर्व चीफ इंजीनियर ओ.पी. पांडेय बताते हैं, ''बिजली सुधार के लिए केंद्र सरकार यूपी को 18 हजार करोड़ रु. की योजनाएं स्वीकृत कर चुकी है जबकि प्रदेश में केवल 4,000 करोड़ रु. का ही काम हो पाया है." हालांकि भाजपा सरकार बनने के बाद से यूपी भी केंद्र सरकार की ''पावर फॉर ऑल" योजना का लाभ ले सकेगा. केंद्र और राज्य सरकार के बीच हिस्सेदारी तय न होने के कारण पूर्ववर्ती सपा सरकार ने इस योजना से अपने हाथ खींच रखे थे.

भारी बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज होने वाली बीजेपी सरकार के सामने चुनावी वादों को अमलीजामा पहनाने की चुनौती है. यहीं से दो वर्ष बाद होने वाले लोकसभा चुनाव का रोडमैप तय होगा.

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