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भगदड़ मची खनन माफिया में

प्राकृतिक संपदा से भरपूर बुंदेलखंड के पहाड़ खनन माफियाओं की भेंट चढ़ गए, क्या इस पर लगेगी लगाम?

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बुंदेलखंड के महोबा जिले में अवैध खनन से छलनी डहर्रा की पहाड़ी बुंदेलखंड के महोबा जिले में अवैध खनन से छलनी डहर्रा की पहाड़ी

महोबा से करीब 10 किमी झांसी-मिर्जापुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलने के बाद सड़क के दोनों किनारों पर दिखने वाले हरे-भरे पेड़ अचानक सफेद रंग में तब्दील हो जाते हैं. वातावरण में एक धुंध-सी दिखने लगती है जो यह संकेत करती है कि हम महोबा के सबसे बड़े ब्लॉक कबरई की सीमा में दाखिल हो रहे हैं. अपनी पहाडिय़ों के लिए जाना जाने वाला कबरई इलाका पूरे बुंदेलखंड में हो रहे अवैध खनन से सबसे ज्यादा छलनी हुआ है.

इस इलाके की सीमा पर सड़क के दाहिनी ओर गुगौरा चैकी गांव आसपास हो रहे पत्थर के खनन से निकलने वाली गर्द से ढका हुआ है. गांव से गुजरने वाली काले तारकोल की सड़कें सफेद पड़ चुकी हैं. झोपडिय़ों के खपरैल पर भी सफेद धूल की परत है. ऐसी ही एक झोपड़ी में रहने वाले 80 वर्षीय कालका प्रसाद पिछले दस सालों से टीबी की बीमारी से पीड़ित हैं. इसी बीमारी से पिछले साल उनकी पत्नी भी चल बसी थीं. जानलेवा धूल के चलते दो बेटों का भरा-पूरा परिवार गांव छोड़कर महोबा में रह रहा है.

यूपी में खनन माफिया पर लगाम लगेगी?गांव से होते हुए कुछ दूर चलने पर अवैध खनन के विकराल रूप के दर्शन होते हैं. यहां कबरई की प्रसिद्ध डहर्रा की पहाडिय़ां हैं, जिन्हें खनन माफियाओं ने पाताल तक खोद डाला है. डहर्रा ही नहीं, इसी महोबा-हमीरपुर रोड पर थोड़ा आगे चलते ही मटौंध और कबरई की पहाडिय़ां भी अवैध खनन के चलते छलनी हो चुकी हैं. खनन विभाग के मुताबिक, पूरे कबरई इलाके में 50 से अधिक छोटी-बड़ी पहाडिय़ां हैं, जो अवैध खनन के चलते अपना अस्तित्व खोने की कगार पर हैं.

झांसी-मिर्जापुर राजमार्ग पर बांदा की सीमा में दाखिल होते ही सड़क के दोनों ओर बेतरतीब खड़े ट्रक और डंपर का साम्राज्य दिखाई देने लगता है. बाईं ओर बाईपास पर सड़क के किनारों पर लाल बालू का ढेर लगा है. यह वह बालू है, जिसे बारिश आने से पहले खनन माफियाओं ने केन नदी से निकालकर सड़क के किनारे जमा कर लिया था और अब उसे ट्रकों के जरिए भेजा जा रहा है. थोड़ा आगे चलते ही केन नदी दिखती है. पिछले महीने आई बाढ़ ने नदी का नजारा ही बदल दिया है. नदी के दोनों किनारे खास तरह की लाल बालू से पट चुके हैं. खनन माफिया की कुदृष्टि इन पर गड़ चुकी है, लेकिन इसी बीच 28 जुलाई को हाइकोर्ट ने प्रदेश की नदियों में हो रहे अवैध बालू खनन की सीबीआइ जांच के आदेश देकर माफिया के पांव रोक दिए हैं. डेढ़ महीने बाद 9 सितंबर को इलाहाबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलीप बी. भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने सीबीआइ जांच वापस लेने की रिकॉल अर्जी खारिज कर यूपी सरकार को झटका दे दिया.

अवैध खनन की आंच सरकार तक पहुंचने की आशंका को देखते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सरकार के सबसे विवादास्पद खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति को बर्खास्त कर दिया. हालांकि एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा हुआ है कि नदियों में अवैध बालू खनन की सीबीआइ जांच क्या खनन माफियाओं के हौसले पस्त कर पाएगी? पूरे प्रदेश में पत्थर की 3,800 खदानें हैं, जो जांच की जद में नहीं और यहां अवैध खनन अभी भी बदस्तूर जारी है.

वर्चस्व की जंग का परिणाम
खनन पर वर्चस्व के लिए माफियाओं के बीच छिड़ी जंग का नतीजा हाइकोर्ट से सीबीआइ जांच के आदेश के रूप में सामने आया है. हमीरपुर में बालू पट्टाधारक विजय द्विवेदी और बालू खनन में एकाधिकार रखने वाले समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य रमेश मिश्र के बीच अरसे से प्रतिद्वंद्विता है. मिश्र को निशाने पर रखते हुए द्विवेदी ने अपने करीबी विजय बहादुर सिंह से इलाहाबाद हाइकोर्ट में अवैध खनन के खिलाफ जनहित याचिका दायर करवाई.

पिछले साल अक्तूबर में हाइकोर्ट ने रमेश मिश्र के सभी 49 पट्टड्ढों पर हो रहे खनन को रोकने का आदेश दिया. इस फैसले को नजीर मानते हुए पूरे प्रदेश में खनन में लगे लोगों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हाइकोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर दीं. हाइकोर्ट ने सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़कर सुनवाई की और 28 जुलाई को पूरे प्रदेश में अवैध बालू खनन की सीबीआइ जांच का आदेश दे दिया. हालांकि यूपी सरकार के महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह की दलील थी कि प्रदेश में हो रहा बालू खनन अवैध नहीं है. यह कम या ज्यादा हो सकता है. विजय बहादुर सिंह ने कोर्ट से निवेदन किया कि पूरे प्रदेश में सीबीआइ जांच करवाने के बजाए जहां-जहां शिकायतें मिली हैं, वहां की जांच करवा ली जाए. इसे कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया.

उधर, 12 सितंबर को हाइकोर्ट में पेश की सीबीआइ की प्राथमिक रिपोर्ट में अवैध खनन में माफिया-अधिकारी गठजोड़ की बात कही गई है. असल में यूपी के हर जिले में अवैध खनन का एक सिंडिकेट काम कर रहा है (देखें बॉक्स). खनन विभाग के एक अनुमान के मुताबिक, पूरे प्रदेश में इसी सिंडिकेट की निगरानी में हर साल करीब 12 से 15 करोड़ ट्रक माल की अवैध ढुलाई होती है. इसके जरिए 3,000 करोड़ रु. से अधिक का अवैध खनन होता है. इंडिया टुडे ने 23 जनवरी, 2013 और 25 फरवरी, 2015 के अंक में इसी अवैध खनन के कारोबार और उसके आर्थिक ढांचे को उजागर किया था.

यूपी में ऐसे काम करता है खनन माफिया-नेता-अफसर गठजोड़मंत्री से संतरी तक आंच
अमेठी से पहली बार सपा के विधायक बने गायत्री प्रसाद प्रजापति आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव का प्रबंधन देखने के दौरान सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बेहद करीब आ गए थे. गायत्री ने लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम के विरोधियों को मैनेज करने में अपने हुनर का प्रदर्शन किया था. इसके बाद मुलायम इन पर मेहरबान रहे.

लोकसभा चुनाव के बाद लोकायुक्त कार्यालय में प्रजापति के भ्रष्टाचार की शिकायत होते ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन्हें हटाना चाहते थे, लेकिन मुलायम के आगे उनकी एक न चली. इसके बाद प्रदेश में अवैध खनन नासूर की तरह फैल गया और अब कोर्ट के आदेश से हो रही सीबीआइ जांच की आंच में मंत्री से लेकर संतरी तक के झुलसने की भूमिका तैयार हो गई है. 2012 के बाद आधा दर्जन मौके ऐसे आए, जब हाइकोर्ट के अलावा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रदेश में हो रहे अवैध खनन को रोकने के लिए सक्चत उपाय करने का आदेश दिया, पर हर बार सरकार ने डीएम और खनिज अधिकारियों के हलफनामे के जरिए बताया कि कहीं कोई अवैध खनन नहीं हो रहा है.
वैध और अवैध खनन का सबसे बड़ा अड्डा बुंदेलखंड है और यहां बालू के पट्टा खदानों की संख्या 100 से ज्यादा है. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बाकायदा अवैध बालू खनन के रंगीन फोटो और वीडियो भी सौंपे हैं. खास बात यह भी है कि इनमें से ज्यादातर वे इलाके हैं, जहां के बारे में स्थानीय डीएम और खनन अधिकारी ने कोर्ट में शपथ पत्र के जरिए अवैध खनन न होने की जानकारी दी है. क्या इसका नतीजा यह निकाला जाए कि अधिकारी भी इसमें शामिल हैं? सीबीआइ अधिकारियों और खनन माफियाओं के बीच लिंक तलाशने की कोशिश कर रही है. दो साल पहले तक खनन विभाग में तैनात रहे एक अधिकारी बताते हैं, ''अधिकारी और खनन माफिया का गठजोड़ मंत्री की निगरानी में काम कर रहा था. बालू माफिया या कारोबारियों द्वारा रॉयल्टी चोरी की जांच ठीक से हुई तो दो दर्जन से अधिक सरकारी विभाग सीधे तौर पर फंसेंगे."

खनन माफिया पर इंडिया टुडे में छपी रिपोर्ट्सखनन माफियाओं की पसंद बीजेपी
हाइकोर्ट ने अवैध बालू खनन की जांच सीबीआइ को क्या सौंपी, खनन माफिया बचाव के लिए नए सियासी ठिकाने तलाशने निकल पड़े हैं. बांदा पूरा शहर इस वक्त बीजेपी नेताओं की होर्डिंग से पटा है. बालू खनन में लगे विशंभर सिंह उर्फ लल्लू सिंह पहले सपा में थे. पिछले साल जब अवैध खनन के खिलाफ हाइकोर्ट में याचिकाएं दाखिल हुईं तो नतीजों को भांपकर उन्होंने कमल थाम लिया और जिला पंचायत सदस्य बने.

कभी मुलायम के चित्र के साथ होर्डिंग लगाने वाले विशंभर अब भगवा रंग की होर्डिंग में ''विकास भी, ईमान भी और सबका सम्मान भी" लिखकर प्रचार कर रहे हैं. एनआरएचएम घोटाले के आरोपी और पूर्व बीएसपी नेता बाबूसिंह कुशवाहा का दाहिना हाथ रहे प्रकाश द्विवेदी भी खदान मालिक हैं. लोकसभा चुनाव से पहले वे कांग्रेस में गए और अब वाया सपा बीजेपी में हैं. कोर्ट से सीबीआइ जांच का आदेश होते ही खदान मालिक रामकरन सिंह उर्फ बगान सिंह ने भगवा चोला ओढ़ लिया. सपा, बीएसपी में शामिल कई अन्य माफिया भी इसी राह पर हैं.
बांदा, हमीरपुर, महोबा और उरई-जालौन में बालू और गिट्टी खनन से जुड़े कई माफिया ने प्रदेश के बड़े नेताओं के जरिए बीजेपी में प्रवेश की भूमिका तैयार की है. अवैध खनन के खिलाफ याचिका दायर करने वाले ए.के. सिंह बताते हैं, ''सीबीआइ जांच से बचने को माफिया बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. पार्टी में रहकर ये केंद्र पर सीबीआइ जांच को धीमा करने के लिए दबाव बनाएंगे." पर बीजेपी के कानपुर और बुंदेलखंड के क्षेत्रीय अध्यक्ष मानवेंद्र सिंह कहते हैं, ''अपराधियों को सजा दिलाने का काम सीबीआइ का है, बीजेपी की इसमें कोई भूमिका नहीं."
अवैध खनन के चंगुल से प्रदेश को मुक्त कराने में सीबीआइ कितना कामयाब हो पाती है, यह तो वक्त ही बताएगा. पर इतना जरूर है चुनावी माहौल में अवैध खनन का मुद्दा पिछली बीएसपी सरकार में हुए एनआरएचएम घोटाले जैसा ताप तो पैदा करेगा ही.

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