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क्या सचमुच उधड़ेंगी परतें

चौतरफा सवाल के बाद सरकार ने विकास दुबे प्रकरण की एसआइटी और न्यायिक जांच के आदेश दिए. पर इससे क्या अपराधी-नेता-अधिकारी नेटवर्क ध्वस्त हो पाएगा

मनीष अग्निहोत्री मनीष अग्निहोत्री

कानपुर के भौती इलाके में 10 जुलाई को पुलिस एनकाउंटर में मारे गए दुर्दांत अपराधी विकास दुबे के राजनैतिक संरक्षण और पुलिस की मिलीभगत जैसे आरोपों के बीच उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार चौतरफा घि‍र गई थी. बढ़ते राजनैतिक दबाव के बीच मुख्यमंत्री ने एनकाउंटर के अगले ही दिन 11 जुलाई को एक स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) का गठन कर दिया. विकास ने कानपुर के बिकरू गांव में 2-3 जुलाई की दरम्यानी रात एक पुलिस क्षेत्राधि‍कारी समेत आठ पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या करवा दी थी. उसकी आपराधि‍क कुंडली खंगालने और उसके साथ अफसरों-पुलिसकर्मियों की मिलीभगत के आरोपों की जांच के लिए बनी तीन सदस्यीय एसआइटी की कमान अपर मुख्य सचिव (एसीएस) संजय भूसरेड्डी को दी गई. इसमें अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) हरिराम शर्मा और पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) जे. रवींद्र गौड़ को बतौर सदस्य शामिल किया गया. एसआइटी को 31 जुलाई तक सभी पहलुओं की जांच कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया है.

गठन के 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि एसआइटी के मुखि‍या भूसरेड्डी अपने दोनों सहयोगियों के साथ 12 जुलाई की पूर्वान्ह 11 बजे बिकरू गांव पहुंच गए. सबसे पहले एसआइटी ने विकास के जमींदोज किए गए घर की छानबीन की जहां 2 जुलाई की रात पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद उनके शव जलाने को इकट्ठा किए गए थे. इस घर के सामने मौजूद विकास के मामा का घर पहुंचकर एसआइटी ने पूरे घर का मुआयना किया. सीओ देवेंद्र मिश्र की नृशंस हत्या वहीं पर की गई थी. गांव में करीब दो घंटे से ज्यादा गुजारने के बाद भूसरेड्डी अपनी टीम को लेकर शि‍वली थाने और आखि‍र में चौबेपुर थाने गए. दोनों थानों से एसआइटी ने विकास से जुड़े सारे रिकॉर्ड और दस्तावेजों को जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया.

एसआइटी के गठन के बावजूद विपक्षी दल विकास के एनकाउंटर पर सवाल खड़े कर योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमलावर थे.

प्रदेश के बढ़ते राजनैतिक ताप को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 12 जुलाई को विकास के एनकाउंटर समेत इस प्रकरण में हुई हर मुठभेड़ की जांच के लिए हाइकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति शशि‍कांत अग्रवाल के नेतृत्व में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन कर दिया. यह आयोग कानपुर में ही रहकर 2 से 10 जुलाई के बीच पुलिस और अपराधि‍यों के बीच हुई हर मुठभेड़ की जांच तो करेगा ही, साथ में विकास और उसके साथि‍यों की पुलिस या अन्य लोगों के साथ गठजोड़ की भी पड़ताल कर दो महीने में सरकार को अपनी रिपोर्ट देगा.

एसआइटी और उसके बाद न्यायिक आयोग के गठन से दहशतगर्द विकास दुबे को संरक्षण देने वाले नेताओं और पुलिसकर्मियों में खलबली है. कानून के जानकार पुलिस-अपराधी-नेता गठजोड़ को तोडऩे के लिए आयोग के गठन से आगे की प्रतिबद्धता दिखाने की सरकार से अपेक्षा कर रहे हैं. इलाहाबाद हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील एस.एन. त्रिपाठी बताते हैं, ''एसआइटी और जांच आयोग की रिपोर्ट को सरकार को सार्वजनिक करना चा‍हिए ताकि लोगों को अपराधी के साथ नेताओं और पुलिस की दुरभि‍संधि‍ के बारे में पता चल सके. ऐसे आपराधि‍क गठजोड़ में लिप्त लोगों पर कड़ी कार्रवाई भी होनी चाहिए. अन्यथा न केवल अपराधी-पुलिस-नेता गठजोड़ बरकरार रहेगा बल्कि‍ यह अपने बचाव के नए तौर-तरीके भी तैयार कर लेगा.''

पुलिसकर्मियों की पोस्टिंग कराते अपराधी

मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल मंदिर से 9 जुलाई को गिरफ्तार होने के बाद यूपी एसटीएफ ने विकास को कानपुर लाते वक्त काफी गहन पूछताछ की थी जिसकी रिकॉर्डिंग भी की गई. इस रिकॉर्डिंग की सीडी एसटीएफ ने गृह विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को सौंपी है. इसमें विकास से 50 से ज्यादा सवाल पूछे गए हैं. पूछताछ में विकास ने उससे संबंध रखने वाले कई लोगों के नाम बताए जिसमें कारोबारी, विधायक, कई पार्टियों के नेता और अधि‍कारी शामिल हैं. नाम न छापने की शर्त पर कानपुर में तैनात एक पुलिस अधि‍कारी बताते हैं, ''विकास ने चार कारोबारियों, 11 नेताओं और पांच पुलिस और अन्य अधि‍कारियों से बेहद निकटता की बात बताई थी.'' उसने पूछताछ में यह भी बताया कि अधि‍कारियों और नेताओं के बीच पकड़ होने के कारण वह फोन करके पुलिस वालों के तबादले और नियुक्तियां भी करा लेता था.

विकास से ही एसटीएफ को जानकारी मिली कि पिछले साल उसने कानपुर में एक थानेदार और चार चौकी प्रभारियों की तैनाती कराई थी. उसने यह भी बताया कि 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी उसके घर आते थे. दो आइपीएस अधि‍कारियों और तीन एडिशनल एसपी रैंक के अफसरों से लगातार संपर्क में रहने की बात भी उसने कबूली थी. एसटीएफ को विकास ने यह‍ भी बताया है कि उसकी संपत्तियां कहां हैं और किसके नाम पर हैं? अवैध रूप से जुटाई गई रकम और इनवेस्टमेंट और अन्य खर्चों के बारे में भी विकास ने एसटीएफ को सारा ब्यौरा दिया. पूछताछ में पता चला कि दो जुलाई को आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद विकास को कानपुर देहात के नगर पालिका के एक अधि‍कारी ने शरण दी थी. उसी ने विकास को औरेया तक पहुंचाने में मदद की थी.

राजनैतिक संरक्षण की पुष्टि‍

विकास दुबे से एसटीएफ की पूछताछ में उसे राजनैतिक संरक्षण की पुष्टि भी हुई है. कानपुर में तैनात एक वरिष्ठ पुलिस अधि‍कारी के मुताबिक, विकास के यूपी, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के नेताओं से संबंध थे. एसटीएफ को विकास की एक पुरानी वीडियो क्लिप भी हाथ लगी है जिसमें वह स्वयं बता रहा है कि एक राजनैतिक पार्टी की अध्यक्ष उसे अच्छी तरह पहचानती हैं. पुलिस को जांच में यह भी पता चला है कि 2007 से 2012 तक विकास पर एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था (देखें बातचीत). इससे विकास की एक पूर्व सत्तारूढ़ दल से नजदीकी जाहिर हो रही है. पुलिस ने इस पार्टी के कानपुर के स्थानीय नेताओं की गतिविधि‍यों पर भी जांच की सुई घुमा दी है. उधर, गुर्गों की धरपकड़ के साथ पुलिस विकास के राजनेताओं और पुलिस से कनेक्शन के सिरे भी आपस में मिलाने की कोशि‍श कर रही है.

एसटीएफ को यह भी जानकारी मिली है कि किस तरह विकास ने अपनी सियासी पहुंच के जरिए अपने करीबियों को ग्राम प्रधान बनवाया. इस जानकारी के बाद से पुलिस ने कानपुर के चौबेपुर थाने में विकास के डी-124 नाम से पंजीकृत गैंग में नंबर दो की हैसियत रखने वाले उसके खास साथी विष्णुपाल सिंह उर्फ जिलेदार सिंह की खोजबीन तेज कर दी है. विकास ने बिकरू गांव में पुलिसकर्मियों पर हमले से पहले हथि‍यार और गुर्गे जुटाने की जिम्मेदारी जिलेदार को ही सौंपी थी. विकास के गांव बिकरू से जिलेदार के गांव सुज्जा निवादा की दूरी पांच किलोमीटर है. विकास ने अपने सियासी रसूख का इस्तेमाल करके अपने चहेते जिलेदार को 2015 में ग्राम पंचायत धौठी से निर्विरोध प्रधान बनवाया था. पुलिस रिकॉर्ड में जिलेदार के खि‍लाफ कानपुर के चौबेपुर, कल्याणपुर और शि‍वली थाने में कुल 17 मुकदमे दर्ज हैं. 2 जुलाई को पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद से जिलेदार फरार है.

अपराध का पैसा दूसरों के धंधे में

एसटीएफ से पूछताछ में विकास ने अपने आर्थिक साम्राज्य और कारोबारियों के साथ रिश्ते के बारे में भी जानकारी दी थी. दरअसल वह अपनी कमाई ज्यादातर दूसरों के धंधे में लगाता था. उसके अवैध आर्थिक कारोबार की जांच की कमान लखनऊ स्थित प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के जोनल कार्यालय ने संभाल ली है. लखनऊ के ईडी मुख्यालय के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेश्वर सिंह बताते हैं, ''कानपुर पुलिस से विकास दुबे और उसके साथि‍यों पर दर्ज मुकदमों, कोर्ट में दाखि‍ल आरोपपत्र, संपत्तियों, बैंक खाते का ब्योरा और अन्य जानकारियां मांगी गई हैं.'' उसी के बाद कानपुर पुलिस ने विकास और उसके साथि‍यों के आर्थि‍क नेटवर्क की जांच तेज कर दी है. पुलिस को जांच में पता चला है कि कानपुर के दो बड़े कारोबारियों से विकास के रिश्ते थे, जिनमें एक साबुन का कारोबारी है. इन्हीं में से दूसरा कारोबारी कानपुर का रहने वाला जय वाजपेयी है जो इस वक्त पुलिस की गिरफ्त में है.

एसटीएफ की जांच में सामने आया है कि विकास और वाजपेयी के परिवार के बीच नियमित रूप से लेनदेन होता था. पुष्टि के तौर पर 30 नवंबर, 2019 के एक लेनदेन का जिक्र आया है. इसमें विकास ने कानपुर में पंजाब नेशनल बैंक के अपने खाते से पांच लाख रुपए जय की पत्नी श्वेता के खाते में ट्रांसफर किए थे. एक दिन बाद ही विकास ने जय के खाते में भी पांच लाख रुपए ट्रांसफर किए.

विकास की संपत्तियों की जांच से जुड़े एक अधि‍कारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ''विकास दुबे और जय वाजपेयी की करोड़ों रुपयों की संपत्तियों का पता लगाया जा चुका है जिनमें कई स्कूल, कॉलेज, व्यावसायिक और आवासीय भूखंड भी हैं. यह भी पता चला है कि विकास ने वाजपेयी के साथ मिलकर कानपुर में कई आवासीय योजनाएं शुरू की थीं जिनमें कई पुलिसकर्मियों को भी भूखंड देने का पता चला है.'' पुलिस अधि‍कारी विकास के पासपोर्ट के बारे में भी पड़ताल कर रहे हैं. अधि‍कारियों को जांच में पता चला है कि विकास ने बीते तीन साल में एक दर्जन से ज्यादा बार विदेश यात्राएं की थीं. उसके सहयोगी जय वाजपेयी की दुबई और थाइलैंड में भी अवैध संपत्ति‍ की सूचना मिली है.

कमजोर क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का लाभ

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के बेहमई गांव में बैंडिट क्वीन के नाम से कुख्यात फूलन देवी के गैंग के हाथों 21 राजपूतों के सनसनीखेज हत्याकांड को अंजाम दिए 39 वर्ष गुजर चुके हैं. इस हत्याकांड के 39 अभि‍युक्तों में से फूलन देवी समेत 35 की मृत्यु हो चुकी है और बाकी चार भी किसी तरह जी रहे हैं. देश भर में चर्चित रहे बेहमई कांड में पुलिस और अभि‍योजन की लापरवाही के चलते 31 साल बाद अभि‍युक्तों पर आरोप तय हो पाए. घटना के 32वें साल गवाही पूरी हो पाई. जब फैसले की बारी आई तो पता चला कि मूल केस डायरी ही गायब है. केस डायरी विवेचक तैयार करता है जो किसी भी मुकदमे का अहम हिस्सा होती है. इसके बि‍ना फैसला नहीं सुनाया जा सकता. इस मुकदमे में अभी तक केस डायरी की फोटो कॉपी से ही पूरा ट्रायल हुआ. अब कोर्ट में फैसला सुनाने में मूल केस डायरी का कानूनी पेच फंस गया है. नतीजा बेहमई हत्याकांड का केस कोर्ट में लंबित है.

ऐसे ही कमजोर क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का फायदा उठाकर विकास भी राज्यमंत्री संतोष शुक्ल की हत्या करके कोर्ट से बरी हो गया था. लखनऊ हाइकोर्ट में वकील शैलेंद्र सिंह बताते हैं, ''अपराधी को सजा दिलाने में पुलिस का तंत्र खोखला हो चुका है. विवेचना में नए अत्याधुनिक तौर-तरीकों को शामिल करने का पुलिस को न तो अभ्यास है और न ही उन्हें इसका कोई पर्याप्त प्रशि‍क्षण दिया जाता है. कानून व्यवस्था पर नियंत्रण और विवेचना को अलग करने का उपाय सरकार को सोचना चाहिए—तभी शायद अपराधि‍यों को सजा दिलाने की दर तेज हो सकेगी और उनमें कानून का खौफ पैदा होगा.'' पिछले 30 वर्षों में 200 से ज्यादा दुर्दांत अपराधि‍यों का नाम हिस्ट्रीशीट में शामिल हुआ है लेकिन कुछ को छोड़कर ज्यादातर कानून के शि‍कंजे से दूर ही रहे हैं.

इनमें से कई तो कानून को धता बताते हुए विधायक या सांसद बनकर माननीय कहलाने लगे हैं. यूपी विधानसभा के आंकड़े बताते हैं कि 1985 में कुल 35 विधायक आपराधि‍क मुकदमों का सामना कर रहे थे. 2017 में ऐसे चरित्र वाले विधायकों की संख्या 148 पहुंच गई. राजनैतिक विश्लेषक और लखनऊ के के.के.सी. कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर बृजेश मिश्र बताते हैं, ''जिस तेजी से अपराधि‍यों का राजनीतिकरण हो रहा है उससे लगता है कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब 403 सदस्यों वाली यूपी विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 202 सदस्य आपराधि‍क मुकदमों से लैस होंगे.''

जाहिर है, राजनीति और पुलिस सिस्टम को अपराध के वायरस से मुक्त करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति वाले राजनैतिक नेतृत्व की जरूरत है. क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वह संकल्प और इच्छाशक्ति दिखा सकेंगे? यही तो उनकी असल परीक्षा है.

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